पाकिस्तान की सियासत में बिलावल भुट्टो जरदारी के प्रवेश ने एशिया की वंशवादी परंपरा में एक नया रंग भर दिया है। बिलावल का अर्थ होता है- बेजोड़। लेकिन पाकिस्तान की अशांत राजनीति के इस नए खिलाड़ी को अपने दुश्मनों पर फतह हासिल करने से पहले उन सियासी संकटों से पार पाना होगा, जो उनके प्रवेश के साथ ही कई गुना बढ़ गए हैं। इसके साथ ही उन्हें अपने ही नहीं, दूसरे देशों के उन लोगों के बरक्स आंका जाएगा, जो उनसे पहले राजनीति में आए हैं। बिलावल ने अपने करियर की शुरुआत मीडिया के अनुसार 27 दिसंबर को 'उग्र भाषण' के जरिये उसी तरह की, जैसी कि उनसे अपेक्षा थी। शायद उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था।
अक्सर परिवार के बड़े लोगों की विदाई, अमूमन हिंसक अंत, के साथ ही राजनीति में किसी का उदय होता है। ऐसा सिर्फ पारिवारिक परंपरा के रूप में नहीं होता, बल्कि इसके पीछे दिवंगत नेता के प्रभामंडल का असर भी होता है। इसके अलावा इसे परिवार की जनसेवा की 'परंपरा' के बतौर भी पेश किया जाता है। विरासत के संरक्षण के अलावा यह पार्टी के भीतर किसी सत्ता संघर्ष के दमन का भी एक तरीका है। बिलावल ने अपनी करिश्माई मां बेनजीर भुट्टो की पांचवीं बरसी के दिन राजनीति में प्रवेश किया। पिता जुल्फीकार अली भुट्टो की फांसी के बाद खुद बेनजीर के पास भी राजनीति में आने के अलावा कोई चारा नहीं था। यह एक पूर्व नियोजित कार्यक्रम था, जिसे भुट्टो खानदान की कब्रगाह पर दो लाख से ज्यादा लोगों की मौजूदगी में नाटकीय ढंग से अंजाम दिया गया।
चाहे कोई माने या न माने, लेकिन वंशवाद दक्षिण एशिया का रोग है, हालांकि इसे अलोकतांत्रिक माना जाता है। अपनी मां की जगह लेने के लिए बिलावल के पास शायद किसी से भी ज्यादा कारण हैं। उनमें सबसे महत्वपूर्ण है, अपने पिता राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को आराम देना, जो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के शीर्ष पद पर वर्षों से हैं। जरदारी बुरी तरह से अलोकप्रिय हैं और राष्ट्रपति पद पर बने रहना उन्हें और अलोकप्रिय बनाता है। उन्हें न केवल भुट्टो के प्रभामंडल का अनधिकृत फायदा उठाने वाले के रूप में देखा जाता है, बल्कि ऐसे व्यक्ति के रूप में भी देखा जाता है, जो कई हत्याओं और भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद केवल देश के शीर्ष पद पर रहने के कारण जेल जाने से बचे रहने में कामयाब रहा। राष्ट्रपति भवन में रहते हुए पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की राजनीति करने के चलते देश की न्यायपालिका की ओर से जरदारी को आलोचना का भी सामना करना पड़ा है।
शायद बिलावल का पीपीपी का नेतृत्व संभालना अनिवार्य था, और देश के लिए नहीं, तो कम से कम पार्टी के लिए यह अच्छा हो सकता है। राष्ट्रपति भवन में लंबे समय तक नहीं रहने के बावजूद वह एक राजनेता के रूप में देखे जाएंगे। इन सबको देखते हुए जरदारी ने न केवल बिलावल के नाम में भुट्टो का नाम जोड़ा, बल्कि उन्हें बलूचिस्तान के जरदारी कबीले का मुखिया नियुक्त करना भी सुनिश्चित किया। इसलिए बिलावल पर दोहरी बरकत है, लेकिन इसके साथ ही उनकी दोहरी मुश्किलें भी हैं। जिस देश में पंजाब का खासा महत्व है, वहां वह बलूच पिता और सिंधी मां की संतान हैं। इस 24 वर्षीय युवा नेता के लिए नई जिम्मेदारी एक चुनौती है। वह एक ऐसे पार्टी प्रमुख होंगे, जिन्हें अब तक जांचा-परखा नहीं गया है। उनसे पार्टी को नेतृत्व प्रदान करने और भुट्टो के करिश्मे का उपयोग कर वोट बटोरकर पीपीपी को जिताने की अपेक्षा होगी।
यदि अगली गर्मियों में, यानी संभवतः अप्रैल या मई में चुनाव होंगे, तो वह चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। वह चुनाव लड़ने के योग्य (25 वर्ष के) सितंबर में ही हो पाएंगे। एक ऐसे देश में, जहां सौंदर्य मायने रखता है, वहां बिलावल के राजनीति में आने का अर्थ है। वह अपने पिता की तरह ऊंचे कद के हैं और मां की तरह सुंदर दिखते हैं। वह ताइक्वांडो मेें ब्लैक बेल्ट हैं और क्रिकेट खेलते हैं, हालांकि सुरक्षा कारणों से उन्हें ज्यादा मौके नहीं मिलते। उनका सियासी सफर आसान नहीं रहने वाला है। उन्हें अन्य लोगों के अलावा दुनिया भर में मशहूर एवं आकर्षक इमरान खान से मुकाबला करना होगा, जो उम्र और अनुभव के मामले में उनसे काफी आगे हैं।
बचपन का काफी समय दुबई में गुजारने और ऑक्सफोर्ड में पढ़ाई करने वाले बिलावल की अरबी और अंग्रेजी अच्छी है। हो सकता है, वह निजी बातचीत में उर्दू का प्रयोग करते हों, पर भाषणों में नहीं। वह विदेशों में पढ़ने वाले राजनीतिक कुलीन परिवार की तीसरी पीढ़ी हैं। भुट्टो परिवार को अमेरिका के कैनेडी, बांग्लादेश के दोनों प्रतिस्पर्द्धी रहमान परिवारों या भारत की इंदिरा गांधी के परिवार के समान माना जाता है। यदि वह लंबे समय तक राजनीति में टिके रहे, तो मां की तरह वह अपनी भाषा को तराश सकते हैं। उन्हें अपनी मामी गिनवा और ममेरी बहन फातिमा से भी मुकाबला करना होगा, जिनके सियासी करियर की बुनियाद ही 'बड़ी बुआ' बेनजीर की घृणा पर टिकी है। वे बेनजीर पर उनके छोटे भाई मुर्तजा और शहनवाज को खत्म करने का आरोप लगाती हैं। इस आरोप का सामना जरदारी को भी करना पड़ा है।
विवाद या कम से कम एक स्कैंडल बिलावल के राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश से पहले ही है। पिछले वर्ष उनका नाम उम्र में बड़ी, मगर बेहद खूबसूरत विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार के साथ जोड़ा गया था। विवाहित और दो बच्चों की मां हिना के लिए इस स्कैंडल को दबाना मुश्किल भरा क्षण था। अब जबकि बिलावल एक राजनेता बन गए हैं, तो पाकिस्तान की राजनीतिक परंपरा को देखते हुए लगता है कि ऐसे स्कैंडल्स में इजाफा होगा। अब जब वह सियासत में कदम रख चुके हैं, तो उनकी जान को भी कम जोखिम नहीं है। लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पाकिस्तान के तालिबान, सेना और आईएसआई उन्हें किस तरह देखती है।