इसकी कल्पना करें कि ट्रंप प्रशासन ने अगर 2018 में ऐसा कोई कानून बनाया होता, जिसके तहत सरकार के पास ऐसे किसी भी अमेरिकी को गिरफ्तार करने और उसके खिलाफ मुकदमा चलाने का अधिकार होता, जो संदिग्ध अवस्था में अश्वेतों की आबादी के आसपास मंडराते पाए जाते, तो क्या होता। यह भी कल्पना करें कि अमेरिकी उस कानून का विरोध करते, लेकिन बदले में उनका सामना आंसू गैस और रबड़ की गोलियों से होता, तो क्या होता। और अंत में यह भी कल्पना करें कि अमेरिका में उस कानून को रोकने और संविधान की भावना को बचाए रखने के लिए प्रभावी न्यायपालिका नहीं होती, तो क्या होता।
हांगकांग में इस सप्ताह यही हुआ। लगभग दस लाख लोग उस कानून के खिलाफ सड़कों पर उतर आए, जो स्थानीय अधिकारियों को किसी भी ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करने और चीन में प्रत्यर्पित करने का अधिकार देता है, जो कुल 37 तरह के अपराधों में से किसी एक को अंजाम देता है। हालांकि राजनीतिक अपराध को इस सूची में नहीं रखा गया है, लेकिन हांगकांग के लोग इतने भी मूर्ख नहीं हैं कि चीन की चालाकी न समझ पाएं। राजनीतिक विरोधियों पर आपराधिक आरोप लगाना बीजिंग के लिए बाएं हाथ का खेल है। बल्कि वह इस तरह के लोगों को तब तक के लिए गायब करवा देता है, जब तक कि वे अपना अपराध न स्वीकार कर लें।
वर्ष 2015 में ही चीनी अधिकारियों ने हांगकांग के पांच पुस्तक विक्रेताओं का अपहरण कर लिया और महीनों तक उन्हें गोपनीय जगह में छिपाकर रखा, जब तक कि उन्होंने अपना अपराध स्वीकार नहीं कर लिया। उन पुस्तक विक्रेताओं पर चीन-विरोधी संवेदनशील किताबें अपने पास रखने और बेचने का आरोप था। ऐसे ही वर्ष 2017 में चीनी अधिकारियों ने अपने ही एक अरबपति कारोबारी जियाओ जिन्हुआ का हांगकांग से अपहरण कर लिया। तब से उन्हें देखा नहीं गया है।
ताजा प्रत्यर्पण कानून चीन के दमनकारी शासन का ताजा उदाहरण है, हालांकि यह हांगकांग में उसकी तानाशाही का आखिरी उदाहरण नहीं है। चूंकि बहुलतावाद को बीजिंग अपने लिए खतरा मानता है, इसलिए वह ऐसी कोई गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहता, जिससे हांगकांग को लगे कि वह स्वतंत्र है और अपना शासन खुद चला सकता है।