नकदी ज्यादातर भारतीयों के रोजमर्रा के जीवन और खर्च का एक महत्वपूर्ण घटक है और नकदी संकट के दौर में दैनंदिन जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। अनेक भारतीयों के साथ यह स्थिति है, हालांकि खबरों में इसे भौगोलिक आधार पर रेखांकित किया गया है, जिसमें बताया गया है कि तेलंगाना, आंध्र, कर्नाटक, बिहार और गुजरात के कुछ हिस्से ही ऐसे हैं, जो इस समस्या का सामना कर रहे हैं। इन खबरों का असर ऐसा हुआ कि वित्त मंत्री को बयान देना पड़ा और कर अधिकारियों व रिजर्व बैंक से अपील करनी पड़ी कि वे कुछ कार्रवाई करें। इस साजिश की तलाश में अधिकारियों ने तेजी से छापे मारने शुरू कर दिए। आंध्र और तेलंगाना से नकदी के गायब होने की राजनीतिक अटकलों में यह आरोप भी मढ़ा गया कि चूंकि इन दोनों राज्यों का केंद्र सरकार के साथ झगड़ा चल रहा है, इसलिए यह एक बड़े नकदी युद्ध की तैयारी है। कर्नाटक में चूंकि चुनाव होने वाले हैं, इसलिए वहां राजनीतिक दलों द्वारा ज्यादा नकदी की मांग स्वाभाविक ही है। पर्यवेक्षकों ने भी जल्दबाजी में कह दिया कि किसान बीज खरीदने के लिए नकदी जमा कर रहे हैं।
इनमें से कोई भी तर्क बाजार में कम नकदी की समस्या को स्पष्टता से इंगित नहीं कर रहा। रिजर्व बैंक के अनुसार अप्रैल, 2018 के पहले सप्ताह में 18.43 लाख करोड़ रुपये की नकदी प्रचलन में थी, जबकि आठ नवंबर, 2016 से कुछ दिन पहले 17.98 लाख करोड़ रुपये की नकदी प्रचलन में थी। इसलिए नोटबंदी के समय की तुलना में आज ज्यादा नकदी प्रचलन में है। तो फिर नकदी का संकट क्यों है? इसकी एक वजह दो हजार रुपये की उच्च मूल्य वाली करेंसी का ज्यादा प्रचलन में होना है। कम मूल्य वाली करेंसी, जैसे पांच सौ, दो सौ एवं सौ रुपये की करेंसी पर्याप्त संख्या में प्रचलन में न होने के कारण दो हजार रुपये की करेंसी को आसानी से खपाना मुश्किल होता है। मसलन, यदि आप एटीएम से पांच हजार रुपये की निकासी करते हैं, तो ज्यादातर एटीएम आपको दो हजार रुपये के दो नोट एवं सौ-सौ रुपये के दस नोट देता है।
इसके अलावा, ग्रामीण इलाकों में अब भी वित्तीय लेन-देन ज्यादातर नकदी में ही होता है। पर्याप्त रूप से पांच सौ और दो सौ रुपये की करेंसी को एटीएम में रखने के लिए उसमें बदलाव करना अब भी एक चुनौती है, जिसे अब तक पूरी तरह से नहीं किया गया है। नोटबंदी के दौरान तेजी आने के बावजूद डिजिटल लेन-देन को पहला विकल्प बनाने का प्रयास उतना सफल नहीं हुआ, जितने की अपेक्षा थी। नकदी पर निर्भरता एक वास्तविकता है, इसलिए सरकार और रिजर्व बैंक को बढ़ती अर्थव्यवस्था की जरूरतें पूरी करने के लिए प्रचलन में पर्याप्त नकदी सुनिश्चित करने के लिए काम करना चाहिए।
