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प्रीति जिंटा का आईना

Sat, 28 Jun 2014 07:32 PM IST
कुमार प्रशांत
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हर घर में एक आईना होता है! वह आईना होता है और हम भी होते हैं, तो सिर्फ इसलिए कि वह आईना बोलता नहीं है। उस आईने में हम वही देखते हैं, जो हम देखना चाहते हैं। अगर ऐसा नहीं होता, तो किसी भी घर में न कोई आईना बचता और न हम!आईने के सामने खड़े होकर हम अल्लाताला की दी इस चिंपांजीनुमा सूरत को निहारते हैं और उसमें सुंदरता का एक-न-एक कोना खोजकर खुद को सुरक्षित कर लेते हैं। आईना भी और हम भी आप-से-आप सुरक्षित हो जाता है। लेकिन पता नहीं, क्या ऐसा होता है कि बाज वक्त यह आईना हमारी सूरत ही नहीं, हमारी पूरी शख्सियत को सामने ला देता है, और बेपर्दा कर देता है। प्रीति जिंटा के आईने ने अभी यही किया है।
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जब से क्रिकेट में बेहिसाब पैसा और अनगिनत पैसे वाले उतर आए हैं, यह भद्र जनों का खेल तो नहीं ही रह गया है, सामान्यत: हम जिसे खेल कहते हैं, वैसा खेल भी नहीं रह गया है, व्यापार बन गया है। व्यापार में आर या पार कुछ नहीं होता, सब मंझधार में ही होते हैं और इस सावधान तलाश में रहते हैं कि कब मौका मिले कि दूसरे की कश्ती डुबोई जाए! आईपीएल के नाम से क्रिकेट का जो नया बाजार खुला है, उसमें तो यह सब चरम पर है। उसमें कमाई करने अंबानी भी उतरे हैं और शाहरुख खान भी;प्रीति जिंटा भी उतरी हैं और बांबे डाइंग के नेस वाडिया भी! ये सभी व्यापारी हैं, जिनका क्रिकेट-प्रेम उसी कोटि का है, जिस कोटि का क्रिकेट-प्रेमी भारत की हर सड़क पर, हर कहीं मिलता है। लेकिन पैसा भी इनका, प्रचार-माध्यम भी इनका, सरकार व व्यवस्था की नियामतें भी इनकी, तो इनके क्रिकेट-प्रेम को सलाम करने कभी गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी, तो कभी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी मैदान में उतर आती हैं। लेकिन खेल का यह विद्रूप आज मेरा विषय नहीं है। आज तो मैं प्रीति जिंटा के आईने की बात ही करूंगा।

प्रीति जिंटा हिंदी फिल्मी दुनिया की सितारा हैं। उनके नाम कई सफल फिल्में हैं। उनकी अभिनय प्रतिभा के बारे में मतांतर हो सकते हैं, लेकिन उनकी सफलता, उनकी सुंदरता और उनका दबंग व्यक्तित्व विवाद से परे है। वे हमारी उन छुईमुई नायिकाओं में नहीं हैं, जिन्हें आप प्लास्टिक की गुड़िया समझें और उनके दुखिया जीवन की कहानियां पढ़ें। वे हमारे उन नायकों में भी नहीं हैं,जो परदे के अलावा कहीं भी, किसी भी तरह नायक नहीं होते हैं। वे दबंग हैं, क्योंकि उनके पास अपना कंधा भी है और कंधे पर धरा दिमाग भी है। हम उनके निर्णयों से सहमत या असहमत हो सकते हैं, लेकिन निर्णय लेने के उनके साहस व सामर्थ्य से इन्कार नहीं कर सकते। वे फिल्मी पर्दे पर जलवा बिखेरती लड़कियों में अकेली हैं, जिसने पुलिस स्टेशन जाकर, अंडरवर्ल्ड की धमकियों के खिलाफ गवाही दी थी और हीरों के कोयला सम व्यापारी भरत शाह का खेल बेनकाब हो गया था। ऐसा साहस किसी नायक ने भी कभी दिखलाया हो, तो मुझे मालूम नहीं। इसी तरह हम कह सकते हैं कि जब प्रीति जिंटा ने नेस वाडिया से नेह लगाया, तब वे नेस की उस ख्याति से अनजान तो रही नहीं होंगी, जिस बारे में उस दायरे में सुबह-शाम करने वाले सभी जानते ही नहीं हैं, बल्कि सबको बताते भी रहते हैं। लेकिन जिंटा ने वह खतरा मोल लिया और बुरी तरह, बड़ी कीमत चुकाई। लेकिन वह प्रीति जिंटा से कम कभी साबित नहीं हुईं। फैसला भी उनका था और उसके परिणाम की जिम्मेदारी भी उनकी ही थी। उन्होंने दोनों को कुबूल किया।
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उस दिन वानखेडे स्टेडियम में क्या हुआ? प्रीति का कथन कुछ और है, नेस का कुछ और। दूसरों के जो बयान आ रहे हैं, उनमें कुछ प्रीति के करीब, कुछ नेस के करीब होंगे। इसलिए पुलिस अपनी छानबीन करे और जो भी सच उसे पता चलता है, उसे हमारे सामने रखे और उसकी जो भी विधिसम्मत सजा हो, वह अपराधी को मिले, इससे अधिक न हम कुछ कर सकते हैं और न मांग सकते हैं। लेकिन वानखेडे स्टेडियम में उस रोज प्रीति जिंटा के साथ नेस वाडिया की तकरार हुई, यह सीसी कैमरा भी बताता है, उस रोज के अखबार भी बताते हैं, पुलिस के यहां दर्ज हुई रिपोर्ट भी बताती है। अब तो आईपीएल के प्रशासनिक अधिकारी सुंदर रमन ने भी यह कह दिया है कि उस रोज जब शाहरुख खान और प्रीति जिंटा की टीमों के बीच फाइनल खेला जा रहा था, तब कम-से-कम तीन मौकों पर नेस वाडिया की बदजबानी और बदमिजाजी की शिकायत उन तक पहुंची थी, जिसमें से कुछ के वह चश्मदीद गवाह भी हैं। अब प्रीति भी अमेरिका से लौट आई हैं और पुलिस के सामने उनका ताजा बयान भी दर्ज होने ही वाला है।

