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यह नस्लवादी सोच कहां से आती है

Sun, 10 May 2015 03:36 PM IST
निकोलस क्रिस्टॉफ
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अमेरिका में नस्लवादी विभाजन की जड़ के बारे में समझने के लिए इस पर विचार कीजिए-मानव मस्तिष्क कुछ चीजों के प्रति इस तरह अभ्यस्त हो चुका है कि वह किसी का चेहरा देखने पर एक सेकेंड के पांचवें हिस्से में उसकी नस्ल के बारे में पता कर लेता है। मस्तिष्क का स्कैन बताता है कि जब किसी को सामने वाले का लिंग निर्धारण करने के लिए कहा जाता है, तब भी मस्तिष्क लोगों को उसकी नस्ल के आधार पर ही वर्गीकृत करता है। नस्लवादी पक्षपात की भावना मनुष्य में बहुत पहले विकसित हो जाती है ः यहां तक कि कभी-कभी छोटे बच्चे भी अपनी नस्ल के प्रति ज्यादा दिलचस्पी दिखाते हैं। एक अध्ययन में तीन महीने के श्वेत बच्चों को श्वेत और अश्वेत लोगों की तस्वीरें दिखाई गईं; बच्चों ने श्वेत लोगों की तस्वीरों में ज्यादा दिलचस्पी जाहिर की। जबकि अफ्रीका में इतने ही छोटे बच्चों के सामने जब ये तस्वीरें रखी गईं, तो उन्होंने अश्वेत लोगों की तस्वीरों को वरीयता दी। यह अध्ययन बताता है कि छोटे बच्चे तक नस्लवादी सोच के अभ्यस्त हैं। श्वेत लोगों के देश इस्राइल में अश्वेत बच्चे किसी एक नस्ल के प्रति ज्यादा दिलचस्पी दिखाते नहीं पाए जाते। यह नस्लवादी सोच कहां से आती है?
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विद्वान बताते हैं कि विकासवादी दौर ने हम सबको तत्काल फैसला लेने की क्षमता से लैस कर दिया है कि सामने वाला हमारे समूह का है या नहीं, क्योंकि उसी पर हमारा जीवन निर्भर करता है। जो बच्चा अपने समूह को वरीयता नहीं देता, उसकी जान जाने का खतरा बना रहता है। 'यह विकास का एक आयाम है', मैजेरिन बैनेजी कहते हैं, जो हार्वर्ड में मनोविज्ञान के प्रोफेसर हैं, और जिन्होंने अवचेतन में व्याप्त पक्षपात से संबंधित जांच के विकास में काम किया है। इस जांच के जरिये यह पता लगता है कि नस्लीय और लैंगिक मामलों में मनुष्य भीतरी रूप से पक्षपाती होता है, जिसका बाहरी तौर पर पता नहीं चलता, बल्कि कई बार मनुष्य खुद इसके खिलाफ राय व्यक्त करता है।

‘मैंने अवचेतन में व्याप्त पक्षपात के बारे में पहले लिखा है, और मैं आपको इस बारे में प्रोत्साहित करता हूं कि  इंप्लिसिट.हार्वर्ड.एजु. पर आप अपनी जांच करें। यह जानना बेहद आश्चर्यजनक है कि मेधागत दृष्टि से आप चाहे कुछ भी सोचते हों, आप नस्ल, लिंग, उम्र और अयोग्यता के मुद्दों पर भयंकर रूप से पक्षपाती हैं। जो बात ज्यादा उदास करने वाली है, वह यह कि श्वेतों के अवचेतन में अश्वेतों के प्रति यह पक्षपाती नजरिया छोटे बच्चों में भी उतना ही है, जितना वरिष्ठ नागरिकों में।’
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बैनेजी की शोध परियोजनाएं दिखाती हैं कि बच्चों के अवचेतन में यह नस्लवादी सोच चार वर्ष की उम्र में पैदा हो जाती है, यानी तब, जब वे ठीक-ठीक बोलना सीख जाते हैं। जांच में पाया गया है कि अवचेतन में यह नस्लवादी सोच चार या छह वर्ष के बच्चों में भी उतनी ही होती है, जितनी वरिष्ठ नागरिकों में, जो कभी-कभी नस्लवादी मामले में ज्यादा आक्रामक हो उठते हैं।

एक प्रयोग के तहत, चार वर्ष तक के बच्चों को लोगों की ऐसी अस्पष्ट तस्वीरें थमा दी गईं, जो श्वेत भी हो सकते थे, और अश्वेत भी। कुछ तस्वीरों में लोग हंस रहे थे, जबकि कुछ में लोगों की त्योरियां चढ़ी हुई थीं। अमेरिकी बच्चों ने बताया कि हंसने वाले लोग अमेरिकी हैं, जबकि गुस्सैल लोग एशियाई। जब ताइवान के बच्चों को यही तस्वीर दिखाई गई, तो उन्होंने हंसते लोगों को एशियाई बताया और नाराज लोगों को अमेरिकी।

इस तरह के कई प्रयोग दुनिया भर में हुए हैं, और इसमें हर समूह ने अपने समूह के प्रति पक्षपाती रुख का परिचय दिया है। हालांकि अफ्रीकी-अमेरिकी इसमें अपवाद हैं। अफ्रीकी अमेरिकियों के अवचेतन में अपने समूह के प्रति वैसा पक्षपात नहीं है। चाहे बच्चे हों या बड़े-इनका आचरण निरपेक्ष है, और ये न ही श्वेतों को वरीयता देते हैं, न ही अश्वेतों को।

बैनेजी और दूसरे विद्वानों का कहना है कि ऐसा इसलिए है, क्योंकि अफ्रीकी-अमेरिकी बच्चों ने इस सामाजिक सच को स्वीकार कर लिया है कि गोरी चमड़ी जितनी प्रतिष्ठापूर्ण है, उतनी काली चमड़ी नहीं। एक स्तर पर देखें, तो यह उदास करने वाला तथ्य है, जबकि दूसरे स्तर पर यह अवचेतन में नस्लों के प्रति निरपेक्ष सोच के बारे में बताता है। इसके बावजूद अगर बहुत छोटे उम्र में ही हममें नस्लवादी सोच पनप गई है, तो इसे सिर्फ नियति कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। हम उस परंपरा को खारिज कर सकते हैं, जिसे विकासवाद ने हम पर थोप रखा है।

'अगर हमारे पूर्वजों ने हमारे शरीर में चीनी और वसा संचय करने की क्षमता न पैदा की होती, तो हम अब तक खत्म हो चुके होते, बैनेजी कहते हैं, 'जिस चीज ने उन्हें जिंदा रहने की शक्ति दी, वही चीज आज हमें मार रही है।' इसके बावजूद जिस तरह हम मोटापे से लड़ते और जीतते हैं, उसी तरह हम नस्लवादी सोच से भी लड़ सकते हैं। यह कहानी हमें प्रेरित करती है कि किस तरह एक अश्वेत ने एक श्वेत आक्रमणकारी की जान बचाई। दो नस्लों के बीच गहरी दोस्ती और रोमांटिक संबंध भी नस्लवादी सोच को खत्म करता है। 'अगर दूसरी नस्ल के लोगों से आपकी दोस्ती है, तो आपमें पक्षपात कम होगा', बैनेजी कहते हैं।
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