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अस्थिरता के नए दौर में काबुल

Mon, 22 Jun 2015 08:58 PM IST
विशाल चंद्रा
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जब तालिबान हमलावरों ने अफगानिस्तान की संसद पर हमला किया, तब सदन का सत्र चल रहा था। सांसद राष्ट्रपति अशरफ गनी द्वारा रक्षा मंत्री के महत्वपूर्ण पद के लिए मनोनीत मासूम स्तेनकजई की उम्मीदवारी पर विचार-विमर्श कर रहे थे। स्तेनकजई वर्ष 2010 में पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई द्वारा अफगान तालिबान नेतृत्व के साथ सीधी बातचीत के लिए नियुक्त हाई पीस काउंसिल से जुड़े रहे हैं। खबर है कि हाल ही में वह चीन में तीन सदस्यीय तालिबान प्रतिनिधिमंडल से पाक खुफिया विभाग के प्रतिनिधि की मौजूदगी में मिले थे। अफगान संसद पर हमला तालिबान की तरफ से एक दूसरा सख्त संदेश है, जो लंबे समय से मुल्क में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का विरोध कर रहे हैं।
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तालिबान सरकार के साथ औपचारिक शांति समझौतों के लिए बातचीत का विरोध भी करते रहे हैं। उन्होंने काबुल और विभिन्न विदेशी संगठनों की ओर से किए गए, जिनमें दुबई और ओस्लो में हुई ताजा पहल भी शामिल है, राजनीतिक प्रयासों की निंदा की है।

विगत अप्रैल में तालिबान ने अफगान सरकार को अपदस्थ करने के लिए अपना सालाना अभियान अज्म (दृढ़ संकल्प) की शुरुआत की। उन्होंने एक दर्जन से अधिक प्रांतों में अस्थिरता फैलाई है। तालिबान का आक्रामक रवैया पाक सीमा से लगे दक्षिण और पूर्व में पश्तून प्रांत तक सीमित नहीं रहा है। इस साल वे चीन और मध्य एशिया गणराज्य से सटे अपेक्षाकृत शांत उत्तरी प्रांत में हिंसक और सक्रिय रहे हैं। पहले ही इस तरह की खबरें आ रही थीं कि तालिबानी लड़ाकों ने बदख्शान प्रांत में यमगान और हाल ही में कुंदुज प्रांत में चारदारा जिले पर कब्जा कर लिया है।
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तालिबान इस वर्ष संघर्ष क्षेत्र का विस्तार करना चाहता है, क्योंकि अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट के बढ़ते प्रभाव को रोकना उसकी तत्कालिक जरूरत है। इस्लामिक स्टेट न केवल मुल्ला उमर (जो वर्षों से नहीं दिखा है) के नेतृत्व पर सवाल उठाता है, बल्कि वह इस क्षेत्र में तालिबान और अल कायदा की जगह लेना चाहता है। अफगान तालिबान के कुछ सदस्य और इस क्षेत्र में सक्रिय विभिन्न विदेशी समूह, जिनमें तहरीक-ए तालिबान पाकिस्तान का गुट भी शामिल है, इस्लामिक स्टेट के प्रति अपनी निष्ठा बढ़ाने के लिए जाने जाते हैं। पाकिस्तान के कबीलाई इलाकों से सटे पूर्वी अफगानिस्तान, खासकर नंगरहार प्रांत में इस्लामिक स्टेट और तालिबान के बीच सीधी मुठभेड़ की कई रिपोर्टें आई हैं। बताया तो यह भी जाता है कि तालिबान और इस्लामिक स्टेट ने एक-दूसरे के खिलाफ जेहाद का ऐलान कर दिया है। इस्लामिक स्टेट के एक गंभीर वैचारिक खतरे के रूप में उभरने के साथ तालिबान कमांडर संभवतः इस्लामी ताकत के रूप में अपनी प्रासंगिकता बनाने रखने के लिए अफगान संसद पर हमले की तरह और भी बड़े हमले कर सकते हैं।

वहां हजारों ऐसे विदेशी लड़ाकों (जिनमें से कुछ इस्लामिक स्टेट के समर्थक हैं) के होने की भी खबर है, जो पाकिस्तान के उत्तरी वजीरिस्तान से आए हैं। करीब एक साल पहले पाक सेना द्वारा शुरू किए गए सैन्य ऑपरेशन जर्ब-ए-अज्ब की वजह से ये विदेशी लड़ाके कबाइली इलाकों से भागकर अफगानिस्तान के पूर्वी और उत्तरी प्रांत से सटे इलाकों में आए। अफगान सेना और पुलिस पर पहले से ही दबाव रहा है, लिहाजा वह खुद को सुदूर इलाकों, खासकर पाकिस्तान की सीमा से सटे प्रांतों में तालिबान का सामना करने में सक्षम नहीं मान रही होगी। हालांकि पूर्व के मिलिशिया कमांडर (गैर-पेशेवर सैनिक) पहले से ही देश के कई हिस्सों में तालिबान के खिलाफ माहौल बनाने और स्थानीय प्रतिरोध पैदा करने में मदद कर रहे हैं।

राष्ट्रपति अशरफ गनी के साथ दोतरफा मुश्किलें हैं। अव्वल तो देश की सुरक्षा स्थिति लगातार खराब हो रही है, जबकि उन्हें पश्चिम से सैन्य समर्थन का आश्वासन भी नहीं मिला है। लिहाजा बीजिंग की मदद से रावलपिंडी के साथ मैत्री की अपनी योजना पर आगे बढ़ने में वह खुद को सक्षम नहीं मान रहे होंगे। यही वजह है कि पाक सैन्य प्रतिष्ठान की तरफ से काबुल की विश्वास बढ़ाने वाली पहल पर ठोस जवाब नहीं दिया जा रहा। कबाइली क्षेत्रों में पाकिस्तान का सैन्य अभियान कुछ चुनींदा संगठनों तक सीमित रहा और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान जैसे गुटों को ही उसने निशाना बनाया।

बताते हैं कि अशरफ गनी ने हाल ही में पाक सेना और सरकार को अनुरोध किया कि वह अपने देश से संचालित अफगान तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे। लिहाजा यह देखना बाकी है कि पाकिस्तान अफगान संसद पर हुए हमले की महज निंदा ही करता है या उससे आगे बढ़कर कुछ ऐसे कारगर कदम भी उठाता है, जिससे काबुल का भरोसा बढ़े। इसकी संभावना कम है, क्योंकि एक स्थिर और मजबूत अफगानिस्तान अब भी रावलपिंडी के लिए अभिशाप की तरह है। अफगानिस्तान की विदेश नीति को लंबे समय तक नियंत्रित करने की इच्छा के कारण कमजोर और अस्थिर काबुल ही पाकिस्तान को जंचेगा।

विगत मई में नई दिल्ली की यात्रा पर आने से पहले अशरफ गनी ने कहा था कि अफगानिस्तान ऐसी सक्रिय कूटनीति में विश्वास रखता है, जो मजबूत द्विपक्षीय रिश्ते पर आधारित हो। अब जब अफगानिस्तान, अफगान जनता और खुद सरकार के अस्तित्व पर खतरा बढ़ा है, तब यह देखने वाली बात होगी कि चीन और पाकिस्तान के साथ वह किस तरह का रिश्ता रखते हैं। अफगानिस्तान में लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। बल्कि यह मुल्क अब अनिश्चय और अराजकता के नए दौर में प्रवेश कर रहा है।
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आईडीएसए में अफगान मामलों के विशेषज्ञ, और द अनफिनिश्ड वार इन अफगानिस्तान के लेखक
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