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धूप आने दो: 'नालंद' की  गौरव गाथा ऐसे ही अमिट नहीं बनी, उसके पीछे है विद्या का केंद्र बनाने की अद्भुत इच्छा

डॉ. ज्ञानेंद्र नारायण राय Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Sun, 30 Jun 2024 08:00 AM IST

सार

मूलतः 'नालंद' और प्रचलित 'नालंदा' की  गौरव गाथा ऐसे ही अमिट नहीं बनी, उसके पीछे उसे विद्या का केंद्र बनाने की अद्भुत इच्छा शामिल थी। इतिहास लेखन के लिए प्रायः द्वितीयक स्रोतों का सहारा लेकर और प्राथमिक स्रोतों को अपने हिसाब से तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने से इतिहास और वर्तमान, दोनों के साथ अन्याय होता है।
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नालंदा यूनिवर्सिटी - फोटो : पीटीआई


फाह्यान के समय तक विद्या के केंद्र के रूप में नालंद की कोई ख्याति नहीं थी। फाह्यान के लगभग तीन शताब्दियों के बाद जब ह्वेनसांग नालंद आया, उस समय यहां पर एक अंतरराष्ट्रीय ख्याति का विद्या केंद्र था। ह्वेन सांग के अनुसार, इस विद्या केंद्र की स्थापना शक्रादित्य नामक नरेश द्वारा की गई थी। 'शक्र' शब्द इंद्र का पर्याय है तथा मुद्रा साक्ष्य के अनुसार महेंद्रादित्य कुमारगुप्त प्रथम से उसका एका संभाव्य है। इस आधार पर नालंद विश्वविद्यालय की स्थापना कुमारगुप्त प्रथम द्वारा किया जाना स्थापित होता है। शक्रादित्य के बाद बुद्धगुप्त, तथागतगुप्त, बालादित्य वज्र तथा हर्षादि ने नालंद में भवन आदि का निर्माण करवाया तथा विद्या केंद्र को आर्थिक सहायता भी प्रदान की। हर्ष ने यहां पर पीतल का एक विहार तथा उसके चारों ओर एक दीवार बनवाने के साथ ही एक संघाराम का भी निर्माण किया, जिसमें 40 भिक्षुओं के भोजन की व्यवस्था की गई थी। ह्वेनसांग लिखता है कि उसके आगमन पर शक्रादित्य द्वारा निर्मित विहार जीर्णावस्था को प्राप्त हो चुका था। लेकिन नालंद महाविहार के संरक्षण और संवर्धन से जुड़े हमें कई ताम्रलेख प्राप्त हैं, जिनमें से कुछ का प्रकाशन हीरानंद आदि विद्वानों ने एपीग्राफिया इंडिका के वॉल्यूम 20 और 21 में नालंद ऐंड इट्स एपीग्रैफिक मैटेरियल्स शीर्षक से प्रकाशित किया है। उनमें से एक के अनुसार, वहां कई विहार एक ही पंक्ति में थे, जिनके शिखर गगनचुंबी थे।


यस्याम्बुधरावलेहिशिखरश्रेणी विहारावली।

मालेवोधर्वविराजिनी विरचिता धात्रा मनोज्ञा भुवः।।


इत्सिंग भी पुष्टि करता है कि वहां के भवन बादलों को छूते हुए से लगते थे। नालंद के विद्यार्थियों को निःशुल्क भोजन, वस्त्र के साथ शिक्षा दी जाती थी। ह्वेनसांग इस महाविहार को भारतीय राजाओं द्वारा प्रदान की जाने वाली सुविधाओं की प्रशंसा करते हुए लिखता है कि इसे दो सौ गांव आर्थिक सहायता के लिए प्रदान किए गए थे। विश्वविद्यालय की अपनी निजी मुद्रा थी, जिस पर ‘श्री नालंदा महाविहार-आर्य-भिक्षु-संघस्य’ लेख उत्कीर्ण है। इस विश्वविद्यालय से देश-विदेश के कई अन्य विद्यालय भी संबद्ध थे और उनकी अलग-अलग मुद्राएं थीं।


