राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की फलस्तीन और इस्राइल, दोनों देशों की यात्रा दरअसल भारत की नीतिगत घोषणा है कि वह दोनों के साथ अपने संबंध रखना चाहता है। एक तरह से यह सार्वजनिक घोषणा भी है कि फलस्तीन के साथ प्रगाढ़ संबंध पुरानी बात है और भारत इस्राइल के साथ रिश्तों का एक नया अध्याय शुरू करने जा रहा है।
दरअसल भारत अब तक इस्राइल के साथ अपने रिश्तों को दबा-छिपा कर रखता आया है। भारत फलस्तीनियों का बहुत करीबी दोस्त रहा है और फलस्तीनी राष्ट्र निर्माण के संघर्ष में उसने साथ दिया है। लेकिन अब भारत में फलस्तीनियों के लिए यह समर्थन लगातार कम होता जा रहा है। जबकि फलस्तीनी नेतृत्व चाहता है कि मानवीय आधार पर भारत फलस्तीन का समर्थन जारी रखे।
पिछले दौर के संबंधों पर निगाह डालें, तो भारत ने 15 सितंबर, 1950 को इस्राइल को मान्यता दी थी। इसके अगले साल मुंबई में इस्राइल ने अपना वाणिज्य दूतावास खोल दिया, पर राजनीतिक कारणों से भारत इस्राइल में अपना वाणिज्य दूतावास नहीं खोल पाया। दोनों देशों को एक दूसरे के यहां आधिकारिक तौर पर दूतावास खोलने में करीब 42 साल लगे थे।
मौजूदा सच्चाई यह है कि भारत अब इस्राइल का भरोसेमंद सहयोगी है। वह इस्राइल से सैन्य साज-सामग्री खरीदने वाला सबसे बड़ा देश है। रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में ही नहीं डेयरी, सिंचाई, ऊर्जा और बहुत से तकनीकी क्षेत्रों में इस्राइल भारत के साथ साझेदारी कर रहा है। कुछ समय पहले जब इस्राइली बमबारी में बड़ी संख्या में फलस्तीनी मारे गए थे, तो संसद में विपक्षी दलों ने गाजा पर एक प्रस्ताव पारित करने की मांग की थी। तब मोदी सरकार ने यह कहते हुए इससे इन्कार कर दिया था कि यह देश के हित में नहीं है, क्योंकि वहां के दोनों ही पक्षों से भारत के दोस्ताना रिश्ते हैं। यह पहला मौका था, जब मोदी सरकार ने फलस्तीन और इस्राइल के साथ रिश्तों को लेकर स्पष्ट संकेत दे दिए थे।
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की यात्रा से फलस्तीनी तो खासे उत्साहित हैं, मगर इस्राइली उतने उत्साहित नहीं हैं। वे उम्मीद कर रहे थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यात्रा पर आएंगे। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी इस्राइल के साथ गहरे रिश्तों के हिमायती हैं, जबकि विदेश मंत्रालय के नीति निर्माताओं में यह द्वंद्व रहा है कि इस्राइल का कितना साथ दिया जाए। विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना था कि एक देश के साथ गहरे रिश्तों की कीमत 50 मुल्कों की नाराजगी लेकर चुकाना बहुत महंगा सौदा है।
सामान्य मामलों में स्थिति यह है कि यदि आपके पासपोर्ट पर इस्राइल का वीजा लग जाए, तो अरब देशों से वीजा के दरवाजे आपके लिए हमेशा के लिए बंद हो जाते हैं। यही वजह है कि इस्राइल अपने शुभचिंतकों के पासपोर्ट पर आने और जाने की मुहर नहीं लगाता। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी के बजाय राष्ट्रपति को इस्राइल भेजने के फैसले के पीछे विदेश मंत्रालय है। उनकी इस यात्रा में अरब देश जॉर्डन और फलस्तीन को जुड़वाने में भी उसकी भूमिका है। इस्राइली दबी जुबान में शिकायत करते हैं कि मोदी तो रिश्तें मधुर बनाना चाहते हैं, पर विदेश मंत्रालय के अधिकारी इसमें बाधा बने हुए हैं।
अब तक भारत इस्राइल के साथ अपने रिश्ते को खास तवज्जो नहीं देता था, ताकि अरब देशों से उसके संबंधों पर असर न पड़े। दरअसल पश्चिम एशिया में लाखों भारतीय काम करते हैं और भारत तेल आयात के लिए भी इस पर निर्भर है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी बयान देती रही हैं कि फलस्तीन के संबंध में भारत की विदेश नीति नहीं बदली है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की यात्रा भारत-इस्राइल रिश्तों को सार्वजनिक करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा सकता है।