अफगानिस्तान के हिंदूकुश क्षेत्र में आया 7.7 तीव्रता का भूकंप हमारे लिए पुनः ढेरों सवाल लेकर आया है। हिंदूकुश हिमालय का हिस्सा है। यह हिमालय उसी सीमा का अंग है, जिसमें भारतीय प्लेट 30-40 मिलीमीटर प्रति साल की रफ्तार से यूरेशियाई प्लेट से टकरा रही हैं, और जिससे हिमालय पर्वत बन रहा है, और भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील है। हिमालय का बहुत बड़ा भाग, जो हमारे भूभाग से लगा है, हमारे लिए काफी संवेदनशील है। हालिया भूकंप का केंद्र हिंदूकुश पहाड़ी क्षेत्र में जमीन से करीब 200 किलोमीटर नीचे था, इसलिए अपेक्षाकृत कम ऊर्जा महसूस की गई। साथ ही, पहाड़ी क्षेत्र होने और घनी आबादी न होने के कारण अपेक्षाकृत कम नुकसान हुआ है। मगर कल्पना कीजिए कि अगर इस भूकंप का केंद्र किसी घनी आबादी वाला हिस्सा होता और गहराई कम होती, तो नुकसान कितना व्यापक होता। हमारी चिंता की वजह यही होनी चाहिए।
इस भूकंप को भारत के संदर्भ में देखने की जरूरत है। हमारे भूभाग से लगे हिमालय के इलाकों में इतना और इससे बड़े भूकंप की आशंका बनी हुई है। ऐसे शोध हैं, जो बता रहे हैं कि जोनिंग इलाकों में आठ या इससे ऊपर की तीव्रता वाले भूकंप आ सकते हैं। उल्लेखनीय है कि ये इलाके दिल्ली से महज 250-300 किलोमीटर ही दूर हैं। इतना ही नहीं, इस भूकंप से जितनी ऊर्जा निकलेगी, वह अफगानिस्तान में आए भूकंप से 15 या 30 गुना ज्यादा तीव्रता की होगी। यानी हिरोशिमा में गिराए गए बम के हजारों गुना ऊर्जा के बराबर।
उल्लेखनीय है कि हमारे देश को चार जोन में बांटा गया है। जोन पांच सबसे खतरनाक जोन है, जहां तेज भूकंप की आशंका है। जोन पांच में कश्मीर, पश्चिम और मध्य हिमालय, उत्तर बिहार, पूर्वोत्तर राज्य और कच्छ आता है। हालांकि एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, जिसमें राजधानी दिल्ली के आसपास के तमाम क्षेत्र शामिल हैं) जोन चार का क्षेत्र है, मगर यहां भी दो तरह के खतरे हैं। अगर हिमालय में आठ के आसपास का भूकंप आया, तो भी उसके तेज झटके यहां महसूस होंगे। और अगर इसका केंद्र दिल्ली रहा, जहां छह और 6.5 के आसपास के भूकंप आने की आशंका है, तो भी इससे पूरा एनसीआर प्रभावित होगा।
वैसे भी दिल्ली का इतिहास है कि यहां पहले भी भूकंप आए हैं। घनी आबादी नहीं होने के कारण तब दिल्ली, फरीदाबाद, मथुरा में आए भूकंप से ज्यादा नुकसान नहीं हुए थे। मगर आज तस्वीर पूरी तरह बदली हुई है। दिल्ली का जनसंख्या घनत्व काफी बढ़ गया है। यहां शहरी हिस्से का फैलाव हो रहा है। झुग्गी-झोपड़ियां और अनाधिकृत कॉलोनियों का निर्माण हुआ है। लिहाजा यह सोचना जरूरी है कि इस परिदृश्य में आखिर हम करें क्या? ऐसा नहीं है कि हमारे पास तकनीक नहीं है। हम जानते हैं कि भूकंपरोधी घर कैसे बनाए जाएंगे। मगर हम इस दिशा में उदासीन हैं। इतना ही नहीं, सरकार की तरफ से बेहतर निरीक्षण तंत्र न होने के कारण भी शहर का बेतरतीब विकास हो रहा है। ऐसे में अगर हिमालय के आसपास अथवा दिल्ली में ही, भूकंप आता है, तो काफी तबाही हो सकती है।
