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संविधान: व्यक्तिगत कानूनों में सुधार हो, नीति निर्देशक सिद्धांतों पर बहस की दरकार

पी. चिदंबरम
Updated Sun, 09 Jul 2023 08:09 AM IST

सार

भारतीय संविधान में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों पर पूरा एक अध्याय है। यह दुखद है कि इन निर्देशक सिद्धांतों को लेकर शायद ही कोई बहस होती है। ये सरकार के एजेंडे पर नहीं हैं। आरएसएस-भाजपा की मेहरबानी और सुप्रीम कोर्ट की कुछ टिप्पणियों के कारण अकेले अनुच्छेद 44 ने राजनीतिक जगह घेर ली है।
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बीआर अंबेडकर (फाइल फोटो) - फोटो : facebook


शब्दों के मायने हैं

चलिए अनुच्छेद 44 की भाषा पर गौर करते हैं: 'राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।' इन शब्दों के अर्थ हैं। किसी शब्द का अर्थ वह नहीं होता जैसा कि, 'मैं इसका क्या अर्थ चुनता हूं'। 'समान' का अर्थ 'सर्वनिष्ठ' नहीं है। 'सुनिश्चित करने का प्रयास' का अर्थ 'सुनिश्चित करेगा', नहीं है। बाबासाहेब आंबेडकर और उनके सहयोगी अज्ञानी नहीं थे। उन्हें भारतीय लोगों के इतिहास, धर्मों, जातिगत मतभेदों, सामाजिक और परिवार प्रणालियों, सांस्कृतिक प्रथाओं और रीति-रिवाजों का गहरा ज्ञान और समझ थी, और उन्होंने अध्याय चार के शब्दों का चयन बहुत सावधानी से किया।


समान नागरिक संहिता (यूसीसी) व्यक्तिगत कानूनों (पर्सनल लॉज) का संक्षिप्त रूप है। यह चार क्षेत्रों के कानूनों से संबंधित है: विवाह तथा विच्छेद, उत्तराधिकार तथा विरासत, अल्पवयस्कता तथा संरक्षण और दत्तक तथा भरण-पोषण। सदियों से देश के विभिन्न वर्गों के लोगों और विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के व्यक्तिगत कानून विभिन्न तरह से विकसित हुए हैं। लोगों पर शासन करने वाले ने इस विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। धर्म ने भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भूगोल, उर्वरता, विजय, प्रवासन और विदेशी प्रभावों ने भी व्यक्तिगत कानूनों को प्रभावित किया।


1955 में शुरू हुए सुधार

व्यक्तिगत कानून (पर्सनल लॉ) आज जिस रूप में हैं, उनमें लैंगिक भेदभाव के साथ ही गैर-लैंगिक भेदभाव भी मौजूद हैं। अवैज्ञानिक और अस्वास्थ्यकर प्रथाएं मौजूद हैं। सामाजिक रूप से कुछ निंदनीय प्रथाएं और रीतियां भी मौजूद हैं। निस्संदेह व्यक्तिगत कानूनों के ऐसे पहलुओं में सुधार की आवश्यकता है। व्यक्तिगत कानूनों में सुधार कोई नई बात नहीं है। यह संविधान के निर्माण के समय से राष्ट्रीय एजेंडा पर है। यह भारत की प्रथम संसद (1952-57) की अग्रणी प्राथमिकताओं में शामिल था। सुधार के समर्थकों में जवाहरलाल नेहरू और बाबासाहेब आंबेडकर शामिल थे। रूढ़िवादी और संकीर्ण वर्गों के लोगों के विरोध के बावजूद हिंदू लॉ को संशोधित और संहिताबद्ध करते हुए चार बड़े कानून पारित किए गएः
  • हिंदू विवाह अधिनियम, 1955
  • हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956
  • हिंदू अल्पवयस्कता और संरक्षता अधिनियम, 1956
  • हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956
एक युवा राष्ट्र ने बहुसंख्यक हिंदू समुदाय के व्यक्तिगत कानूनों में सुधार के रूप में उल्लेखनीय काम किया था। यह क्रांतिकारी था, लेकिन क्रांति ने कुछ पहलुओं को कायम रहने दिया। भेदभाव करने वाले सारे प्रावधानों को नहीं हटाया गया: अविभाजित हिंदू परिवार को एक वैध इकाई के रूप में स्वीकार किया गया; और विवाह से जुड़ी रीतियों और प्रथाओं को अपवाद के रूप में मान्यता दी गई। कुलनाम महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत में अधिकांश विवाह रीति-रिवाजों के अनुसार होते हैं।  


