भारत जैसे कृषि प्रधान देश में किसान होना ही अपराध बन गया है। जिन किसानों ने हमें न सिर्फ खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि निर्यातक देश का भी दर्जा दिलाया, उनको प्रोत्साहन देने के बजाय उत्पादन लागत से भी कम समर्थन मूल्य देकर उनका घोर उत्पीड़न किया जा रहा है और खाद्य सुरक्षा के साथ भी खिलवाड़ किया जा रहा है।
वर्ष 1965 तक देश की जनता का पेट भरने के लिए पीएल, 480 के तहत अपमानजनक शर्तों पर गेहूं का आयात करना पड़ता था। परंतु हरित क्रांति के प्रारंभ में उन्नत बीजों और खर्चीली कृषि तकनीक के प्रयोग तथा सरकार द्वारा उचित समर्थन मूल्य देने से किसानों ने गेहूं के उत्पादन में देश को आत्मनिर्भर बना दिया।
उसके एक दशक बाद ही कृषि अनुसंधान की अनदेखी और उर्वरकों के असंतुलित प्रयोग, घटती फसल विविधता, घटते जलस्तर, गैर कृषि कार्यों में बढ़ता कृषि क्षेत्रफल एवं समर्थन मूल्य में अपेक्षाकृत कम वृद्धि के कारण गेहूं उत्पादन में ठहराव तो आया ही, 2006-2007 में भारत को पुनः गेहूं आयातक देश बना दिया। हालांकि जब सरकार ने गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया, तो किसानों ने वर्ष 2010-11 में 8.55 करोड़ टन, वर्ष 2011-12 में 9.39 करोड़ टन गेहूं का उत्पादन किया और देश को पुनः गेहूं का निर्यातक बना दिया।
मगर, वर्ष 2013-14 के लिए केंद्र ने गेहूं के समर्थन मूल्य में मात्र 65 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि करके इसका न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,350 रुपये प्रति क्विंटल घोषित किया है। समर्थन मूल्य घोषित करते समय गेहूं की उत्पादन लागत में वृद्धि के स्थान पर देश में गेहूं के कुल उत्पादन को ध्यान में रखा गया है। पिछले एक वर्ष में डीजल की कीमत 13 प्रतिशत, डीएपी उर्वरक की कीमत 96 प्रतिशत, मजदूरी व भूमि के किराये में 25 प्रतिशत, कटाई व जुताई के खर्च में क्रमशः 25 व 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
कृषि मंत्रालय में फसलों की उत्पादन लागत निकालने की पद्धति आधारहीन, काल्पनिक एवं त्रुटिपूर्ण है। पिछले वर्ष 30 नवंबर को कृषि मंत्री ने लोकसभा में दिए गए बयान में कहा था कि पिछले वर्ष 927 रुपये के गेहूं उत्पादन लागत मूल्य के आधार पर 1,285 रुपये प्रति क्विंटल समर्थन मूल्य निर्धारित किया गया था। उन्होंने चालू सीजन के लिए गेहूं के उत्पादन लागत मूल्य का आकलन 1,128 रुपये प्रति क्विंटल बताया था।
पर आश्चर्य इस बात का है कि उत्पादन लागत में 201 रुपये प्रति क्विंटल वृद्धि होने पर भी न्यूनतम समर्थन मूल्य में मात्र 65 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई है। डॉ स्वामीनाथन के अनुसार, फसलों के उत्पादन लागत मूल्य से 50 प्रतिशत अधिक समर्थन मूल्य निर्धारित करना चाहिए। चालू सीजन में गेहूं के वास्तविक उत्पादन लागत मूल्य का आकलन 1,500 रुपये प्रति क्विंटल से भी अधिक किया गया है। उसके अनुसार गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,000 रुपये प्रति क्विंटल से अधिक होना चाहिए।
वर्ष 2011-12 में देश की आवश्यकता से अधिक 9.39 करोड़ टन गेहूं का रिकॉर्ड उत्पादन होने से इतनी अधिक सरकारी खरीद हुई कि गेहूं भंडारण को स्थान नहीं मिला। यही नहीं, सरकार ने खुद माना कि पिछले वर्ष 58,000 करोड़ रुपये का गेहूं उचित रखरखाव के अभाव में सड़ गया, जो कुल भंडारण का 15 प्रतिशत था। वर्तमान में सस्ते अनाज की वितरण व्यवस्था पर 68,000 करोड़ रुपये से अधिक सब्सिडी दी जा रही है। नया खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने पर 95,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी का बोझ सरकारी खजाने पर पड़ेगा। यदि देश की आवश्यकता से अधिक गेहूं का निर्यात कर दिया जाता, तो पहले तो वह सड़ने से बचता और यदि यह धनराशि सब्सिडी के रूप में किसानों को दे दी जाती, तो लाभकारी मूल्य मिलने से किसान भी संतुष्ट हो जाते।
देश में गेहूं उत्पादक प्रांतों में कृषि योग्य उपजाऊ भूमि का अंधाधुंध अधिग्रहण और अन्यत्र उपयोग के कारण कृषि भूमि घट रही है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण भी गेहूं की उपज में लगातार कमी हो रही है। यदि किसानों को गेहूं का लाभदायक मूल्य नहीं दिया गया, तो किसान इसकी खेती से विमुख हो जाएंगे और देश के लिए खाद्य सुरक्षा का संकट पैदा हो जाएगा।