लोकसभा चुनाव का असर भले ही बड़े शहरों के मॉल्स पर न पड़ा हो, मगर खेत-खलिहान तक पहुंच ही गया है। एक किसान ने अपनी ट्रैक्टर-ट्रॉली पर ‘सोचकर सोचो- साथ क्या जाएगा’ के स्थान पर लिखवा लिया ‘सोचकर सोचो- कैसे दिन आएंगे’। उस दिन जब रात में इन्वर्टर की सीटी बोलने पर पत्नी ने पंखा बंद किया, तो उस किसान की याद आ गई।
पत्नी बोली, बिजली का स्वभाव चुनाव जीते हुए नेता की तरह हो गया है। मतदान से पहले तक बराबर आती रही, और अब उन क्षेत्रों में चली गई है, जहां मतदान होना है। नेताओं की तरह मंद-मंद मुस्कराते हुए मैंने कहा, चुनाव एक तूफान की तरह है। तूफान में तमाम व्यवस्थाएं ध्वस्त हो जाती हैं। चुनाव खर्च की भरपायी के लिए जनता पर टैक्स का बोझ बढ़ाया जाता है। संयोग से इस बार का बजट आना बाकी है। मौसम विभाग भी पहले ही कह चुका है कि मानसून के भरोसे अच्छे दिनों की उम्मीद मत करियो।
बहरहाल जब नींद खुल ही गई, तो वार्तालाप ने गति पकड़ ली। पत्नी नेताओं की फिसलती ‘टंग’ पर बोल रही थी, तो मैं पाकिस्तान के कश्मीर वाले ‘बम’ पर। पाकिस्तान के बयान से ऐसा नहीं लगता कि विदेश मंत्रालय के अच्छे दिन आने वाले हैं। दिल्ली में गैस के दाम बढ़ चुके हैं। वहां बिजली झटके देने की प्रैक्टिस कर रही है। सियासत में किसके अच्छे दिन आएंगे और किसके बुरे, यह तो सोलह मई के बाद पता चलेगा, मगर घटिया टाइप की प्रेमकथाओं के पढ़ने का क्रेज बढ़ गया है।
पत्नी राजनीति में खत्म हो रही सदाशयता से चिंतित है। उसे हमारा गांव बेतरह याद आता है। वहां जाति-धर्म से परे कोई हमारा चाचा होता था, तो कोई ताऊ। जब किसी बेटी की डोली उठती थी, तो पूरा गांव रोता था। परिवारों के बीच चले आ रहे रिश्तों को निभाना पड़ता है। राजनीति ने सब कचरा कर दिया!
किसान ने अपनी ट्रॉली पर ‘कैसे दिन आएंगे’ का प्रश्न उठाकर यह संदेश जरूर दे दिया है कि अच्छे दिन तो शायद ही आ पाएं। सबसे मौजूं प्रश्न तो यह है कि राजनीति में कैसे दिन आने वाले हैं!