बजट की प्रक्रिया इस बहस को साथ लेकर जन्मी थी कि आम बजट आम लोगों के लिए क्या ही होता है, बजट और इसके एलान तो खास लोगों के लिए होते हैं, तभी तो बजट याद नहीं रखे जाते थे। मगर आइए, उड़ान भरिए टाइम मशीन में हम आपको मिलवाएं एक ऐसे बजट से, जिसने बजटों की रवायत ही बदल दी। इसके बाद ही बजटों को कसौटी मिली, जिसकी रोशनी में इनके आम बजट होने की पैमाइश की जा सकती है। इस बार टाइम मशीन आपको एक तूफान के बीच ले जाएगी। ठहिरए, यह मौसमी तूफान नहीं है। यह ब्रिटेन की राजनीति का तूफान है, जो एक बजट से पैदा हुआ था। इसके बाद तो बर्तानवी संसद का काम करने का तरीका ही बदल गया।
यात्रीगण कृपया ध्यान दें, आप टाइम मशीन में है और वक्त है बीसवीं सदी की शुरुआत का। आप दुनिया का इतिहास बदलने वाली सदी के पहले वर्ष में हैं यानी साल 1900 में। जरा गौर से देखिए, ब्रिटेन की सियासत में कंजर्वेटिव और लिबरल पार्टी के बीच आपको एक नए दल की आहट सुनाई देगी। ट्रेड यूनियन और समाजवादी आंदोलनों की पृष्ठभूमि से ब्रिटेन में लेबर पार्टी का उदय होने लगा।
इसी दौर में आपको ब्रिटेन की महिला अधिकारों की आवाजें सुनाई देंगी। यह 1901 का साल है, जब रानी विक्टोरिया परलोक सिधार गईं हैं। किंग एडवर्ड सप्तम तख्तनशीं हैं। इसी दौरान ब्रिटेन की प्रधानमंत्री बने हरबर्ट हेनरी एक्विथ यानी एच एच एक्विथ। ब्रिटेन के लोग उन्हें प्यार से ‘एच एच’ या ‘डबल एच’ कहते थे। एिक्वथ लिबरल पार्टी के नेता थे। एच एच के पिता यार्कशॉयर में कपड़े का कारखाना चलाते थे। वाकपटु और बौद्धिक क्षमता से संपन्न एक्विथ तेजी से राजनीति की सीढ़ियां चढ़े। ब्रिटेन के गृह मंत्री रहे और जिस वक्त आप ब्रिटेन में हैं यानी 1905 में तब एिक्वथ देश के वित्त मंत्री थे। एक्विथ एक नए तरह की बजट परिपाटी लेकर आए। उन्होंने ब्रिटेन के ताकतवर अमीरों पर नया टैक्स लगा दिया। हाउस ऑफ लॉर्डस यानी ब्रिटेन का उच्च सदन खफा हो गया।
1908 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री हेनरी कैंपबेल बैनरमैन ने इस्तीफा दे दिया। अब एच एच एक्विथ ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री थे। डेविड लॉयड जॉर्ज उनके वजीरे खजाना यानी वित्त मंत्री बने। लॉयड जॉर्ज को उनके चाचा ने पाला था, जो जूते सिलने का काम करते थे। वाकपटुता और बहस के लिए विख्यात जॉर्ज जब संसद में बोलते थे, तो उनके सामने कोई टिकता नहीं था। जॉर्ज बड़े दबंग थे और प्रधानमंत्री एक्विथ के लिए चुनौती भी। प्रधानमंत्री एच एच ने उनकी लोकप्रियता और क्षमताएं देखते हुए उन्हें वित्त मंत्री बनाया था। लॉयड जॉर्ज के वित्त मंत्री बनते ही ब्रिटेन के वित्तीय इतिहास का सबसे रोमांचक दौर शुरू होता है, जिसने पूरी दुनिया के बजटों को नई राह दिखा दी।
डेविड लॉयड जॉर्ज मानते थे कि ब्रिटेन में गरीबों की फिक्र करने वाले आिर्थक कानून नहीं है। खासतौर पर बुजुर्ग लोग जो काम करने लायक नहीं रहते, उनके लिए कोई मदद ही नहीं है। लॉयड जॉर्ज, जर्मनी के पहले चांसलर और जर्मन राज्य के इतिहास पुरुष ओटो फॉन बिस्मार्क से प्रभावित थे। 19वीं सदी के प्रारंभ में जर्मन राज्यों को एक करने वाले महान नेता बिस्मार्क को कल्याणकारी राज्य के प्रणेताओं में माना जाता है। बुजुर्गों की पेंशन का पहला प्रयोग बिस्मार्क ने ही किया था। 1908 में एच एच ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली। 1909 में डेविड लॉयड जॉर्ज पहला बजट लेकर आए।