हर्ष के बाद भी कतिपय भारतीय नरेशों ने इस विद्या केंद्र को आर्थिक सहायता प्रदान की थी। यशोवर्मदेव नाम के सम्राट के एक मंत्री ने नालंद को इतना अधिक दान दिया था, जिससे इसके भिक्षुओं को कई वर्षों तक प्रतिदिन भोजन दिया जा सकता था। बंगाल के पाल नरेशों ने भी नालंद के इस विद्या केंद्र में रुचि ली थी। देवपाल के एक शिलालेख में विदेशी राजा द्वारा अपने राजदूत के माध्यम से इस विश्वविद्यालय के लिए अनुदान का संदर्भ प्राप्त होता है। राजाओं के अनुदान तथा जनसहभागिता के साथ-साथ यह विश्वविद्यालय खेती एवं गो-पालन के द्वारा स्वयं भी अन्न तथा दूध का उत्पादन करता था।


इस विद्या केंद्र को लब्धप्रतिष्ठित विद्वान सुशोभित करते थे। ह्वेनसांग ने अपने समकालीन नालंद के आचार्यों का उल्लेख किया है। इस समय शीलभद्र इस केंद्र के कुलपति थे, जो इस चीनी यात्री के आचार्य रह चुके थे। ह्वेनसांग ने धर्मपाल नामक आचार्य का भी उल्लेख किया है, जो शीलभद्र के पहले नालंद के कुलपति रह चुके थे। उन्होंने आचार्य चंद्रगोमिन के व्याकरण पर संस्कृत मंे 'वर्ण-सुत्र-वृत्ति-नाम' नामक एक व्याकरण टीका लिखी थी। ह्वेनसांग ने अन्य आचार्यों का भी उल्लेख किया है, जिनमें चंद्रपाल, गुणमति, स्थिरमति, प्रभामित्र, जिनमित्र तथा ज्ञानचंद्र प्रमुख हैं। शिक्षकों में शीलभद्र, नागार्जुन, आर्यदेव, असंग, वसुबंधुु और दिङ्नाग जैसे विद्वान आचार्य भी थे। राधाकुमुद मुखर्जी लिखते हैं कि यहां अध्ययन के विषय के दृष्टिकोण से उदारता प्रकट होती है। ब्राह्मण धर्म एवं बौद्ध धर्म के ग्रंथ, धार्मिक और आमुष्मिक विषय, कला व विज्ञान, शिल्प व उद्योग की शिक्षा की व्यवस्था थी। हेतुविद्या (तर्क), शब्द विद्या (व्याकरण), चिकित्सा विद्या (भैषज्य), सांख्य, योग, न्याय और सर्वास्तिवाद, माध्यमिक आदि बौद्ध दर्शनों की शिक्षा का पूर्ण प्रबंध था।


ह्वेनसांग के वर्णन से लगता है कि इस विश्वविद्यालय मंे प्रवेश पाना दुष्कर था। इसके प्रधान द्वारों के सामने पंडितों की नियुक्ति की गई थी, जिन्हें द्वार पंडित कहा जाता था। वे विविध विषयों के विशेषज्ञ हुआ करते थे। प्रवेश चाहने वाले विद्यार्थियों की योग्यता की परीक्षा लेने के लिए वे दार्शनिक विषयों तथा जटिल समस्याओं पर कड़े प्रश्न पूछते थे। समुचित उत्तर देने के बाद ही उन्हें प्रवेश की आज्ञा मिलती थी। ह्वेनसांग लिखता है कि करीब बीस प्रतिशत विद्यार्थी ही बड़ी मुश्किल से सफल हो पाते थे। विदेशी छात्र बौद्ध ग्रंथों की प्रतिलिपियों को प्रस्तुत करने तथा ज्ञानोपार्जन में संलग्न रहते थे। अध्ययन के पश्चात ये विद्यार्थी स्वदेश जाकर नालंद की ख्याति को प्रसारित करते थे।


