अब जब यह निराशाजनक साल खत्म होने वाला है, तब यह जानना जरूरी है कि पिछले कुछ महीनों के दौरान सुनी गई मौत, बीमारी, विनाश और नुकसान की कहानियों से हमने क्या सीखा है। कोविड-19 ने महीनों तक हमें अपने घरों में कैद रखा और अब भी व्यापक यात्रा प्रतिबंधित है। लेकिन उसी वजह से मैं दिल्ली को ज्यादा करीब महसूस कर रही हूं। दो करोड़ की आबादी वाले इस महानगर की गलियों से गुजरते हुए अजनबियों से अप्रत्याशित बातचीत का मौका मिला है, जो सदियों से अलग-अलग शहरों से आए लोगों के मिश्रण से बना है। दिल्ली विरोधाभासों से भरी हुई है। करीब 2,800 एकड़ में फैली दिल्ली का नई दिल्ली कही जाने वाली लुटियन दिल्ली ऐसा इलाका है, जहां इस महानगर के ताकतवर और विशेषाधिकार प्राप्त लोग रहते हैं। लेकिन एक और दिल्ली है, जहां सब्जी बेचने वाले राम विलास को उत्तरी दिल्ली में पेड़ पर रहना पड़ता है, क्योंकि वह इतना नहीं कमाता कि झुग्गी में एक छोटा-सा कमरा भी किराये पर ले सके।
चार साल पहले फुटपाथ पर बनी उसकी झोपड़ी ध्वस्त कर दी गई। फिर उस पर नोटबंदी की मार पड़ी और इस साल महामारी फैल गई। उसने प्लाइवुड, प्लास्टिक शीट और टहनियों से पेड़ पर एक घर बना रखा है। अपना काम खत्म करने के बाद वह किसी की छोड़ी गई पुरानी रजाई के साथ पेड़ पर चढ़कर सो जाता है। वह मुश्किल से ही बचा हुआ है, लेकिन वह कहता है कि चीजें इससे भी बुरी हो सकती हैं। यह जो 'दूसरी' दिल्ली है, वह समय-समय पर खबरों के जरिये अपनी मौजूदगी दर्शाती रहती है, जैसे कि दिसंबर, 2020 में दिल्ली में एक जन सुनवाई हुई थी, जिसे दिल्ली रोजी रोटी अधिकार अभियान ने आयोजित किया था। यह लोगों और समूहों का नेटवर्क है, जो दिल्ली में भोजन के अधिकार के लिए काम करता है। इस सुनवाई ने देश की राजधानी दिल्ली में कोविड-19 महामारी के मद्देनजर कामकाजी गरीब और हाशिये के समुदायों के बीच भारी भूख की समस्या को उजागर करने की कोशिश की।
दिल्ली के गरीबों की कहानी, एक स्तर पर इस देश के विशाल असंगठित क्षेत्र की कहानी है, जो औपचारिक अर्थव्यवस्था को बनाए रखती है। भारत में 80 फीसदी से अधिक श्रमिक अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में काम करते हैं, जो रोजगार सुरक्षा के बगैर दैनिक मजदूरी पर पलते हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाली देश की शहरी आबादी 6.5 करोड़ है, जो कुल शहरी आबादी का 17 फीसदी है। ताजा आधिकारिक आंकड़े के मुताबिक, सिर्फ दिल्ली में 17 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं अथवा प्रति महीने 1,134 रुपये से कम पर गुजारा करते हैं। दिसंबर में भूख पर हुई सुनवाई में झुग्गी में रहने वाले, दिहाड़ी मजदूर, निर्माण उद्योग के श्रमिक, बेघर एवं दिव्यांगों ने अपनी समस्याएं बताईं। प्रभावित लोगो ने आभासी तरीके से कोई सामाजिक संरक्षण नहीं मिलने और अपने अधिकारों के हनन की त्रासद कहानियां सुनाईं।
विकासशील दुनिया और विश्व के कई शहरों की तरह दिल्ली में शहरी गरीब और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा होने का मतलब केवल कम आय ही नहीं है, बल्कि स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता, आवास और स्वास्थ्य सेवा तक अपर्याप्त पहुंच भी है। यह अनौपचारिक अर्थव्यवस्था ही है, जो भारत में लोगों को रोजगार मुहैया करा रही है। चूंकि संगठित क्षेत्र में रोजगार सिकुड़ता जा रहा है और ग्रामीण इलाकों से बेरोजगारों की बाढ़ आ रही है, ऐसे में यह अनौपचारिक अर्थव्यवस्था ही बढ़ते शहरी गरीबों के लिए एकमात्र आशा और आजीविका का स्रोत बनी हुई है। महामारी से असंगठित अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। हाल के महीनों में मैं कई ऐसे पुरुष व महिलाओं से मिली, जो काम पर लौट आए हैं, लेकिन उनकी आय पहले के मुकाबले काफी कम हो गई है और वे भारी कर्ज में हैं। कर्ज 2021 में असंगठित क्षेत्र के लाखों श्रमिकों का पीछा करती रहेगी। वैक्सीन लगाने के बावजूद उनकी जीवन में बढ़ती अनिश्चितता एक बड़ा मुद्दा रहेगी। पर हमारे पास अब भी इस क्षेत्र की उत्पादक क्षमता के बेहतर दोहन के लिए कोई सुसंगत नीति नहीं है। इसे बदलने की जरूरत है।