वर्ष 1961, 1962, 1964, 1976, 1978, 1999, 2001 और 2003 में और संशोधन किए गए। वर्ष 2005 से 2008 के दौरान यूपीए सरकार ने कुछ और सुधार किए। ऊपर वर्णित चार में से तीन अधिनियम में संशोधन किए गए। इनमें संपत्ति पर बेटियों और बेटों को समान अधिकार प्रदान किया जाना एक क्रांतिकारी बदलाव था। घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005, बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 और माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 पारित किए गए। जहां विधायी निकाय झिझक रहे थे, वहां अदालतें सामने आईं। 22 अगस्त, 2017 को सर्वोच्च अदालत ने मुस्लिमों के बीच तलाक-ए बिद्दत (तीन तलाक) को असांविधानिक करार दिया।  


21वें विधि आयोग पर ध्यान दें

जब हमें आदिवासियों के व्यक्तिगत कानूनों का सामना करना पड़ा, तो हम चुप कर गए। संविधान के अनुच्छेद 366, खंड 25 में अधिसूचित जनजातियों पर ऊपर वर्णित चारों अधिनियमों में से एक भी लागू नहीं होता। असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के लिए संविधान की छठी अनुसूची जोड़ी गई और उसमें इन राज्यों की जिला परिषदों और क्षेत्रीय परिषदों को उत्तराधिकार, विवाह, विच्छेद और सामाजिक रीतियों को लेकर कानून बनाने का अधिकार प्रदान करने से संबंधित एक पैराग्राफ जोड़ा गया। नगालैंड (अनुच्छेद 371 ए), सिक्किम (अनुच्छेद 371 एफ) और मिजोरम (अनुच्छेद 371 जी) में धार्मिक या सामाजिक रीतियों और प्रथागत कानून को संरक्षित करने के लिए विशेष प्रावधान किए गए। छत्तीसगढ़ और झारखंड में आदिवासी संस्थाएं इसी तरह के विशेष प्रावधानों की मांग कर रही हैं।


व्यक्तिगत कानूनों में निश्चित रूप से और सुधार की जरूरत है। 21वें विधि आयोग ने विवेक सम्मत सलाह दी है: 'इस आयोग ने ऐसे कानूनों पर विचार किया, जो कि भेदभावकारी हैं, न कि यूसीसी पर जो कि इस समय न तो आवश्यक है और न ही वांछित है...सांस्कृतिक विविधता से इस हद तक समझौता नहीं किया जा सकता कि एकरूपता के लिए हमारा आग्रह अपने आपमें देश की क्षेत्रीय अखंडता के लिए खतरा बन जाए।'  
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माननीय प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे को इस तरह से प्रस्तुत किया है, जिसमें यूसीसी के पक्ष या विरोध में ही प्रतिक्रिया दी जा सकती है। यह दृष्टिकोण भारत के लोगों को गूंगी भेड़ों की तरह मानता है। सूक्ष्म दृष्टिकोण यही होगा कि सुधारों को लेकर सार्थक बातचीत शुरू हो, जिसकी जरूरत सभी व्यक्तिगत कानूनों में है, जिसमें मुस्लिम लॉ भी शामिल है। मुख्य शब्द रिफॉर्म (सुधार) है, न कि यूनिफॉर्म (एक समान)।

 
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