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संतराम बी.ए. को याद करने का अर्थ : जब एक दलित स्त्री धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बनी

श्यौराज सिंह बेचैन Published by: Avdhesh Kumar Updated Sun, 07 Jul 2019 02:41 AM IST
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संतराम बी ए - फोटो : सोशल मीडिया
पिछले दिनों दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में संतराम बी.ए. की 32वीं पुण्यतिथि पर उनके साहित्य और चिंतन पर चर्चा की गई। उनके बारे में लोगों की जानकारी सीमित है। 14 फरवरी, 1887 को पैदा हुए संतराम बी.ए. की मृत्यु 31 मई, 1988 को दिल्ली में पुत्री गार्गी चड्डा के घर पर हुई। वह अपने समय के बड़े पत्रकार और संपादक थे। इन्होंने युगान्तर, उषा, आर्य मुसाफिर, भारती आदि पत्रिकाओं का संपादन कर उस दौर में समाज सरोकार की पत्रकारिता को धार देकर वर्णवादियों से लोहा लिया था। उन्होंने ‘जात-पाति तोड़क‘ अंक निकाला, जो उस समय बड़े साहस का काम था। 

जात-पाति तोड़क र्शीषक से उन्होंने हिंदी मासिक भी निकाला। 1928 में इसी पत्रिका का नाम बदल कर उन्होंने क्रांति कर दिया था। संतराम उर्दू, फारसी और पंजाबी भाषाओं के ज्ञाता थे। हिंदी में उन्होंने विलंब से प्रवेश किया, पर वर्षों के अभ्यास से भाषा पर असाधारण अधिकार भी हासिल किया। उनकी युगान्तर पत्रिका में हिंदी के वे सभी लेखक शामिल थे, जो सरस्वती पत्रिका में छपा करते थे। उन्होंने अलबेरूनी का भारत चार खंडों में हिंदी में अनुवाद किया था, जो इंडियन प्रेस से प्रकाशित हुआ था।


हिंदू समाज को संगठित बनाने के लिए वह जातिभेद समाप्त करना चाहते थे। लाहौर में उन्होंने ‘जात-पात तोड़क मंडल‘ की स्थापना की थी। उन्होंने न केवल अपनी पत्रिका में संपादकीय अग्रलेख लिखे, बल्कि तत्कालीन हिंदी, पंजाबी पत्र-पत्रिकाओं में भी लिखा। उस दौर में नवजागरण कालीन ऐसी कोई पत्रिका नहीं थी, जिसमें उनके लेख न छपे हों। 
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संतराम बी ए - फोटो : सोशल मीडिया
पिछले दिनों दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में संतराम बी.ए. की 32वीं पुण्यतिथि पर उनके साहित्य और चिंतन पर चर्चा की गई। उनके बारे में लोगों की जानकारी सीमित है। 14 फरवरी, 1887 को पैदा हुए संतराम बी.ए. की मृत्यु 31 मई, 1988 को दिल्ली में पुत्री गार्गी चड्डा के घर पर हुई। वह अपने समय के बड़े पत्रकार और संपादक थे। इन्होंने युगान्तर, उषा, आर्य मुसाफिर, भारती आदि पत्रिकाओं का संपादन कर उस दौर में समाज सरोकार की पत्रकारिता को धार देकर वर्णवादियों से लोहा लिया था। उन्होंने ‘जात-पाति तोड़क‘ अंक निकाला, जो उस समय बड़े साहस का काम था। 

जात-पाति तोड़क र्शीषक से उन्होंने हिंदी मासिक भी निकाला। 1928 में इसी पत्रिका का नाम बदल कर उन्होंने क्रांति कर दिया था। संतराम उर्दू, फारसी और पंजाबी भाषाओं के ज्ञाता थे। हिंदी में उन्होंने विलंब से प्रवेश किया, पर वर्षों के अभ्यास से भाषा पर असाधारण अधिकार भी हासिल किया। उनकी युगान्तर पत्रिका में हिंदी के वे सभी लेखक शामिल थे, जो सरस्वती पत्रिका में छपा करते थे। उन्होंने अलबेरूनी का भारत चार खंडों में हिंदी में अनुवाद किया था, जो इंडियन प्रेस से प्रकाशित हुआ था।

हिंदू समाज को संगठित बनाने के लिए वह जातिभेद समाप्त करना चाहते थे। लाहौर में उन्होंने ‘जात-पात तोड़क मंडल‘ की स्थापना की थी। उन्होंने न केवल अपनी पत्रिका में संपादकीय अग्रलेख लिखे, बल्कि तत्कालीन हिंदी, पंजाबी पत्र-पत्रिकाओं में भी लिखा। उस दौर में नवजागरण कालीन ऐसी कोई पत्रिका नहीं थी, जिसमें उनके लेख न छपे हों। 

