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जंग के नए मैदान

निरंकार सिंह
Updated Mon, 13 Jul 2020 08:21 AM IST
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media
जंग अब सिर्फ सीमाओं पर ही नहीं लड़ी जाती है। अब नई तकनीक और एप्स उसके खास हथियार बन गए हैं। कई देश तो रोबोटिक सेना भी तैयार कर रहे हैं। लेकिन चीन ने युद्ध के लिए जिन अनैतिक हथकंडों का इस्तेमाल किया है, उसकी कोई मिसाल ही नहीं मिलती। पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया पर हुआ साइबर हमला भी चीन की शातिर चाल थी। यह प्रायोगिक तौर पर किया गया था, ताकि चीन को अपनी क्षमताओं का पता चल सके। पहले लड़ाई उन हथियारों की मदद से होती थी, जो जंग के मैदान तक लाए जाते थे। लेकिन 1990 के बाद से जंग का एक नया पहलू सामने आया। 


दुनिया में आर्थिक मोर्चे पर जंग शुरू हुई। यह जंग बेहतर तकनीक के माध्यम से बाजार की ताकतों को अपने नियंत्रण में लाने के लिए कौशल रूपी हथियार से लड़ी जा रही है। इस

जंग में अमेरिका, जापान, ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, जर्मनी, दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ देश शामिल हैं। इसका मकसद ज्यादा से ज्यादा दौलत दूसरे देशों से व्यापार के जरिये हासिल करना है। वैश्वीकरण के इस युग में बेहतर और सस्ती तकनीक ही आर्थिक विकास की कुंजी और प्रेरक शक्ति हो गई है। चीन ने सस्ती तकनीक और अपनी मुद्रा युआन की कमजोरी के सहारे दुनिया के बाजार पर कब्जा कर लिया है। उधर दुनिया के साइबर स्पेस में भी चीन का कब्जा बढ़ता जा रहा है। 


अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ और भारत सहित दुनिया के कई देश चीनी ‘साइबर वार’ से त्रस्त हैं। पश्चिमी देशों और चीन के माहिर हैकर्स के बीच साइबर वार शुरू हो चुकी है। पिछले दशकों में अमेरिका और भारत के कई सैन्य संस्थानों पर साइबर हमले हुए थे। चीनी हैकरों द्वारा ये हमले खुफिया सूचना जुटाने के मकसद से किए गए थे। लिहाजा नाटो और यूरोपीय संघ ने सभी सदस्य देशों को अलर्ट जारी कर दिया। इस बार बार सिर्फ चेतावनी नहीं दी गई, बल्कि साइबर वार की औपचारिक रूप से घोषणा की गई है।


चीन भविष्य में साइबर युद्ध होने पर खुद को लाभ की स्थिति में रखना चाहता है, इसलिए उसने साइबर स्पेस में अपनी गतिविधियां बढ़ा दी हैं। चीन अपनी साइबर क्षमता को कई तरह से लैस कर रहा है। वेबसाइट्स को ब्लॉक करने, साइबर कैफों में गश्त लगाने और मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर निगरानी रखने के लिए बड़ी संख्या में साइबर पुलिस (हैकर्स) तैनात कर रखी है। दुनिया चीन की साइबर मोर्चेबंदी से परेशान है। लंदन में पिछले वर्ष साइबर सुरक्षा के लिए कैबिनेट आफिस बनाया गया था, जिसका कहना है कि साइबर हमले दो प्रकार के होते हैं। एक जो कंप्यूटर सिस्टम को खराब करते हैं और दूसरे हमले ‘फिशिंग ट्रिप्स’ कहलाते हैं। ऐसे साइबर हमले संवदेनशील सूचनाएं हासिल करने के लिए किए जाते हैं।


अमेरिका के सुरक्षा संस्थानों सहित सभी सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों पर होने वाले साइबर हमलों में से 90 फीसदी और जर्मनी पर होने वाले साइबर हमलों में से 60 फीसदी चीन से किए जाते हैं। ब्रिटेन भी बड़े पैमाने पर चीनी साइबर आक्रमण का शिकार बन रहा है। साइबर दुनिया के जानकारों का कहना है कि चीन हैकरों का स्वर्ग है। रूस और पूर्वी यूरोप के देशों की तरह हैकिंग वहां का भारी मुनाफा देने वाला राष्ट्रीय खेल बन चुका है। वहां हैकर्स सम्मेलन होते हैं। हैकर्स ट्रेनिंग अकादमियां और हैकर्स डिफेंस व हैकर्स एक्स फाइल जैसी पत्रिकाएं हैं, जो कंप्यूटर को भेदने और ट्रोजन हार्स और ट्रेपडोअर जैसी हैकिंग तकनीकों की विस्तृत जानकारी देती हैं। इसके अलावा हैकर्स पेनीटेशन मेनुअल जैसी पुस्तकें भी उपलब्ध हैं। 


इस इंटरनेट और कंप्यूटर संजाल से जुड़ी नई दुनिया में अगला निर्णायक युद्ध साइबर युद्ध होगा, क्योंकि सारी जानकारियां कंप्यूटर नेटवर्क में ही संग्रहीत हैं और इंटरनेट ही सूचनाओं के आदान-प्रदान का प्रमुख जरिया है। हालांकि भारत आईटी शक्ति कहलाता है, मगर ब्रॉडबैंड के इस्तेमाल और इंटरनेट कनेक्शनों की संख्या के मामले में वह चीन से बहुत पीछे है। इसलिए सरकार को देशहित में विदेशी तकनीक पर अपनी निर्भरता कम करनी चाहिए। खासतौर से चीन जैसे कुटिल, धूर्त और दगाबाज देश की तकनीक से तो हमें सदैव सतर्क रहना चाहिए।
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