इसमें ओल्ड एज पेंशन कानून का प्रस्ताव था, जिसके तहत 70 साल से ऊपर की उम्र के लोगों को पांच शिलिंग प्रति सप्ताह की पेंशन दी जानी थी। ब्रिटेन के लिए यह क्रांतिकारी व्यवस्था थी। वित्त मंत्री डेविड लॉयड ने ब्रिटेन के इनकम टैक्स की व्यवस्था बदल दी। वित्त मंत्री लॉयड ने 5,000 पाउंड सालाना से अधिक आय वालों पर एक सुपर टैक्स लगाने का ऐलान किया। 3,000 पाउंड से ऊपर की आय वालों पर भी टैक्स बढ़ाया गया था। उनके बजट ने विरासत पर लगने वाले टैक्स की दर बढ़ा थी, इस टैक्स को डेथ ड्यूटी कहा जाता था। उन्होंने अमीरों पर वेल्थ टैक्स और कैपिटल गेंस की मिली-जुली व्यवस्था शुरू की, जिसमें संपत्तियों की मिल्कियत और बिक्री से कमाई पर मोटा टैक्स लगाया गया। इन फैसलों ने डेविड लॉयड जॉर्ज के बजट को दुनिया का पहला पीपुल्स बजट बना दिया। यानी वास्तविक आम बजट। टाइम मशीन में आपको अहसास होगा कि प्रधानमंत्री एचएच और वित्त मंत्री लॉयड जॉर्ज के इस बजट से कैसा तहलका मच गया।
डेविड लॉयर्ड जॉर्ज को विंस्टन चर्चिल का समर्थन भी हासिल था। चर्चिल ने बजट लीग नाम से एक प्रेशर ग्रुप बनाया था, जिसने डेविड लॉयड जॉर्ज के प्रस्तावों का प्रचार और समर्थन किया। लॉयड जॉर्ज और चर्चिल की जोड़ी ब्रिटेन की राजनीति में बड़े बदलावों के लिए याद की जाती है। कहते हैं कि दोनों की कोशिश थी कि ब्रिटेन को किसी तरह साम्यवाद या कम्युनिज्म से बचाया जा सके। इसके लिए आम लोगों को ज्यादा सुविधा देना जरूरी था। डेविड लॉयड जॉर्ज का बजट ब्रिटेन के संसद के ऊपरी सदन को पसंद नहीं आया। हाउस ऑफ लॉर्डस में इसका विरोध शुरू हो गया। बजट पास नहीं हो पाया। वहां कंजर्वेटिव पार्टी का दबदबा था। वे अमीरों पर टैक्स बढ़ाने के खिलाफ थे। प्रधानमंत्री एच एच ने सहमति की कोशिश की, मगर बात नहीं बनी। इधर वित्त मंत्री डेविड लॉयड जॉर्ज अपनी सभाओं में हाउस ऑफ लार्डस के खिलाफ आग उगल रहे थे। उनका कहना था कि ब्रिटेन के अमीर बुजुर्ग गरीबों से घृणा करते हैं। प्रधानमंत्री एच एच ने सम्राट एडवर्ड से दखल का अनुरोध किया। अंतत: 30 नवंबर, 1909 को हाउस ऑफ लॉर्डस ने बजट और वित्त विधेयक को नकार दिया।
प्रधानमंत्री एक्विथ की सरकार गिर गई। नए आम चुनाव हुए। जनवरी 1910 में एक्विथ फिर सत्ता में लौटे। मगर सरकार बनाने के लिए उन्हें लेबर पार्टी की मदद लेनी पड़ी। एच एच इस बार तैयारी से आए थे। उन्होंने हाउस आफ लार्डस के अधिकार सीमित करने का विधेयक पेश कर दिया। इस कानून के तहत प्रस्ताव किया गया कि अगर निचले सदन यानी हाउस आफ कामंस ने किसी कानून को तीन बार पारित किया है, तो फिर ऊपरी सदन यानी लॉर्डस इसे नहीं रोक सकता। बस फिर क्या था, ब्रिटेन की राजनीति में तूफान उठ खड़ा हुआ। एक तरफ था पीपुल्स बजट, तो दूसरी तरफ उसे रोने वाले सामंतों का अपर हाउस यानी संसद का हाउस ऑफ लॉर्डस। इस बीच सम्राट एडवर्ड का निधन हो गया। तख्त पर आए जॉर्ज पंचम।
पीपुल्स बजट पर विवाद चरम पर था। एक संविधान समिित बनी, मगर टंटा दूर नहीं हुआ। बजट फंस गया था। प्रधानमंत्री एक्विथ और वित्त मंत्री डेविड लॉयड टैक्स में बढोत्तरी और पेंशन सुधारों को वापस लेने पर तैयार नहीं थे। गतिरोध इतना बढ़ा कि 1910 के दिसंबर में फिर आम चुनाव हुए। संसद का गणित जस का तस रहा। हाउस ऑफ काॅमंस का राजनीतिक संतुलन नहीं बदला। प्रधानमंत्री एच एच इस बार एक मजबूत राजनीतिक पेशबंदी के साथ आए थे। नए निचले सदन के गठन के साथ उन्होंने न केवल ऊपरी सदन की ताकत सीमित करने का विधेयक पेश किया, बल्कि लेबर पार्टी के साथ मिलकर हाउस ऑफ लॉर्डस की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव भी रख दिया।
अब बाजी पलट गई। एक्विथ का ऐतिहासिक कानून 1911 में पािरत हुआ। बजट के मामलों में हाउस ऑफ लॉर्डस के अधिकार सीमित हो गए। विश्व के इतिहास का पहला आम बजट हकीकत बन गया था। सरकारों को अमीरों पर टैक्स लगाने का रास्ता मिल गया था। टाइम मशीन वापस 2024 के भारत में लौट आई है, जहां आम बजट के अंतिरम संस्करण की तैयारी चल रही है। आप भी सोच रहे होंगे न कि बजटों को जनोन्मुख बनाने के लिए बीसवीं सदी की शुरुआत में जैसे आंदोलन हुए, क्या आज की राजनीति में फिर ऐसा होना मुमिकन है ?