अब जबकि छह महीने के अंदर ही हमने दो भूकंप (पहला नेपाल और अब अफगानिस्तान-पाकिस्तान) देखा है, तो यह उचित वक्त है कि हम अपनी तैयारी की समीक्षा करें। असल में, हमारे यहां जब कोई बड़ी घटना होती है, तो खूब हायतौबा मचता है। पर समय बीतने के साथ ही हम उसे भूल जाते हैं। छह महीने पहले ही नेपाल में आए विध्वंसकारी भूकंप के बाद कई दिनों तक काफी जोर-शोर से चर्चा हुई थी, मगर वे दावे आज भी किए जा रहे हैं। यानी छह महीने में कुछ भी बदला प्रतीत नहीं हो रहा है। जबकि दिल्ली में कुछ दिनों पहले आए 3.5 तीव्रता का भूकंप यहां फॉल्ट सिस्टम की उपस्थिति दर्शा चुका है।
दरअसल हमारी तैयारी दो स्तरों की होनी चाहिए- पहला, भूकंप के आने के बाद यानी राहत बचाव कार्य को लेकर, और दूसरा भूकंप आने से पहले। भूकंप को आने से नहीं रोका जा सकता, क्योंकि हमारी पृथ्वी की बनावट ही ऐसी है। मगर कुछ तैयारी अगर हम समय रहते कर लें, तो भूकंप के नुकसान से बचा जा सकता है। मसलन, बिल्डिंग कोड को ही लें। इस हर जोन और भूकंप की तीव्रता के अनुसार बनाया गया है। मगर इस कोड के हिसाब से निर्माण कार्य सुनिश्चित करने को लेकर अब तक कोई ठोस तंत्र नहीं बन सका है। इतना ही नहीं, जोनिंग मेप (जोन में बंटवारा) और बिल्डिंग कोड को भी अब आगे बढ़ाकर शहरी क्षेत्रों का माइक्रोजोनिंग (जमीन खासकर मिट्टी की संरचना के आधार पर जोन के अंदर भी जोन तय करना) का कार्य भी युद्धस्तर पर किए जाने की जरूरत है। हालांकि दिल्ली में इस दिशा में बहुत बड़ा काम काफी समय पूर्व हुआ है, आवश्यकता तो इसे तुरंत लागू करने की। जोनिंग का यह कार्य पूरे देश में जल्दी से जल्दी पूरा होना चाहिए।
फिलहाल इमारत की सुरक्षा को लेकर भी सर्वे की जरूरत है, जिससे भवनों की स्थिति के बारे में पता लग सकेगा। यह सर्वे वर्तमान में उपलब्ध जोनिंग मैप के अनुसार किया जा सकता है। परंतु दिल्ली का सर्वे माइक्रोजोनिंग मैप के आधार पर किया जाना चाहिए। जो इमारत मानक पूरा न करे, उसका मानक के अनुसार मरम्मत या पुनर्निर्माण होना चाहिए। खासकर अस्पताल, स्कूल जैसे सार्वजनिक भवनों पर विशेष ध्यान देना होगा। हम आज स्मार्ट सिटी की बात कर रहे हैं, मगर उसमें भी इस दिशा में पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए। जरूरत लोगों में जागरूकता फैलाने को लेकर भी होनी चाहिए। रेट्रोफिटिंग (ऐसे अवयव को फिर से डालना, जो निर्माण कार्य में नहीं डाला जा सका) के लिए इंजीनियरों के प्रशिक्षण का कार्य युद्धस्तर पर तो किया ही जाना चाहिए, ग्रामीण इलाकों के मिस्त्री को भूकंपरोधी मकान के निर्माण को लेकर भी ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। इसकी कछुआ गति जब तक तेज नहीं की जाएगी, खतरा बना रहेगा।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग में भूकंप विज्ञान विभाग के पूर्व प्रमुख