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आत्मकथा में जीवित रहेंगे तुलसीराम

Sun, 15 Feb 2015 12:26 AM IST
श्यौराज सिंह बेचैन
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तुलसीराम 13 फरवरी की सुबह न लौट पाने वाली चिर यात्रा पर चले गए। उन्हें बीमारी तिल-तिल मार रही थी, जबकि अदम्य जिजीविषा बार-बार मौत के मुंह से बाहर ला रही थी। जाना तो है, पर जो जिया है, जो सहा है, उसे कहकर-बताकर ही जाना है, सो काम करने की यह इच्छाशक्ति उनकी संजीवनी बन रही थी। लंबे समय से वह डायलिसिस के सहारे जी रहे थे। 'मणिकर्णिका' की भूमिका में उन्होंने लिखा भी है कि एक बार ‘यह अफवाह फैल गई थी कि अब मैं इस दुनिया में नहीं रहा। दलितों की एक साहित्यिक सभा में मुझे श्रद्धांजलि भी दे दी गई थी।' आत्मकथा के दोनों भाग, ‘मुर्दहिया’ और ‘मणिकर्णिका’ उन्होंने बीमार रहते हुए ही पूरी जिम्मेदारी तथा बेबाकी से लिखे।
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तुलसीराम का जन्म उत्तर प्रदेश में आजमगढ़ जिले के धरमपुर गांव में हुआ था। बालपन में उनकी एक आंख चली गई, तो उन्हें कांणा कहकर चिढ़ाया गया। चेचक ने चेहरे पर दाग दे दिए, तो लोगों को उनकी सूरत नापसंद होने लगी। वह राजनीति के जितने बड़े जानकार थे, उससे कहीं अधिक उनकी दिलचस्पी बौद्ध अध्ययन में थी। राजनीतिशास्त्र के वह अध्यापक थे और लोक साहित्य में रच-बसकर वह आत्मकथा तक आए थे। वह निहायत संवेदनशील व्यक्ति थे और उनकी स्मरण शक्ति गजब की थी। दलित उत्पीड़न की घटनाओं के विवरण वह बहुत संभाल कर रखते थे। अखबारों की कटिंग्स काट-काटकर वह विषय, अखबार का नाम और तिथि लिफाफे के ऊपर लिख दिया करते थे। जब भी उनसे कोई टिप्पणी मांगी जाती, वह तुरंत लिफाफा खोलते और घटना का हवाला दर्ज कर देते। दलित साहित्य में उनकी एक स्थापना विवाद का विषय बनी कि वर्ण व्यवस्था का विरोध करने वाला कोई गैर दलित भी दलित साहित्य लिख सकता है। जबकि वर्ण व्यवस्था को वह लगातार खारिज करते थे। ‘मणिकर्णिका’ में उन्होंने लिखा है कि नवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य का एक दलित के साथ शास्त्रार्थ हुआ था, लेकिन पंडितों ने इसे अमान्य करते हुए कहानी जोड़ दी कि चांडाल के वेश में साक्षात शिवजी थे।

तुलसीराम लंबे समय तक मौत के विषाद से घिरे रहे। उनके लेखन पर भी यह एहसास हावी हुआ। उन्होंने आत्मकथा के पहले भाग को ‘मुर्दहिया’ यानी श्मशान शीर्षक दिया, तो दूसरे भाग का नाम 'मणिकर्णिका' रखा। इनमें उन्होंने जिंदा लाशों में बदल दिए गए अपने दलित समाज की कथा ही कही। वह जानते थे कि बीमारी उन्हें अधिक दिनों तक जिंदा नहीं रहने देगी। मुझे याद है, आत्मकथा के दूसरा भाग का वह डिक्टेशन देते थे और डॉ. सुनीता और शोध छात्रा मुन्नी भारती उसे यथाशीघ्र कंपोज करती थीं।
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यह हैरतंगेज है कि जो सम्मान और प्रोत्साहन ‘मुर्दहिया’ को मिला था, वैसा ‘मणिकर्णिका’ को क्यों नहीं मिला? इसकी वजह शायद यह है कि वामपंथियों की थोड़ी भी दलित विषयक आलोचना बर्दाश्त नहीं है।

तुलसीराम न केवल साहित्य, बल्कि एक ऐसा सामाजिक इतिहास देकर गए हैं, जो अतीत की समझ के साथ भविष्य का रास्ता दिखाने में मददगार साबित होगा। वह एक पढ़ाकू और पुस्तक प्रेमी प्राणी थे। इसका साक्ष्य उनकी आत्मकथा में भी मिलता है, 'बीएचयू की सेंट्रल लाइब्रेरी का हर कोना घूम-घूमकर देखता रहा। लाखों किताबों का अंबार मुझे चौकाने वाला सिद्ध हुआ। मन ही मन मैंने सोच लिया कि भविष्य में मेरा यही असली ठिकाना होगा।'

तुलसीराम सेंटर फॉर रशियन ऐंड सेंट्रल एशियन स्ट्डीज, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्ट्डीज, जेएनयू में प्रोफेसर थे। लेकिन इलीट विश्वविद्यालय में रहकर भी वह अपने उन पात्रों को नहीं भूले, जिन्हें आज भी सामाजिक दासता से मुक्ति नहीं मिली है। लोकजीवन की स्मृतियों ने कभी उनका पीछा नहीं छोड़ा। उनकी आत्मकथा पर उनके गैरदलित शिक्षक साथियों ने जश्न मनाए थे।जेएनयू में पार्टियां हुई थीं। 'मनुवा महा ठगवा हम जानी' जैसा लोकगीत लिखकर उन्होंने अपनी चिंतन धारा का ही परिचय दिया था। दरअसल उनके मित्र गोरख पांडे ने कहा था कि अपने गांव देवरिया जिला जाएंगे और दलित बस्तियों में जाकर लोकगीत सुनेंगे, फिर आकर लोकगीत लिखेंगे। गोरख के चर्चित लोकगीत और तुलसीराम की अचर्चित कविताएं उन लोकधुनों की तर्ज पर ही हैं, जो उन्होंने दलित बस्तियों से सीखे थे।

आज भी हालात तुलसीराम जैसे चिंतकों को परेशान करने वाले हैं। आसमान के लोग जमीन से जुड़ रहे हैं और जमीन वाले जमीन से न जुड़कर अपने पैरों की जमीन खो रहे हैं। ऐसी स्थिति में दलित जनता की छटपटाहट स्वाभाविक है। मगर उसके समक्ष कुशल दलित नेतृत्व का अभाव भी दिखाई दे रहा है। तुलसी राम अपने आपको आत्मकथा में, विचारों और कार्यों में हमारी पीढ़ी के साथ और हमारे बाद भी रहेंगे। इसलिए क्षमा करें, मैं उन्हें अलविदा नहीं कह पा रहा हूं।
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