लेकिन जो विद्रूप हुआ है, वह तो उन सितारों का हुआ है, जो प्रीति के साथ काम करते रहे हैं, जो उसी फिल्म उद्योग का हिस्सा हैं, जिनसे प्रीति जुड़ी हैं। इनमें से कोई भी खुलकर सामने नहीं आया-न अमिताभ बच्चन, न शाहरुख खान, न दूसरे सारे खान और न कोई दूसरी नायिका ही! सबने एक ही बात का सहारा लिया कि हमने तो कुछ देखा नहीं और मामला जांच के तहत है, तो हम कैसे कुछ कहें! इनमें से किसी को भी गवाही देने के लिए नहीं बुलाया गया था। वे अदालत में खड़े भी नहीं थे कि जहां वकील का सिखाया-पढ़ाया ही आप बोलते हैं। यह तो एक नागरिक के रूप में किसी लड़की के साथ हुई बदतमीजी पर अपनी असहमति दर्ज कराने भर की बात की थी। क्या हममें इतना भी साहस नहीं बचा है कि हम कह सकें कि क्या हुआ था, कैसे हुआ था और किसने क्या किया था, इन सबको न जानते हुए भी मैं इसकी गहरी निंदा करता हूं कि कोई नेस किसी प्रीति को सार्वजनिक रूप से भला-बुरा कहे, उसके साथ बदतमीजी करे या कि कुछ ऐसा करे, जो सभ्यता के  किसी भी दायरे में न आता हो।

क्या हम इतना भी कहने से झिझकेंगे कि किसी भी सभ्य समाज में किसी आदमी के साथ आप ऐसा कुछ भी करते हैं, तो वह सर्वथा निंदनीय है; और अगर इसमें कोई लड़की शामिल है, तो बगैर किसी दूसरी जांच-जानकारी के हम इसकी कठोर भर्त्सना करते हैं। लड़की पर धौंस जमाना, अपने शारीरिक बल का आतंक पैदा करना, नेस जैसों के मामले में अपने धन-बल के बल पर जुटाए जाने वाले राजनीतिक-प्रशासनिक रसूख का दंभ भरना सामान्य चलन है। क्या इसका भी अदालत की अवमानना से कोई रिश्ता है कि हम कहें कि स्त्री के अपमान या उसकी गरिमा के खिलाफ किसी भी हालत में, कभी भी की गई हरकत का हम विरोध करते हैं और ऐसा करने वाले की निंदा करते हैं? यह अपने भीतर का कायर है, जो मरने से पहले हमें बार-बार मारता है।

कायरता कहीं भी और किसी के भी भीतर जगह बना लेती है। हमारे समाज का यह जो अभिजात्य कहलाने वाला वर्ग है, वह इस कसौटी पर अधिकतर पामाल ही साबित होता है, क्योंकि उसकी सारी आभिजात्यता उसकी चालाकी में छिपी होती है, साहस में नहीं! हमने जेसिका लाल हत्याकांड में उन सब शूरवीरों को देखा ही है, जो हर रात क्लबों में शराब के आसपास जमा होते हैं और अपनी पहुंच व अपनी हैसियत के किस्से सुना-सुनाकर खाली हुए जाते हैं। लेकिन एक मारी जाती लड़की के बारे में यह तक कहते हिचकिचाते हैं कि हां, हमने यह हत्या होते हुए देखी थी! जो फैशन के नाम पर लाखों की पोशाकें बनाते हैं, वे अपने भीतर के इन्सान को ढकने के लिए चिंदियों की एक झालर भी नहीं बना पाते! यह तब जैसा शर्मनाक था, आज भी वैसा ही शर्मनाक है। हम तब जेसिका से क्षमा भी नहीं मांग सके थे, कम-से-कम अब प्रीति से तो मांगें! प्रीति के आईने में हमारी तस्वीर बहुत लिजलिजी दिखाई दे रही है।
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