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डाटा का खेल और लोकतंत्र

बिंदु डालमिया Updated Fri, 20 Apr 2018 07:57 PM IST
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जुकरबर्ग

सतर्क हो जाइए, क्योंकि नियंत्रण करने के लिहाज से वे बहुत बड़े हैं - फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों।



नुकसान तो हो गया है। जुकरबर्ग डाटा को करेंसी में जिस तरह बदलना चाहते थे, यह नुकसान वाकई उससे कहीं ज्यादा है। फेसबुक ने डाटा मालिकों को सरकारों से कहीं ज्यादा ताकतवर बना दिया है और कई राष्ट्रों की जीडीपी से कहीं ज्यादा धनी। अब तो यही चारा है कि यह देखें कि डाटा लीक मामले में किस तरह नुकसान को नियंत्रित किया जा सकता है। लड़ाई लंबी है। जिस गति से दुनिया बदल रही है और इंटरनेट और इससे जुड़ी गतिविधियां विस्तार ले रही हैं, उस हिसाब से सरकारें कानून बनाने में विफल रही हैं।


आज गाफा (गूगल, ऐपल, फेसबुक और अमेजन) केवल अमेरिकी कंपनियां ही नहीं रह गईं, बल्कि ऐसी कंपनियों में बदल चुकी हैं, जो इतनी विशालकाय हैं कि खत्म करना नामुमकिन-सा है। साथ ही उन्हें नियंत्रित करना भी आसान नहीं। जब हार्वर्ड के एक छोटे से कमरे में एक टेक स्टार्टअप का जन्म हुआ, तब शायद ही इसके संस्थापकों को अंदाज रहा हो कि एक दिन यह डिवाइस और इसकी सेवाएं इतनी अपरिहार्य हो जाएंगी, जिस कदर सांस लेना। लोगों को कनेक्टिविटी और सुविधा देने के नाम पर उनके निजी और सार्वजनिक जीवन में घुस जाना कोई विज्ञान की फंतासी नहीं है, बल्कि आज की उस दुनिया की हकीकत है, जिसमें हम रह रहे हैं। जहां हम सांसें ले रहे हैं, ये सब डरावना है। लेकिन यही गाफा कंपनियों का रेवेन्यू मॉडल भी है। वे आपको निजी सेवाएं देने के बदले आपकी जानकारियों पर नजर रख रही हैं, उससे पैसा बना रही हैं।


ये हमारा डाटा हासिल करती हैं। फिर इस डाटा को कैंब्रिज एनालिटिका जैसे थर्ड पार्टी वेंडर को दे देती हैं। बेशक अमेरिकी कांग्रेस में जुकरबर्ग से पूछताछ हुई, लेकिन हकीकत तो यही है कि फेसबुक पर विश्वास तोड़ने का मामला बनता है। आपकी जानकारियों के साथ खिलवाड़ किया गया है, वह भी बगैर जानकारी के। जैसे ही यूजर्स अपना निजी डाटा देते हैं, वह उनके डाटा बेस में चला जाता है। फिर आपके नियंत्रण से बाहर हो जाता है। डाटा अब एक बिकाऊ कमोडिटी बन गया है, जिसके बदले मनमाफिक फीस ली सकती है।


अब यूरोप अपने सामान्य डाटा संरक्षण कानूनों में बदलाव कर रहा है और दूसरे देश भी ऐसा ही कर रहे हैं। यानी इस तरह की बातों से बचाव की कोशिश हो रही है। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों, ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे और जर्मन चांसलर मर्केल सभी ने इस बड़े पैमाने पर होने वाले ऑनलाइन बिजनेस मॉडल की आलोचना की है। ये मॉडल मोनोपोलाइज (एकाधिकार) या ओलिगोपोलाइज (अल्पाधिकार) से कहीं बड़े हैं, जिसे ग्लोबोपोलाइज (वैश्विक अधिकार) कहना चाहिए। ग्लोबोपोलाइज या ग्लोबलपॉली वे कंपनियां होती हैं, जो फेसबुक और गूगल की तरह होती हैं,  जो अंतरराष्ट्रीय तौर पर वर्चस्व बना लेती हैं और दुनिया भर में चुनावी प्रक्रियाओं तक को प्रभावित करने लगती हैं। ये बिजनेस मॉडल पिछली सदी के बड़े तेल उद्यमों से कहीं ज्यादा बड़े हैं। ये तमाम कानूनों को ताक पर रखने के आरोपों से घिरे होते हैं। निजता के कानून तोड़ते हैं। समस्याएं खड़ी करते हैं, लेकिन उनका समाधान में कोई विश्वास नहीं होता।