जब भी लोग लेन-देन के डिजिटल तरीके का उपयोग करने की कोशिश करते हैं, तो उन्हें अब भी उसकी लागत चुकानी पड़ती है। नकदी में लेन-देन करने पर उन्हें यह लागत नहीं चुकानी पड़ती। जैसे, व्यापारी क्रेडिट और डेबिट कार्ड से भुगतान करने पर शुल्क वसूलते हैं, यह शुल्क तब भी लगता है, जब कोई व्यक्ति डिजिटल तरीके से धन हस्तांतरित करता है। इसके अलावा धन हस्तांतरण के इन सभी तरीकों में लोगों को यह पता करने की जरूरत है कि वे कैसे इन विकल्पों का उपयोग अपने फोन पर कर सकते हैं या उसके लिए बैंक जाएं। कई ग्रामीण इलाकों में अब भी बैंक एटीएम की पहुंच नहीं है, वहां लोगों के पास एक ही विकल्प है कि वे बैंक की शाखा में जाएं। नकदी निकालना और इसे अपने नियमित व अप्रत्याशित खर्च के लिए घर में रखने को जमाखोरी नहीं कहा जा सकता।
नकदी संकट की खबर पढ़ने के बाद रिजर्व बैंक पांच सौ रुपये मूल्य की करेंसी के ढाई हजार करोड़ रुपये के नोटों की छपाई कर रहा है, जिसे जल्द प्रसारित किया जाएगा। इससे स्थिति में सुधार आएगा और दो हजार रुपये के नोटों पर निर्भरता घटेगी, पर इस संकट का समाधान करना सरकार और बैंकों की जिम्मेदारी है। ऐसे हालात पर प्रतिक्रिया देने के बजाय अगर केंद्रीय बैंक कम मूल्य की करेंसी का प्रचलन बढ़ाता है या हजार रुपये के नोट को दोबारा जारी करता है, तो वह ज्यादा अच्छा होगा। पांच सौ और दो हजार रुपये के नोटों के बीच भारी अंतर होने के कारण ज्यादातर व्यापारियों को कम मूल्य वाली करेंसी के वितरण का प्रबंधन करना मुश्किल लगता है।
सरकार के लिए यही समय है कि वह लेन-देन के लिए डिजिटल तरीकों का उपयोग करने के लिए एक प्रोत्साहन तंत्र पेश करे। उदाहरण के लिए, बैंकों द्वारा डेबिट और क्रेडिट कार्ड उपयोगकर्ताओं को प्रोत्साहित करने के लिए कैश-बैक तंत्र है, इसे भीम या यूपीआई उपयोग करने वालों के लिए पेश किया जा सकता है। यह सुनिश्चित करेगा कि जो समझदार लोग हैं, वे अपने बड़े लेन-देन को डिजिटल प्रारूप में लाएंगे। डिजिटल भुगतान पर लंबे समय के लिए शुल्क हटाने से भी लोगों का ध्यान इस ओर जाएगा।
स्पष्ट है कि नकदी की मांग उसकी आपूर्ति से अधिक है। सरकार को यह स्वीकार करने की जरूरत है कि आपूर्ति को बाधित कर दिया गया है। बीज खरीदने के लिए किसानों द्वारा या चुनाव से पहले राजनीतिक दलों द्वारा नकदी की जमाखोरी जैसे आरोप लगाने का कोई मतलब नहीं है। हमारे जीवन में नकदी की भूमिका को देखते हुए यह अपेक्षा करना लगभग असंभव है कि लोग भुगतान के लिए डिजिटल तरीके अपनाएंगे। वह तभी हो सकता है, जब तक इसे अनिवार्य बना दिया जाए या इसके लिए सरकार प्रोत्साहन दे। एटीएम का खाली रहना इस बात का संकेत करता है कि हमारे नीति निर्माता ऐसी स्थितियों के लिए कितनी खराब योजनाएं बनाते हैं। नोटबंदी के लाभ का ज्ञान फिर बहस में आ गया है, लेकिन इससे करेंसी की आपूर्ति सुधारने की दिशा में सरकार का काम बाधित नहीं होना चाहिए। जब तक कोई विकल्प नहीं मिलेगा, नकदी राजा बना रहेगा। तत्काल भविष्य में तो विकल्प संभव नहीं लगता, अभी तो बिल्कुल नहीं।