प्रेमचंद के संपादन में भी संतराम के लेख छपे। नवजागरण काल के संपादकों के अपने सामाजिक सरोकार थे। वे निचली जातियों के धर्म परिवर्तन से काफी चिंतित थे। संतराम बी.ए. जाति और वर्ण के घोर विरोधी थे और हिंदू धर्म की संकीर्णताओं पर प्रहार कर रहे थे, लेकिन वह निचली जातियों के धर्म परिवर्तन के खिलाफ थे।

एक दलित स्त्री धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बनी, तो संतराम ने युगान्तर पत्रिका में संपादकीय लिखा, जिसका सार यह था कि यदि हिंदू नहीं चेतेंगे, तो निचली जातियां और स्त्रियां इसी तरह मुसलमान बनती रहेंगी। सनातनी हिंदुओं से संतराम की असहमतियां थीं। वह कहते थे संपादकों को सुधारक भी होना चाहिए। 

‘जात-पात तोड़क मंडल‘ की भूमिका को लेकर माधुरी पत्रिका में बहस चली। सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने लिखा कि जात-पांत तो समाप्त होनी चाहिए, पर रोटी, बेटी का संबंध तो व्यक्तिगत है। निराला रोटी भेद के भी विरोध में थे। ‘निराला‘ कहते थे कि यह संस्था ‘जात-पात तोड़क’ नहीं ‘जात-पात योजक‘ होनी चाहिए।

वर्ष 1936 में संतराम ने ‘जात-पात तोड़क मंडल‘ की सभा की अध्यक्षता के लिए डॉ. आंबेडकर को आमंत्रित किया था और आंबेडकर ने जाति विषयक शोधपूर्ण निबंध लिखकर मंडल के सदस्यों को भेजा था। जब उनका वह निबंध पढ़ा गया, तो मंडल के कुछ सदस्यों ने उसका विरोध किया। वे चाहते थे कि आंबेडकर हिंदू ग्रंथों को नकारने की अपनी राय वापस ले लें। पर आंबेडकर ने अपने लेख में संशोधन करने से मना कर दिया। 

संतराम ने यह कहते हुए सम्मेलन ही स्थगित कर दिया कि आंबेडकर का कोई विकल्प नहीं है। लेकिन उस निबंध को प्रकाशित कर उसे वितरित किया गया। वही निबंध एनिहिलेशन ऑफ कास्ट नामक किताब के रूप में प्रकाशित हुआ। अतः आंबेडकर से ‘जाति का विनाश’ किताब लिखवाने का श्रेय संतराम को ही जाता है।

अपने समय में संतराम जिन सवालों से रूबरू हुए, वे प्रश्न आज भी मुंह बाये खड़े हैं। आज भी आदिवासी डॉक्टर पायल तड़वी जातिसूचक टिप्पणियों से तंग आकर आत्महत्या कर रही है। महिला डॉक्टरों की भाषा उसे मृत्यु का चुनाव करने के लिए मजबूर कर रही है। उन डॉक्टरों ने पायल तड़वी को कहा था कि यदि बर्दाश्त नहीं था तो मरी क्यों, संस्था छोड़कर क्यों नहीं गई? समाज का यह रवैया बदलना चाहिए। 

द्वेष, घृणा, अपमान का बाजार बंद होना चाहिए। ‘जाति-पात तोड़क मंडल‘ अंतर्जातीय विवाह को बढ़ावा देकर जातिविहीन समाज का निर्माण कर रहा था। परंतु कालांतर में जातियां तोड़ने के बजाय जोड़ने की राजनीति प्रभाव में आई। 'निराला' जिस ‘जाति योजक‘ संस्था की बात कर रहे थे, उस पर इधर के दशकों में अमल हुआ। मंडल की पृष्ठभूमि में जातिवार जनगणना की मांग उठी। संतराम बी.ए. जिस पंजाब से थे, उसी पंजाब से काशीराम ने दलित-पिछड़ी जातियों को संगठित करने की मुहिम चलाई।

याद रखना चाहिए कि संतराम बी.ए. के मंडल ने 1931 की जनगणना में लोगों की जाति लिखे जाने का घोर विरोध किया था और कॉलेज, यूनिवर्सिटी के आवेदनों में जातिसूचक सरनेम हटाने के लिए आंदोलन किया था। इसके लिए मंडल का प्रतिनिधिमंडल भारत सरकार के तत्कालीन होम मेंबर से भी मिला था। जातिसूचक सरनेम हटाने का कानून तो नहीं बना, परंतु मंडल के आह्वान पर एक हजार स्त्री-पुरूषों ने जनगणना में अपनी जाति लिखने से इनकार किया था। 

फिर भी 1931 की गणना में न केवल जाति शामिल हुई, बल्कि धर्म की भी गणना सामने आई। संतराम बी.ए. अपने समय की समस्याओं को अपने लेखन में उठा रहे थे। उनके चिंतन और साहित्य को खोजकर सामने लाने की जरूरत है। इसी में उनकी स्मृति की सार्थकता है।
 
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