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चिंता: और अब एक पृथ्वी काफी नहीं, क्योंकि विकास के नाम पर काटी जा रही हैं अपनी ही जड़ें

वीर सिंह
Updated Sun, 09 Jul 2023 07:56 AM IST

सार

मनुष्य जीवन-विकास की जिस डाल पर बैठा है, उसी को काट रहा है। जिस प्राकृतिक विकास ने उसे संपूर्ण बौद्धिक क्षमताओं से अलंकृत किया, वह उसी की जड़ें खोदकर स्वयं के विलुप्तीकरण की कथा लिख रहा है।   
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जलवायु परिवर्तन - फोटो : pixabay


पृथ्वी पर जीवन की दशा और दिशा कभी स्थिर नहीं रहीं। परिवर्तन ब्रह्मांड का नियम है और पृथ्वी पर जीवन का विधि-विधान भी। यदि ऐसा न होता, तो विकास (एवोल्यूशन) का बोलबाला भी न होता और हमारा अस्तित्व भी नहीं। ब्रह्मांड में असंख्य परिवर्तन होते हैं, तो पृथ्वी और उसके जीवन में भी। हमारे शरीर की एक कोशिका से लेकर पूरे जैवमंडल में और एक परमाणु से लेकर संपूर्ण ब्रह्मांड में सारे परिवर्तन एक ही धुरी पर चलते हैं।


पृथ्वी पर एक लय के साथ चलने वाला परिवर्तन ही जीवन विकास है। विकास की परिवर्तन-यात्रा पृथ्वी के अस्तित्व में आने से लेकर आज तक अनवरत जारी है। विकास की इस अनवरत यात्रा में पृथ्वी जैव-विविधता से उत्तरोत्तर घनीभूत होती गई है। प्राकृतिक विकास में प्रत्येक जीव-प्रजाति के अस्तित्व के लिए एक समयावधि निश्चित है। पृथ्वी पर जीवन के उद्गम के बाद अब तक कोई 30 अरब प्रजातियां प्रकृति की गोद में खेल चुकी हैं, जिनमें से अभी अनुमानतः 85 लाख अस्तित्व में हैं और शेष विलुप्त हो चुकी हैं। इस प्रकार प्रत्येक प्रजाति का अंततोगत्वा विलुप्तीकरण प्राकृतिक विकास के विधान का एक अभिन्न पहलू है। अनेक भौतिक-जैविक कारणों से कोई प्रजाति असमय विलुप्त न हो जाए, इसके लिए प्राकृतिक विकास की व्यवस्था है कि वह जीव-प्रजाति अधिक से अधिक संख्या में हो और उसके अनेक अनुवांशिक रूप हों। एक प्रजाति का वर्चस्व लाखों वर्षों तक रहता है, लेकिन उसके सदस्यों का जीवन प्रजाति के जीवन का आंशिक ही होता है।


किसी प्रजाति के विलुप्त होने की एक पृष्ठभूमि दर या सामान्य दर होती है, जो पृथ्वी के जैविक और भू-वैज्ञानिक इतिहास में विलुप्त होने की मानक दर को संदर्भित करती है, जिसमें पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र में कोई मानवीय हस्तक्षेप नहीं है। मानव प्रजाति पृथ्वी के प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र को बदलने और सभी जीवों के प्राकृतिक आवासों में घुसपैठ करने और उनके अस्तित्व को प्रभावित करने में सक्षम है। इस बात की कम संभावना है कि विलुप्त होने की दर अब भी पृष्ठभूमि दरों के अनुरूप हो। इस प्रकार, पृष्ठभूमि दरों की गणना पूर्व-मानव काल के संदर्भ में या विलुप्त होने की प्रमुख घटनाओं के बीच की अवधि के दौरान की जाती है।


पृथ्वी के जीवों ने ग्रह के भू-वैज्ञानिक और जैविक इतिहास में विलुप्त होने की अब तक पांच विराट घटनाओं का अनुभव किया है। पृथ्वी पर बड़े पैमाने पर विलुप्त होने की कहानी लगभग 4,400 खरब वर्ष पूर्व शुरू हुई थी, जिसे ऑर्डोविसियन काल-खंड कहते हैं। उस विनाशलीला में धरती की 86 प्रतिशत प्रजातियां सदैव के लिए काल के गाल में समा गई थीं। दूसरा सामूहिक विलुप्तीकरण 3,750 खरब वर्ष पूर्व हुआ, जिसमे 75 प्रतिशत प्रजातियों का सर्वनाश हो गया था। इस काल को वैज्ञानिकों ने लेट डेवोनियन नाम दिया है। लगभग 2500 खरब वर्ष पूर्व धरा से लगभग 96 प्रतिशत प्रजातियां सदैव के लिए विनष्ट हो गईं। इस तीसरी सामूहिक विलुप्ति की घटना को पांचों घटनाओं में सबसे विनाशकारी कहा जाता है।


चौथा सामूहिक जीव विनाश 2000 खरब वर्ष पूर्व ट्रिअसिक-जुरैसिक काल में घटित हुआ, जिसमें धरती ने अपनी 80 प्रतिशत प्रजातियां सदैव के लिए खो दीं। पांचवीं सामूहिक विलुप्ति की घटना लगभग 650 खरब वर्ष पूर्व हुई थी, जिसमें लगभग 75 प्रतिशत प्रजातियों का सफाया हो गया था, जिनमें डायनासॉर भी सम्मिलित थे। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि एक विशाल उल्कापिंड के पृथ्वी से टकराने के कारण पांचवीं सामूहिक विलुप्ति हुई थी।


सामूहिक विलुप्तीकरण प्राकृतिक आपदाओं से जुड़ी घटना रही है। लेकिन मानव-वर्चस्व वाले इस कालखंड, जिसे एन्थ्रोपोसीन कहते है, में जो विनाश वर्तमान में चल रहा है और जो निकट भविष्य में इस ग्रह के लिए अभूतपूर्व विभीषिका बनने जा रहा है, वह सब मानव के कार्यकलापों का प्रतिफल है।
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मानव जाति ने प्राकृतिक संसाधनों का इस सीमा तक दोहन किया है कि अब उसका अपना ही भविष्य खतरे में पड़ गया है। जल, वायु, और मिट्टी सभी प्रदूषित हो गए हैं तथा पारिस्थितिक संतुलन इतना गड़बड़ा गया है कि असंख्य प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई हैं। एन्थ्रोपोसीन में प्रजातियों के विलुप्त होने की दर सामान्य दर से 100 से 1,000 गुना अधिक है। यह छठा सामूहिक विलुप्तीकरण है, जो जलवायु दुष्चक्र के साथ बढ़ता चला जाएगा। जलवायु परिवर्तन स्वयं में मानव गतिविधियों का पृथ्वी पर जीवन विकास के इतिहास का सबसे दुखद अध्याय है। मनुष्य जीवन-विकास की जिस डाल पर बैठा है, उसी को काट रहा है। जिस प्राकृतिक विकास ने उसे संपूर्ण बौद्धिक क्षमताओं से अलंकृत किया, वह उसी की जड़ें खोदकर स्वयं के विलुप्तीकरण की कथा लिख रहा है।  

- लेखक- प्रोफेसर एमेरिटस, पर्यावरण विज्ञान, जी बी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय
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