दुर्भाग्यवश इधर कुछ वर्षों से इस विद्या केंद्र के विध्वंस की घटना को ब्राह्मणों तथा बौद्धों के बीच संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाने लगा है। प्रो. डीएन झा के लेख ‘प्राचीन बौद्ध स्थलों का विनाश’ को साझा करते हुए कहा जा रहा है कि ‘हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा लगाई गई आग में नालंदा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था, फिर भी इसके विनाश का श्रेय मामलुक कमांडर बख्तियार खिलजी को दिया जाता है। हालांकि खिलजी ने पास के एक विहार को ध्वस्त किया था, लेकिन नालंदा नहीं गया था।’ प्रोफेसर झा ने यह बात सबसे पहले 2006 में भारतीय इतिहास कांग्रेस के अधिवेशन में ब्राह्मण-बौद्ध संघर्ष की चर्चा करते हुए कही थी। प्रो. झा द्वारा जिन संदर्भों का सहारा लिया गया है, उनकी समीक्षा आवश्यक है। पहला संदर्भ उन्होंने सुंपा खान पोयेसे पाल जोर की पुस्तक पैग सैम जॉन जांग से लिया है, जो नालंद की विनाशकारी घटना के लगभग 500 वर्ष बाद 1704-88 के बीच लिखी गई थी। दूसरा वह लिखते हैं कि ‘एक तिब्बती परंपरा में कहा गया है कि 11वीं शताब्दी में कलचुरी राजा कर्ण ने मगध में कई बौद्ध मंदिरों व  मठों को नष्ट किया था’, और पैग सैम जॉन जांग में कुछ ‘हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा नालंदा के पुस्तकालय को जलाने का उल्लेख है।’
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लेकिन सच्चाई यह है कि पहले संदर्भ के लिए प्रयुक्त अंश का प्रतिष्ठित बौद्ध विद्वान गेशे दोरजी दामदुल द्वारा अनुवाद किया गया। अनुवाद में कहा गया है कि ‘नालंदा में राजा के एक मंत्री, काकुतसिता द्वारा एक मंदिर निर्माण के उत्सव के दौरान, कुछ शरारती नौसिखिए भिक्षुओं ने दो गैर-बौद्ध भिक्षुओं पर (बर्तन) धोने के पानी के छींटे डाले और दोनों को दरवाजे और दरवाजे की चौखट के बीच में दबा दिया। इससे क्रोधित होकर, एक (भिक्षु) जो उस भिक्षु का सेवक था, जिसने सूर्य की सिद्धि प्राप्त करने के लिए 12 साल तक एक गहरे गड्ढे में बैठकर तपस्या की थी। सिद्धि प्राप्त करने के बाद, उसने अग्नि पूजा (हवन) की राख को 84 बौद्ध मंदिरों पर फेंक दिया। वे सब जल गए। विशेष रूप से, शास्त्रों को आश्रय देने वाले नालंदा के तीन धर्मगंजों मंे भी आग लग गई, तब रत्नाधाती मंदिर की नौवीं मंजिल पर रखे गुह्यसमाज और प्रज्ञापारमिता ग्रंथों के ऊपर से पानी की धाराएं नीचे चलीं, जिससे कई शास्त्र बच गए... अपने आप हुए बलिदान के कारण उन दोनों भिक्षुओं की मौत हो गई।’


दरअसल, प्रोफेसर झा ने जिस घटना के लिए लगभग 500 वर्ष बाद लिखी हुई पुस्तक का संदर्भ लिया है, उसमें एक काल्पनिक कथा को आधार बनाया गया है। जबकि नालंद विनाश की घटना के समकालीन मौलाना मिन्हाज-उद-दीन की लिखी हुई पुस्तक तबकात-ए-नासिरी के वॉल्यूम-1 (अंग्रेजी अनुवाद) के पृष्ठ संख्या 552 पर स्पष्ट उल्लेख है कि मुहम्मद बख्तियार खिलजी 200 घुड़सवार सैनिकों के साथ नालंदा में पहुंचा, ब्राह्मणों के सिर मुंडवाकर उन्हें मार डाला और विद्या स्थान, जिसे हिंदवी भाषा में विहार कहते हैं, नष्ट किया। इतने स्पष्ट और समकालीन प्रमाण को अनदेखा करते हुए वह इस घटना को नालंद का मानने से ही इन्कार कर देते हैं और इसे ओदंतपुरी की घटना बताते हैं, जबकि बिहार में ओदंतपुरी की कोई स्पष्ट मार्किंग ही नहीं हो सकी है। आखिर कोई भी मार्क्सवादी-तर्कवादी इतिहासकार अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए सिद्धि प्राप्ति, राख से अग्निकांड, किताबों से पानी बहने, स्वतः आत्मदाह जैसे चमत्कारों पर कैसे भरोसा कर सकता है?


