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फिर न्याय मिलने में देरी होगी ही

Sun, 10 May 2015 07:24 PM IST
तवलीन सिंह
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सलमान खान अगर सलमान खान न होते, तो सड़क दुर्घटना के उनके मामले में इतना हंगामा होता क्या? तब निचली अदालत भी शायद इतनी सख्ती से उन्हें पांच साल की सजा न देती; यह अलग बात है कि हाई कोर्ट ने उन्हें जमानत दी है। निजी तौर पर मैं यह सवाल इसलिए भी पूछना चाहूंगी, क्योंकि मैं खुद भी कोई पंद्रह वर्षों से न्याय हासिल करने की कोशिश कर रही हूं एक सड़क दुर्घटना वाले मुकदमे में, जो अभी तक अदालत में पहुंचा ही नहीं, और अब शायद उस केस की फाइल ही गायब हो गई होगी।
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हुआ यह कि दिल्ली के हयात होटल के पास से मैं अपनी मारुति गाड़ी चलाती हुई गुजर रही थी कि पीछे से तेज रफ्तार से आती एक डीटीसी बस ने मेरी कार को टक्कर मारी। मुझे खास चोटें नहीं आईं, लेकिन मेरी गाड़ी का इतना बुरा हाल हुआ कि दरवाजे तक खोलने मुश्किल हो गए थे। बस का ड्राइवर यह जानता हुआ, कि गलती उसी की है, फौरन फरार हो गया। मैं एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते सीधे पुलिस थाने पहुंची और एफआईआर दर्ज कराया। पिछले पंद्रह वर्षों से मैं इंतजार कर रही हूं कि यह मामला अदालत तक कब पहुंचेगा। आज तक मैं यह भी नहीं जानती हूं कि उस बस के ड्राइवर के साथ क्या हुआ।

मगर सलमान खान जैसे लोग सड़क दुर्घटना के मामले में फंसते हैं, तो छूटने या भाग जाने की उम्मीद नहीं कर सकते। यह पूरी तरह सच भले न हो, पर ऐसा लगने लगा है इन दिनों कि धनवानों और सेलिब्रिटियों के प्रति ज्यादा सख्ती बरती जाती है। एक उदाहरण सहारा समूह के मालिक भी हैं, जो एक वर्ष से जेल में हैं, सिर्फ इसलिए कि 10,000 करोड़ रुपये की जमानत नहीं दे पा रहे हैं। यह छोटी रकम नहीं है, लेकिन यदि वह यह रकम नहीं अदा कर पाते हैं, तो शायद उन्हें पूरी उम्र जेल में ही गुजारनी पड़े।
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सलमान खान की सजा से अन्य सवाल भी उठते हैं। इनमें सबसे अहम सवाल यह है कि करीब तेरह वर्ष क्यों लगे मामले के यहां तक पहुंचने में। आंकड़े बताते हैं कि 2013 के अंत तक देश की अदालतों में 3,13,67,915 मुकदमे चल रहे थे निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक। कुछ वर्ष पहले प्रख्यात अर्थशास्त्री और अब नीति आयोग से जुड़े बिबेक देबराय ने मुझे कहा था कि अपने देश में जिस रफ्तार से न्याय की गाड़ी चल रही है, 300 वर्ष लग सकते हैं पुराने मुकदमों को खत्म होने के लिए।

न्यायाधीशों का गंभीर अभाव है हमारी अदालतों में। अमेरिका में जहां दस लाख की आबादी पर सौ न्यायाधीश नियुक्त होते हैं, अपने यहां दस लाख की जनसंख्या के लिए मात्र पंद्रह जज हैं। समस्या सिर्फ न्यायाधीशों की कमी से ही पैदा नहीं हुई है। कंप्यूटर और वीडियोग्राफी के इस जमाने में हमारी अदालतों में आज भी न्यायिक कार्यवाही से जुड़े कागज पुराने किस्म के टाइपराइटरों पर तैयार होते हैं।

इन सब सुस्ती का नतीजा यह है कि आतंकवाद जैसे गंभीर मुकदमों में भी फैसला आने में कई दशक लग सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, 1993 में हुए मुंबई बम विस्फोट के मामले में अदालत का फैसला बीस वर्ष बाद 2013 में आया। अदालतों में अगर किसी एक चीज का अभाव नहीं है, तो वह है सरकारी मुकदमों का। सरकारी महकमों की तरफ से इतने मामले दर्ज होते हैं कि कुल मुकदमों में 65 फीसदी से अधिक सरकारी मुकदमे ही होते हैं। ऐसे में न्याय मिलने में देरी भला क्यों न हो?
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