कभी खेतों का सौंदर्य देखा है? कभी उस रूप-रंगत पर मोहित हुए हैं, जिसे किसान ने अपना पसीना बहाकर ऊसर-बंजर धरती की छाती चीरकर जगमगाया है। अभी सावन चल रहा है। आषाढ़ बस बीता ही है। धान की बेड़ रोपने के लिए किसान परिवार के कई सदस्य पानी से लबालब जुते हुए खेत में चहोरा गाड़ते हुए गउनई कर रहे हैं और सिर ऊपर बादल घुमड़-मचल कर अमृत वर्षा करने में मनोयोग से जुटे हैं। किसान के होंठों से झरते हुए बोल भी इस पल तरंगित और पुरनम हो चुके हैं। यही फसल जब महीने भर में अपनी गहरी हरी रंगत में दो-दो बालिश्त का कद अर्जित कर तेज हवा में लहराती है, तब किसान के होठों पर पसरी खुशी को कोई कथाकार प्रेमचंद ही पढ़ पाता है।
धान की पकी हुई लांक को इकट्ठा करके झोरने-लाने में जो श्रम लगता है, वह किसान के घर-आंगन में पहुंचते ही छप्पर-छानी वाली बखरी भी धन-धान्य से भरी-पुरी होकर नृत्य करने लगती है। और ये जो खेतों की मेड़ पर बड़े-बड़े सुरमई तने वाले दरख्त अपनी दूर तक बाहें फैलाए, बाबा नागार्जुन के शब्दों में पत्रहीन नग्न गाछ हो चुके हैं, उनकी फुनगियां ज्यादातर सुर्ख और कभी-कभी गुलाबी मांसल फूलों से भर गई हैं। कौन निवीर्य इनकी रंगत पर मोहित नहीं होगा। करीब जाकर देखो, तो लगता है कि किसी अनिंद्य सुंदरी ने अपने होठों को सुर्ख लिपिस्टिक से रंग लिया हो।
वृक्षों पर नए कल्ले सिर उठाने लगे हैं। यह नए जन्म का उत्सव है। सब ओर उमंगें हैं। हवा डोलने लगी है। पाकड़ और पीपल के पत्तों ने मानों संगीत की महफिल सजा ली है। हवा की तरंगों से जुड़कर वे कोई राग गाने लगे हैं, पर उसे सुनने का अवकाश अब मोबाइल पीढ़ी के पास कहां है। गेहूं की फसल के लिए खेत को कई बार जोतना होता है।