 19-20वीं सदी से लेकर आज तक के इतिहासकार, जिन्होंने प्राथमिक स्रोतों एवं पुरातात्विक सामग्री के आधार पर इतिहास लेखन किया है, नालंद के संदर्भ में एकमत हंै कि इसके विनाश का मुख्य कारण मोहम्मद बख्तियार खिलजी ही है। विंसेंट ए. स्मिथ ने समकालीन दस्तावेजों के हवाले से लिखा है कि कैसे खिलजी ने नालंद को जलाकर नष्ट कर दिया था और वहां के सभी ब्राह्मणों को सिर मुंडवाकर मार डाला। यही बात डॉ. बीआर आंबेडकर, प्रसिद्ध इतिहासकार विल डुरंट तथा हार्टमुट शार्फे भी कहते हैं। इतिहास लेखन के लिए प्रायः द्वितीयक स्रोतों का सहारा लेकर और प्राथमिक स्रोतों को अपने हिसाब से तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने से इतिहास और वर्तमान, दोनों के साथ अन्याय होता है।  


इतिहास को इतिहास की तरह लें

प्रधानमंत्री मोदी ने 19 जून को नवनिर्मित नालंदा विश्वविद्यालय के परिसर का उद्घाटन करते वक्त पुराने नालंदा विश्वविद्यालय की याद दिलाते हुए कहा, 'नालंदा इस सत्य का उद्घोष है कि आग की लपटों में पुस्तकें भले जल जाएं, लेकिन आग की लपटें ज्ञान को नहीं मिटा सकतीं।' इस भाषण पर इतिहास को लेकर ही बहस छिड़ गई।


यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि न केवल नालंदा, बल्कि बिहार और पश्चिम बंगाल स्थित कई विश्व प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों को मुस्लिम आक्रांताओं ने नष्ट किया था। कुछ इतिहासकार इसके उलट दावा करते हैं कि नालंदा को आग के हवाले हिंदुओं ने ही किया। हालांकि इन विचारों का कोई पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिलता। एक प्रमुख इतिहासकार रोमिला थापर ने भी एक जगह तुर्कों के ही आक्रमण के बाद से नालंदा के विनाश की बात प्रकारांतर से कही है।


इस संबंध में डॉ. भीमराव आंबेडकर लिखते हैं

(अंबेडकर समग्र भाग 3; पृ. 232-33)-'मुसलमान आक्रमणकारियों ने नालंदा, विक्रमशिला, जगद्दला, ओदंतपुरी आदि के बौद्ध विश्वविद्यालयों को नष्ट कर दिया। उन्होंने उन बौद्ध मठों को मटियामेट कर दिया, जिनसे देश भरा था। मुस्लिम आक्रमणकारियों की तलवार से बौद्ध पुरोहित वर्ग किस प्रकार नष्ट हो गया, यह स्वयं मुस्लिम इतिहासकारों ने दर्ज किया है।...यह इस्लामी आक्रमणकारियों द्वारा किया गया बौद्ध पुरोहितों का कत्लेआम था। जड़ पर ही कुल्हाड़ी मारी गई, क्योंकि पुरोहित वर्ग की हत्या करके इस्लाम ने बौद्ध धर्म की हत्या कर दी। यह भारत में बुद्ध के धर्म पर आई सबसे बड़ी आपदा थी।... बौद्ध धर्म की लौ जलाए रखने वाला कोई नहीं बचा।


विंसेंट स्मिथ कहते हैं

(भारत का प्रारंभिक इतिहास (1924, पृष्ठ 419-420): 'बिहार के किले (नालंदा विश्वविद्यालय) पर केवल दो सौ घुड़सवारों के एक दल ने कब्जा कर लिया था। बौद्ध भिक्षुओं का कत्लेआम इतना पूर्ण था कि जब विजेता ने मठों के पुस्तकालयों में पुस्तकों की सामग्री को समझाने में सक्षम किसी व्यक्ति की तलाश की, तो एक भी जीवित व्यक्ति नहीं मिला, जो उन्हें पढ़ने में सक्षम हो। पुस्तकालय मे आग लगा दी गई।' जाहिर है, अब नालंदा के अतीत के नाम पर बेवजह वितंडा खड़ा करने की कोई जरूरत नहीं है।     -प्रो. मक्खन लाल, इतिहासकार

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