रूस भारत का लंबे समय से एक भरोसेमंद रक्षा और ऊर्जा भागीदार रहा है। ट्रंप की नीति भारत की इस रणनीतिक साझेदारी को निशाना बनाते हुए उसे एक कठिन स्थिति में डालती है, जहां उसे अपनी रणनीतिक साझेदारियों और अमेरिका के साथ व्यापारिक हितों के बीच संतुलन बनाना होगा। प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर प्रतिबद्धता दिखाए जाने के बाद से अब तक दोनों देशों के अधिकारियों के बीच पांच दौर की वार्ता हो चुकी है और छठे दौर की वार्ता अगस्त में होनी है, जब अमेरिकी अधिकारी भारत का दौरा करेंगे।
इतनी मशक्कत के बाद भी अगर अब तक दोनों देशों में कोई अंतरिम समझौता नहीं हो पाया है, तो यह दर्शाता है कि यह इतना आसान नहीं है। दरअसल, ट्रंप अमेरिकी वस्तुओं के लिए भारत से अपने बाजार खोलने की मांग करते रहे हैं, जबकि भारत ने हमेशा से अपने कृषि और डेयरी क्षेत्रों में संरक्षणवादी रुख अपनाया है, और यही अब तक व्यापार समझौते के न हो पाने की मुख्य वजह बताई जा रही है। फिलहाल की स्थिति में भारत के लिए उचित होगा कि वह संवाद और कूटनीति की राह को अपनाते हुए अमेरिका के साथ जल्द से जल्द एक समझौते पर पहुंचे।
दूसरे, भारत को अपने निर्यात बाजारों में विविधता लाने की जरूरत है। हाल ही में ब्रिटेन के साथ हुआ मुक्त व्यापार समझौता इस दिशा में एक सकारात्मक कदम है। इसी तर्ज पर अब भारत को आसियान जैसे अपने प्रमुख क्षेत्रीय व्यापार भागीदारों के साथ संबंधों को मजबूत करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, भारत को अपनी ऊर्जा और रक्षा नीतियों में दीर्घकालिक सोच के साथ वैकल्पिक स्रोतों की भी तलाश करनी चाहिए, ताकि दूसरे देशों पर से निर्भरता कम हो सके।
ट्रंप की घोषणा भारत-अमेरिका संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह बेशक एक चुनौती है, लेकिन भारत के लिए अपने आर्थिक और कूटनीतिक सामर्थ्य को प्रदर्शित करने का अवसर भी हो सकती है। आने वाले महीनों में देखना होगा कि भारत इस जटिल आर्थिक परिदृश्य से कैसे निपटता है।