न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर सर्वोच्च न्यायालय तथा केंद्र सरकार के बीच टकराव की स्थिति बनती नजर आ रही है। सरकार ने पूरी सूची अदालत में पेश की है कि कॉलेजियम व्यवस्था के अंतर्गत कितने अयोग्य न्यायाधीशों की नियुक्ति की गई। फिलहाल, शीर्ष अदालत में पांच न्यायाधीशों की एक संविधान पीठ राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की सांविधानिकता पर सुनवाई कर रही है। इस पूरे मामले में मुद्दा एक ही है- क्या आयोग के गठन से न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित होगी? महाधिवक्ता (एटॉर्नी जनरल) दलील दे रहे हैं कि कॉलेजियम द्वारा नियुक्त कई न्यायाधीश योग्य नहीं थे। जवाब में सुनवाई कर रहे न्यायाधीश कह रहे हैं कि उन्हीं जजों को सरकार ने बाद में विभिन्न आयोगों में जगह दी। वैसे पहली बार जजों ने सार्वजनिक तौर पर माना है कि कॉलेजियम पद्धति तो सही है, पर उसे सही तरीके से लागू नहीं किया गया।
सर्वोच्च न्यायालय को केवल इतना विचार करना है कि आयोग द्वारा जजों की नियुक्ति किए जाने से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर आंच आती है या नहीं। न्यायपालिका की स्वतंत्रता इससे प्रभावित नहीं होती है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति कौन कर रहा है। यह स्वायत्तता तब प्रभावित होगी, जब न्यायाधीशों को दी गई सुरक्षा कम की जाए। अभी उच्च एवं सर्वोच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को हटाने का एक मात्र तरीका महाभियोग है; हालांकि अब तक किसी जज को महाभियोग के जरिये पद से हटाया नहीं गया है। इसलिए आयोग के गठन से न्यायाधीशों की सेवा शर्तों में कोई अंतर नहीं आया है।
विडंबना यह है कि किसी भी न्यायिक सुधार का विरोध न्यायपालिका की स्वतंत्रता को आधार बनाकर किया जाता है। संविधान लागू होने के बाद चार दशकों से ज्यादा तक केंद्र सरकार न्यायाधीशों की नियुक्ति करती रही, हालांकि कुछ अपवादों को छोड़ सभी मामलों में प्रधान न्यायाधीश की अनुशंसा पर ही नियुक्तियां हुई। 1993 से कॉलेजियम की व्यवस्था लागू हुई, जिस पर पारदर्शिता के अभाव के आरोप लगे। इसलिए एक नई व्यवस्था के साथ प्रयोग करने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
अभी सबसे ज्यादा विवाद आयोग के उन दो सदस्यों को लेकर है, जो विशिष्ट व्यक्ति होंगे। विशिष्ट की कोई परिभाषा नहीं होती। सरकार की दलील है कि न्यायिक नियुक्तियों में सिविल सोसाइटी की भी भूमिका होनी चाहिए। आज अदालतें जनहित याचिकाओं के माध्यम से उन मसलों पर भी निर्णय दे रही हैं, जो सीधे-सीधे कार्यपालिका तथा विधायिका के कार्यक्षेत्र में आते हैं।
कानून का सरोकार आम आदमी से है, इसलिए कानून लागू करने वालों के चयन में आम आदमी की भागीदारी अपेक्षित है। भारत एकमात्र देश है, जहां न्यायाधीश ही न्यायाधीश की नियुक्ति करते है। राष्ट्रमंडल के किसी भी देश में, या अमेरिका, जापान, स्विटजरलैंड में जजों की नियुक्ति में न्यायपालिका के मुखिया से परामर्श तक करने का प्रावधान नहीं है। इंग्लैंड में 2005 में न्यायिक नियुक्ति आयोग का गठन किया गया। अमेरिका में राष्ट्रपति नाम की अनुशंसा करते हैं और नामजद उम्मीदवार से स्टेट जुडिशियटी कमेटी पूछताछ करती है।
हमारे यहां न्याय मिलने में जो विलंब होता है, उसका एकमात्र समाधान है योग्य जजों की नियुक्ति। लेकिन सरकार और न्यायपालिका के बीच टकराव के कारण नियुक्तियां अभी बंद हैं। पांच उच्च न्यायालयों में स्थायी मुख्य न्यायाधीश नहीं हैं। ईमानदार एवं योग्य जजों की नियुक्ति समय की पुकार है।