वैसे तो जेल में जश्न मनाना कोई नई बात नहीं। होली-दिवाली छोड़िए, रेव पार्टियां भी वहां हो सकती हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह तिहाड़ जैसी वीआईपी जेल है या दूर-दराज की साधारण-सी जेल। जब जेलों से रंगदारी चल सकती है, तो वहां पार्टियां भी चल ही सकती हैं। यह इस पर निर्भर करता है कि कैदी कौन है और जेलर कौन। कैदी अगर दबंग हो, तो जेल के अफसर भी उत्सवधर्मी हो जाते हैं। फिल्मों में जो दिखाया जाता है, आप उस पर मत जाइए कि सारे पुलिस अफसर चुलबुल पांडे टाइप दबंग ही होते हैं। बल्कि बात अगर उल्टी हो, तो आश्चर्य नहीं। इसलिए जेलों में जश्न मनाना नई बात नहीं। नई बात वह तब होती, जब तिहाड़ में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली जाती। यही होते-होते रह गया। जेल जश्न से वंचित हो गया।
ओमप्रकाश चौटाला जी और उनके समर्थक छाती ठोककर कह रहे थे कि उनका शपथ ग्रहण समारोह तिहाड़ में होगा। मुख्यमंत्रियों के शपथ ग्रहण समारोह हमेशा तय स्थानों पर नहीं होते। केजरीवाल जी ने रामलीला मैदान में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। हरियाणा के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री पहले कहीं और शपथ लेनेवाले थे, फिर जगह बदली गई। मगर यदि हरियाणा के मतदाता चाहते, तो शपथ ग्रहण तिहाड़ में भी हो सकता था।
चौटाला जी ने यह कहा ही था कि वह जेल से नहीं डरते। चुनाव के समय उन्होंने कहा था कि जब तीन हजार लोगों को नौकरियां देने के लिए उन्हें दस साल जेल की सजा सुनाई गई, तो मुख्यमंत्री बनने के बाद वह तीन लाख लोगों को नौकरियां देंगे। इसलिए उन्हें तो जेल में ही रहना था। अच्छी बात यह है कि हमारे नेता अब भी जेल जाना गर्व की बात मानते हैं। आजादी की लड़ाई के दौरान भी यह गर्व की बात होती थी। यह बेकार का भ्रम था कि अब जेल जाना शर्म की बात है। जेल में रहना गर्व की बात है और वहां से मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना, तो और भी गर्व की बात! पर जेल इस जश्न से वंचित रहा। वैसे अगर इतना ही गर्व है, तो जेल में रहते हुए नेता बीमार क्यों पड़ जाते हैं?