पिछले दिनों दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में संतराम बी.ए. की 32वीं पुण्यतिथि पर उनके साहित्य और चिंतन पर चर्चा की गई। उनके बारे में लोगों की जानकारी सीमित है। 14 फरवरी, 1887 को पैदा हुए संतराम बी.ए. की मृत्यु 31 मई, 1988 को दिल्ली में पुत्री गार्गी चड्डा के घर पर हुई। वह अपने समय के बड़े पत्रकार और संपादक थे। इन्होंने युगान्तर, उषा, आर्य मुसाफिर, भारती आदि पत्रिकाओं का संपादन कर उस दौर में समाज सरोकार की पत्रकारिता को धार देकर वर्णवादियों से लोहा लिया था। उन्होंने ‘जात-पाति तोड़क‘ अंक निकाला, जो उस समय बड़े साहस का काम था।
जात-पाति तोड़क र्शीषक से उन्होंने हिंदी मासिक भी निकाला। 1928 में इसी पत्रिका का नाम बदल कर उन्होंने क्रांति कर दिया था। संतराम उर्दू, फारसी और पंजाबी भाषाओं के ज्ञाता थे। हिंदी में उन्होंने विलंब से प्रवेश किया, पर वर्षों के अभ्यास से भाषा पर असाधारण अधिकार भी हासिल किया। उनकी युगान्तर पत्रिका में हिंदी के वे सभी लेखक शामिल थे, जो सरस्वती पत्रिका में छपा करते थे। उन्होंने अलबेरूनी का भारत चार खंडों में हिंदी में अनुवाद किया था, जो इंडियन प्रेस से प्रकाशित हुआ था।
हिंदू समाज को संगठित बनाने के लिए वह जातिभेद समाप्त करना चाहते थे। लाहौर में उन्होंने ‘जात-पात तोड़क मंडल‘ की स्थापना की थी। उन्होंने न केवल अपनी पत्रिका में संपादकीय अग्रलेख लिखे, बल्कि तत्कालीन हिंदी, पंजाबी पत्र-पत्रिकाओं में भी लिखा। उस दौर में नवजागरण कालीन ऐसी कोई पत्रिका नहीं थी, जिसमें उनके लेख न छपे हों।