राजनीतिक पंडित्ा अक्सर गलत साबित होते हैं। इस बार भी यही हुआ। उत्तर प्रदेश में हालिया उप चुनावों के दौरान 11 में से आठ विधानसभा सीटों को भारतीय जनता पार्टी से झटकते हुए समाजवादी पार्टी ने न सिर्फ राजनीतिक विश्लेषकों के सारे अनुमान झुठला दिए हैं, साथ ही, भाजपा की जो अजेय राजनीतिक ताकत जैसी बनती जा रही छवि को भी ध्वस्त कर दिया है। मगर जैसा कि हर किसी को मालूम है कि इससे यह नतीजा निकालना ठीक नहीं होगा कि उत्तर प्रदेश में सब कुछ ठीक चल रहा है। उत्तर प्रदेश तमाम समस्याओं से घिरा हुआ है, और लखनऊ की सरकारें इनके समाधान की दिशा में उदासीन ही दिखती आई हैं।
चाहे कानून व व्यवस्था हो, या कोई दूसरा मोर्चा सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी ने अब तक ऐसा कुछ नहीं किया, जिस पर उसे गर्व हो। हालांकि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके सहयोगियों के लिए अपने रिकॉर्ड को सुधारने का यह बिल्कुल सही वक्त है। फिलहाल उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती नवजात शिशुओं को बचाने की है। गौरतलब है कि नवजात शिशुओं की होने वाली मौतों के मामले में भारत पूरी दुनिया में अव्वल है। पैदा होने के बाद पहले सत्ताइस दिन नवजात शिशु के लिए काफी नाजुक होते हैं। 2012 में विश्व में इस अवधि के दौरान जिन तीस लाख नवजातों की मौत हुई, उनमें से 7,79,000 भारत में ही हुई थीं। भारत में होने वाली नवजात शिशुओं की मौतों में से 56 फीसदी महज पांच राज्यों में सिमटी हुई हैं- उत्तर प्रदेश, राजस्थान, ओडिशा, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश।
नवजात शिशुओं की मौतों की ज्यादातर वजहों को परिवारों, समुदायों और स्वास्थ्य सुविधाओं के प्रयासों से नियंत्रित किया जा सकता है। मगर नवजात शिशुओं को अक्सर अपेक्षित देखभाल मिल नहीं पाती। इसके अलावा स्तनपान की शुरुआत देर से किया जाना, कपड़े पहनाने में की जाने वाली देरी और शिशुओं को नहलाने की जल्दी और उनके बीमार पड़ने पर जरूरी देखभाल की जाने में देरी जैसी कुछ गलत परंपराओं से स्थिति बदतर हो जाती है। फिर, अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्रों में भी पर्याप्त सुविधाओं कमी की वजह से सभी नवजातों की समुचित देखभाल और बीमारियों से उनका इलाज मुमकिन नहीं हो पाता।
नवजात शिशुओं से जुड़ी यह समस्या बेशक जटिल लगे, मगर बच्चों को बच्चों को बचाना कोई रॉकेट विज्ञान तो है नहीं। मैंने और कुछ दूसरी महिला पत्रकारों ने पिछले हफ्ते जब अमेरिका की मशहूर महिला उद्योगपति, लोकोपकारी कामों में संलग्न रहने वाली और बिल व मेलिंडा फाउंडेशन की सह-संस्थापक मेलिंडा गेट्स से बात की, तो उन्होंने भी कुछ ऐसे ही विचार व्यक्त किए। दरअसल मेलिंडा अपने पति बिल गेट्स (माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक), जो कि भारत में तमाम सामाजिक कार्यों को प्रोत्साहन देते रहते हैं, के साथ भारत की यात्रा पर थीं। इस दौरान मेलिंडा ने स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्ष वर्द्धन से भी मुलाकात की। हाल ही में शुरू किए गए ' भारतीय नवजात एक्शन प्लान' को लेकर वह खासी उत्साहित थीं। गौरतलब है कि गेट्स फाउंडेशन ने उत्तर प्रदेश और बिहार में मातृ और शिशु स्वास्थ्य में सुधार के लिए काफी निवेश किया हुआ है।
भारतीय नवजात एक्शन प्लान (आईएनएपी) सही दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम है। जन्म के 28 दिनों के भीतर होने वाली शिशुओं की मौतों की दर वर्तमान में 29 प्रति हजार है। इस आंकड़े को 2017 तक 24, 2020 तक 21 और 2030 तक 10 पर लाना ही आईएनएपी का उद्देश्य है। मगर ध्यान देने वाली बात यह है कि किसी कार्यक्रम की शुरुआत कर देना ही काफी नहीं होता। अगर इस कार्यक्रम के तहत नियमित निगरानी, मूल्यांकन और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया, तो पहले की तमाम योजनाओं की तरह इस कार्यक्रम को भी अप्रभावी होते देर नहीं लगेगी।
कुछ वर्ष पहले देश में एक कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी, जिसका नाम था, 'नवजातों शिशुओं और बचपन में होने वाली बीमारियों का समन्वित प्रबंधन'(आईएमएनसीआई)। इस कार्यक्रम का उद्देश्य था, घरों में शिशुओं को मिलने वाली देखभाल में सुधार करना और जिन नवजात शिशुओं को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता है, उन पर खास ध्यान देना। यूनिसेफ के समर्थन से शुरू की गई इस पहल के तहत स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को यह जिम्मेदारी दी गई कि वे माताओं को इस तरह प्रशिक्षित करें कि वे अपने बच्चों को होने वाली बीमारियों की जल्दी पहचान और समय पर चिकित्सकीय मदद लेने का फैसला कर सकें। यह कार्यक्रम देश के चुनिंदा जिलों में शुरू किया गया था।
जमीनी स्तर पर इस कार्यक्रम को परखने के लिए मैंने एक दौरा किया, जिसमें मैंने पाया कि यह पहल कितनी अद्भुत हो सकती थी। सुनामी से तबाह हुए निकोबार प्रायद्वीप में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के ध्वस्त हो जाने और डॉक्टरों के अभाव के बावजूद प्रशिक्षित सामुदायिक कार्यकर्ताओं ने कई नवजात शिशुओं की जान बचाई। इतना होने पर भी कहा जा सकता है कि पर्याप्त निगरानी तंत्र के अभाव के चलते यह कार्यक्रम उतना कामयाब नहीं हो सका, जितनी कि इसमें संभावना थी। पिछले दो दशकों में भारत में मातृ मृत्युदर और पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में कमी आई है।
मगर यह चिंताजनक है कि नवजात शिशुओं की मृत्युदर में बेहद धीमी गति से कमी आ रही है। मेलिंडा गेट्स कहती हैं कि पोलियो को जिस तरह से भारत ने शिकस्त दी है, उससे साबित होता है कि तमाम जनसांख्यिकीय, आर्थिक और सामाजिक-सांस्कृतिक चुनौतियों के बावजूद स्वास्थ्य क्षेत्र में ऐसे प्रयास संभव हैं, जिनकी बदौलत हर जरूरतमंद बच्चे तक मदद को पहुंचाया जा सके। उत्तर प्रदेश के लिए यह एक बड़ा मौका है। पोलियो के खिलाफ कामयाब पारी खेलने के बाद अब समय आ गया है कि बुनियादी तंत्र और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं में निवेश के जरिये अपने नवजात बच्चों को बचाने की मुहिम पर फोकस किया जाए।