ऋभु महर्षि एक महान संत थे। उनका एक शिष्य था, निदघ। ऋभु के मन में उसके लिए बहुत प्रेम था, लेकिन निदघ एकाग्र नहीं था। कुछ समय बाद निदघ ने ऋभु महर्षि से मिलना-जुलना छोड़ दिया। ऋभु उसे देखने आते-जाते रहते, पर निदघ पर कोई असर नहीं होता। फिर भी ऋषि भेष बदल कर उससे मिलने और उसे समझाने चले जाते थे।
एक दिन ऋभु ने ग्रामीण जैसे कपड़े पहने और निदघ के पास पहुंच गए। रास्ते में राजा की सवारी निकल रही थी और निदघ चुपचाप उसे देख रहा था। ऋषि निदघ के पास जाकर खड़े हो गए और पूछा, क्या देख रहे हो? निदघ ने जवाब दिया, राजा का जुलूस देख रहा हूं।
ऋषि ने पूछा, राजा कहां है? निदघ बोला, देखते नहीं, हाथी पर बैठा है। ऋभु ने कहा, ओह, पर राजा कौन-सा है? यह सुनकर निदघ को गुस्सा आ गया। उसने कहा, देखते नहीं हैं? जो व्यक्ति ऊपर बैठा है, वह राजा है और उसके नीचे जो जानवर है, वह हाथी है। ऋभु बोले, अरे यह ऊपर नीचे क्या है, मुझे समझ में नहीं आता।
अब तो निदघ मानो भड़क उठा, तुम्हें नहीं पता कि ऊपर और नीचे क्या है? लगता है, तुम्हारी अक्ल में नहीं घुस रहा है। तुम्हें समझाना पड़ेगा। वह ऋभु के कंधों पर चढ़ गया। क्या अब तुम्हें समझ आ रहा है कि मैं ऊपर हूं और तुम नीचे? मैं राजा हूं और तुम जानवर। समझ में आया?
ऋभु ने कहा, ठीक ठीक तो नहीं। पर अब मैं समझ सकता हूं कि इंसान क्या है और हाथी क्या है। मैं यह भी समझ सकता हूं कि ऊपर क्या है और नीचे क्या है। लेकिन यह तुम और मैं क्या है, जिसके बारे में आप बात कर रहे हैं? अचानक निदघ के मन में वही प्रश्न कौंधा और उसे बोध हुआ कि यह कोई और नहीं, उसके गुरु ही हैं। उसी पल उसे आत्मज्ञान हो गया।