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सब कुछ लौटा के होश में आए तो क्या हुआ

Sun, 15 Feb 2015 12:21 AM IST
सुरेंद्र कुमार
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पिछले वर्ष की शुरुआत में लोकसभा चुनाव से पहले से तटस्थ पर्यवेक्षकों को लगने लगा था कि कांग्रेस बुरी हार की ओर बढ़ रही है। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने महाभारत की गांधारी की तरह आंखों में पट्टी बांध रखी थी और उसे दीवार पर लिखी इबारत दिखाई नहीं दे रही थी। नेतृत्व के कुछ करीबी चापूलस किस्म के लोग इसे पढ़ सकते थे, लेकिन उनमें इतना साहस ही नहीं था कि सच बयान कर सकें।
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असल में अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के रामलीला मैदान में हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में जिस तरह लोगों का गुस्सा नजर आया था, उसे कांग्रेस के नेताओं ने नजरंदाज किया था। जबकि वह कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी थी। उसके बाद 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में तीन बार की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को जब अरविंद केजरीवाल ने पराजित किया और कांग्रेस आठ सीटों में सिमट गई थी, तब तक खतरे की घंटी की गूंज दूर तक सुनाई देनी लगी थी। इसके बावजूद कांग्रेस नेतृत्व ने मानो कानों में रूई ठूंस रखी थी।

लोकसभा चुनाव में मिली पराजय के बाद पार्टी ने आत्ममंथन की औपचारिकता जरूर पूरी की, मगर उसमें न तो गंभीरता थी और न ही ईमानदारी। इसमें पार्टी को पुनर्जीवित करने की कोई दूरदृष्टि ही नहीं थी। दरअसल पूरी कवायद इस पर थी कि मां-बेटे पर कोई आंच न आए। कहा गया कि पार्टी ने तो बहुत कुछ किया था, लेकिन सरकार (मनमोहन सिंह सरकार) अपनी उपलब्धियों को प्रचारित करने में नाकाम रही। कांग्रेस के आधारहीन, रीढ़िविहीन नेता सोचते हैं कि परिवार का कोई न कोई सदस्य इस बूढ़ी पार्टी को उबारने के लिए मसीहा बनकर आएगा। शुरू में ऐसा लग रहा था कि कांग्रेस नेता यह उम्मीद कर रहे थे कि मोदी सरकार अपने भारी भरकम वायदों को पूरा करने में नाकाम साबित होगी और लोगों का उससे भ्रम टूटेगा और कांग्रेस फिर सत्ता में लौट आएगी। इससे बड़ी मासूमियत कुछ और हो सकती है क्या?
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दिल्ली विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस सिफर रही। उसे एक भी सीट नहीं मिली। जबकि महज दो वर्ष पुरानी आम आदमी पार्टी ने 70 में से 67 सीटें जीत लीं। नेहरू, इंदिरा और राजीव जहां कहीं भी होंगे पार्टी की इस भयानक हार पर शर्मिंदा महसूस कर रहे होंगे। असल में समय, लहर और मतदाता किसी का इंतजार नहीं करते, वे आगे बढ़ते जाते हैं और अपने पीछे अवशेष और तबाही छोड़ जाते हैं। कांग्रेस के पारंपरिक वोटरों ने आप के पक्ष में थोकबंद मतदान किया है।

कांग्रेस के लिए अगला कदम क्या होगा? क्या वह स्वीकारोक्ति करेगी? सोनिया और राहुल दोनों को पार्टी की पराजय की पूरी जिम्मेदारी लेनी चाहिए और पार्टी के दीर्घकालीन हित में अपनी जिम्मेदारियों से अलग हो जाना चाहिए। क्या वे ऐसा करेंगे? सवाल ही नहीं उठता!