 

जो लोग ऐसे बिजनेस के मालिक होते हैं, वे राजनीतिक ताकत पाना चाहते हैं, ताकि अपने हितों को आगे बढ़ा सकें, अपनी गतिविधियां चलाते रहें। ये ऐसे वर्चस्व वाले कुलीन पूंजीवादी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहां सारी ताकत खास डाटा वर्गीकरण और इंटरनेट की मदद से हासिल की जाती है। फिर इस वर्चस्व में वे दुनिया में बिजनेस के नए तौर-तरीके बनाते हैं और स्थानीय तौर पर भी हावी हो जाते हैं।


द कैंब्रिज एनालिटिका लीग या गाफा का सुपर वर्चस्व केवल अकूत धन जुटाने के लिए नहीं है, बल्कि उससे कहीं ज्यादा है। यह पूरा मामला ताकत और नियंत्रण का भी है। अगर भारत इस विदेशी टेक कंपनियों पर विजय नहीं पाएगा, तो यह 21वीं सदी में नए कॉरपोरेट उपनिवेशवाद का शिकार हो जाएगा। भारत को यूरोप की तरह डाटा संरक्षण कानून बनाने की जरूरत है। इसके लिए उसे चीन से सबक लेना चाहिए, जहां वह इन कंपनियों को अपनी शर्तों पर प्रवेश देता है और अगर उसकी बात नहीं मानी गई, तो उसके दरवाजे इनके लिए बंद हो जाते हैं। चीन ने गूगल और फेसबुक के समानांतर जिस तरह अपना नेटवर्क खड़ा किया है, वह वाकई गजब का है। हमें भी आधुनिक दौर की ईस्ट इंडिया सरीखी कंपनियों को बढ़ावा देने की जरूरत नहीं है। हमारे पास अपनी प्रतिभा है कि हम इसी तरह की अपनी टेक कंपनियां खड़ी करें। हमारे पास हजारों ऐसे इंजीनियर हैं, जो आईटी सिस्टम को विकसित करने के लिए तैयार किए गए हैं।
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चुनाव आयोग यू ट्यूब को चुनावों के दौरान पूरी तरह बंद करने पर विचार कर रहा है। हो सकता है कि इस समस्या का हल इससे ही निकल आए। चुनाव आयोग चाहता है कि चुनावी प्रक्रिया से हफ्ते भर पहले देशभर में केवल यू ट्यूब ही नहीं, व्हाट्सऐप, फेसबुक और ट्विटर पर रोक लगा दी जाए। इस पर विचार हो रहा है, ताकि चुनाव की आचार संहिता का पालन हो सके, क्योंकि नए दौर में लोग इन साधनों से चुनावी अभियानों में बढ़त ले रहे हैं। ऐसे कदम जम्मू-कश्मीर में उठाए जा चुके हैं, जहां इंटरनेट पर पाबंदी लगा दी जाती है। चुनावों के दौरान कम से कम 30 बार नेट पर रोक लगाई गई थी। दूसरी बात यह भी है कि इन सोशल वेबसाइट्स के सर्वर देश से बाहर हैं, जहां वे डाटा रखते हैं। इन पर अमेरिकी कानून लागू होते हैं। और अंतरराष्ट्रीय संधि भी। इसलिए भारत सरकार को कहना चाहिए कि इनके सर्वर भारत में हों, ताकि यहां का डाटा बाहर नहीं जा सके और चुनावों पर कोई असर भी नहीं पड़े।


अब यह जनता और सरकार, दोनों पर है कि क्या वे चाहेंगी कि उनकी निगरानी हो, क्योंकि लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया से बड़े डाटा चुराए जा रहे हैं और चुनाव इंटरनेट तथा आभासी दुनिया में लड़े जा रहे हैं।

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