चीन के विद्वान ह्वेन सांग ने नालंदा विश्वविद्यालय में धर्मग्रंथों का गहन अध्ययन किया। वह हिंदू धर्मशास्त्रों से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने अनेक धर्मग्रंथों का संग्रह किया। लौटते समय वह असंख्य धर्मग्रंथ और कलात्मक मूर्तियां अपने साथ ले चले। नदी पार कराने के लिए उन्हें नाव में बिठाया गया। कुछ भारतीय छात्र नौका में उनके साथ बैठ गए।
नौका कुछ दूर ही पहुंची थी कि गहरे पानी के भंवर के कारण वह डगमगाने लगी। नाविक ने कहा, यदि नौका से कुछ वजन कम कर दिया जाए, तो यह डूबने से बच सकती है। उसने सुझाव दिया, पुस्तकों के गट्ठर को नदी में फेंक दो, सबके प्राण बच जाएंगे।
ह्वेन सांग ने ये शब्द सुने, तो उनका चेहरा पीला पड़ गया। वह बोले, अब भारत के महान धर्मशास्त्रों के प्रचार का मेरा सपना अधूरा ही रह जाएगा। मेरा परिश्रम व्यर्थ हो जाएगा। ये शब्द सुनते ही सभी भारतीय छात्रों ने कहा, आप चिंतित न हों, ग्रंथों की जगह हम नदी में कूद जाते हैं। यह कहकर वे उफनती नदी में कूद गए। तीन छात्र तो तैरकर नदी पार कर गए, लेकिन शेष दो ने धर्मशास्रों की अमूल्य धरोहर बचाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया।
ह्वेन सांग ने चीन पहुंचकर इन धर्मशास्त्रों का अनुवाद किया। इस धरोहर की रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग करने वाले भारतीय छात्रों के प्रति वह जीवन भर कृतज्ञता व्यक्त करते रहे।