वास्तव में भारतीय समाज पिछले दशक में काफी बदला है। ठीक उसी तरह मतदाताओं की बुनावट बदली है और उनकी अपेक्षाएं भी। उनके पास तकलीफों का पहाड़ है और अपनी मांगों की लंबी फेहरिस्त और वे चाहते हैं कि सरकार जल्द से जल्द कोई समाधान दे। मतदाताओं ने भारी भ्रष्टाचार और सरकार की बेरुखी से तंग आकर कांग्रेस को बाहर का रास्ता दिखाया और मोदी के पक्ष में अच्छे दिन आने की उम्मीद में वोट दिया था।

लेकिन उनके जीवन में कुछ खास बदलाव नहीं आया तो उन्होंने नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा को किनारे लगा दिया और केजरीवाल की पार्टी को 95 फीसदी सीटें दे दी। और अब यदि अपनी दूसरी पारी में वह काम करके नहीं दिखाएंगे तो उनका भी हस्र कांग्रेस और भाजपा जैसा हो सकता है। हालांकि यह कहने की जरूरत नहीं कि भारतीय लोकतंत्र में आम आदमी पार्टी परिवर्तन की सबसे बड़ी पहरुआ बनकर उभरी है। मोदी अच्छा वक्ता हैं, उन्होंने कॉरपोरेट जगत और उच्च मध्यम वर्ग को सम्मोहित कर लिया, जो कि उनके समर्थन का सबसे बड़ा आधार हैं। यह वर्ग उनकी ड्रेस सेंस, वैश्विक नेताओं से मिलने की उनकी अदा और संपन्न और समृद्ध भारत के उनके सपने से मोहित होता है। वह एक महान सेल्समेन हैं। उन्होंने सफलतापूर्वक ब्रांड मोदी को स्थापित किया है। दूसरी ओर केजरीवाल ने गरीबों और निम्न मध्य वर्ग के साथ जुड़ाव स्थापित करने के लिए बहुत करीने से अपनी छवि गढ़ी है। वह उन्हीं की तरह कपड़े पहनते हैं, उन्हीं की तरह बोलते हैं और वह किसी पड़ोसी की तरह लगते हैं। व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष में उन्होंने किसी भी दूसरी पार्टी के नेताओं की तुलना में अधिक विश्वसनीयता अर्जित की है। ईमानदारी, विश्सनीयता और आसान पहुंच उनका यूएसपी है।

मोदी और केजरीवाल जैसे प्रतिद्वंद्वियों के सामने होने से कांग्रेस के समक्ष अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है। राहुल और सोनिया बहुत खराब वक्ता हैं। दोनों बिना तैयारी के पांच मिनट तक लगातार भाषण नहीं दे सकते। अहंकार, चापलूसी और निरंक विश्वसनीयता पार्टी की पहचान बन गई है, जो लोगों की नब्ज टटोलने में पूरी तरह नाकाम हो गई है। वास्तव में कांग्रेस को ऐसे नेता की जरूरत है, जिसके पास अमीरों और उच्च वर्ग के लोगों को आकर्षित करने की मोदी जैसी क्षमता हो और गरीबों और निम्न मध्य वर्ग को प्रभावित करने की केजरीवाल जैसी क्षमता हो। कांग्रेस आज भी सेकुलर और बहुलतावादी पार्टी है, लेकिन क्या वह कुछ अलग सोचने पर विचार कर सकती है। यह अभी दूर की कौड़ी लग सकता है, लेकिन क्या कांग्रेस और आम आदमी पार्टी एक दूसरे का साथ देने पर विचार कर सकती हैं। दोनों वामपंथी रुझान की मध्यमार्गी पार्टियां हैं और विभाजनकारी सांप्रदायिक नीतियों के खिलाफ हैं। क्या कांग्रेस आप को आमंत्रित कर उसे खुद में समाहित कर केजरीवाल को अपना नेता मानने को तैयार हो सकती है? क्या दोनों पार्टियां देशहित में विलय कर एक नई पार्टी 'आप की कांग्रेस' बनाने को तैयार हैं?
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