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यहां भी अब दरवाजे खुलने चाहिए

विनय झैलावत Published by: विनय झैलावत Updated Mon, 13 Jul 2020 08:18 AM IST
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सर्वोच्च न्यायालय
देश कोविड-19 के भय से सावधानी के साथ धीरे-धीरे मुक्त होने हेतु प्रयासरत है। पर देश के न्यायालय इसके खौफ से अभी मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय की तरह अधिकांश उच्च न्यायालयों ने कहा है कि वे केवल आवश्यक प्रकरणों की सुनवाई करेंगे। कौन से प्रकरण आवश्यक हैं, यह न्यायिक अधिकारियों के विवेक पर निर्भर है। जिला, परिवार एवं उपभोक्ता न्यायालयों का तो संस्थागत ढांचा भी इस संकट से निपटने में सक्षम नहीं है। न्यायालय में जहां भी आवश्यक काम हो रहा है, वह ऑनलाइन है। इस कारण न्याय व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है तथा विचाराधीन प्रकरणों की सुनवाई नहीं हो पा रही। है। 


प्रकरणों की अंतिम सुनवाई का तो प्रश्न ही नहीं है। इस बंदी के कारण न केवल पक्षकार, वरन वकील भी प्रभावित हो रहे हैं। भारतीय संविधान के अनुसार न्याय पाना एक मौलिक अधिकार है, जिससे किसी भी व्यक्ति को वंचित नहीं रखा जा सकता। न्यायिक प्रक्रिया हेतु बुनियादी व्यवस्था उपलब्ध कराना भी न्यायपालिका तथा शासन का एक दायित्व है। न्याय प्रजातांत्रिक राष्ट्र के व्यक्तियों में भरोसे का स्तंभ है। उसका होना किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र हेतु अति आवश्यक है। लॉकडाउन के इस दौर में न्याय तक व्यक्तियों की पहुंच बहुत सीमित हुई है, जो अच्छा संकेत नहीं है।


एक आम वकील की बात करें, तो ऑनलाइन पद्धति उसकी समझ से परे है। जो इस पर काम कर रहे हैं, उन्हें भी अनेक प्रक्रियाओं तथा औपचारिकताओं का पालन करना पड़ रहा है। वकीलों की मजबूरी यह भी है कि वे अपने पर लागू अधिनियम तथा बार काउंसिल के प्रतिबंधों के कारण अन्य कोई व्यवसाय भी नहीं कर सकते। केंद्र तथा राज्य सरकारों ने भी इस वर्ग की परेशानियों को समझने अथवा दूर करने का कोई प्रयास नहीं किया है। यह भी प्रतीत हो रहा है कि सारी व्यवस्था आम वकीलों के हाथों से निकल रही है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस संबंध में गंभीर आरोप भी लगाए हैं।


लॉकडाउन के प्रारंभिक दिनों में अन्य वर्गों की तरह इस वर्ग में चिंता नहीं थी, क्योंकि शुरुआत में यह मात्र 21 दिन का था। लेकिन जैसे-जैसे इस अवधि में विस्तार होता गया, वकीलों की चिंता बढ़ने लगी। न्यायालयों की कार्यशैली भी बदलने लगी। यह ऐसी पद्धति थी, जिसमें वकीलों ने कभी काम नहीं किया था। ऑनलाइन प्रकरण प्रस्तुत करना, ऑनलाइन बहस तथा ऑनलाइन निर्णय एक ऐसी पद्धति थी, जो वकीलों ने कभी देखी नहीं थी। ऑनलाइन भी जो काम हुआ, वह बहुत कम और प्रारंभिक और आवश्यक प्रकरणों की सुनवाई था। 


ये चंद प्रकरण भी वे प्रकरण थे, जो नए प्रस्तुत किए गए थे तथा जो मूलतः फौजदारी प्रकरण जैसे जमानत के प्रकरण थे। कई लोगों का अनुभव तकनीकी दिक्कतों के कारण अच्छा नहीं रहा है। उनका कहना है कि इस पद्धति से प्रभावी सुनवाई संभव नहीं है। सुनवाई की ऑनलाइन पद्धति मूल रूप से तकनीक और संयोजन पर निर्भर है। इसका मूल संबंध इंटरनेट एवं साधनों की उपलब्धता पर निर्भर है। हर वकील के लिए यह सहज एवं सरलता से उपलब्ध भी नहीं है। उनके पास आवश्यक संसाधन भी नहीं हैं। साथ ही, इन वकीलों के पास आवश्यक तकनीकी ज्ञान भी नहीं है। 


ऑनलाइन पर प्रकरणों की प्रस्तुति की प्रक्रिया भी लंबी और जटिल है। वैसे भी ऑनलाइन प्रकरणों की सुनवाई एक सीमा तक ही सुनवाई में मददगार हो सकती है। यह नियमित सुनवाई का विकल्प नहीं हो सकता। बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अनुसार, देश के न्यायालयों में वास्तव में क्या हो रहा है, इससे वकील अंधकार में हैं। उन्हें विश्वास में नहीं लिया जा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक, देश में करीब 17 लाख वकील हैं। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी इस पर अपनी चिंता जताई है। इस संस्था ने वकीलों की आर्थिक मदद के लिए पत्र लिखे, लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला है।


अब केंद्र एवं राज्य सरकारों के कार्यालय पूरी क्षमता के साथ कार्य करने लगे हैं। ऐसे में, न्यायपालिका को भी अपने न्यायालय पूरी क्षमता के साथ खोलने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। प्रजातंत्र के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के लिए यह आवश्यक है कि न्यायपालिका पूरी क्षमता के साथ कार्य प्रारंभ करे। अनुमानत: देश के न्यायालयों में 37 लाख प्रकरण विचाराधीन है। 28 लाख प्रकरण जिला एवं छोटी अदालतों के सामने विचाराधीन हैं, तो 9,20,000 प्रकरण विभिन्न उच्च न्यायालयों में विचाराधीन हैं। यह भी अनुमान है कि लगभग 6,60,000 प्रकरण विगत दो दशकों से तथा 1,31,000 प्रकरण तीस साल से अधिक समय से विचाराधीन हैं। 
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यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि एक फौजदारी अपील की अंतिम सुनवाई इस आवश्यक सुनवाई में नहीं आ सकती। यानी जो जेल में अपनी सजा काट रहा है, वह वहीं रहेगा और उसकी सुनवाई नहीं होगी। कोविड-19 से सुरक्षा भी जरूरी है। यह व्यवस्था की जानी चाहिए कि न्यायाधीश, पक्षकार और वकील परस्पर संपर्क में कम से कम आएं। जहां पक्षकारों की जरूरत न हो, वहां उन्हें न बुलाया जाए। उन्हीं वकीलों को प्रवेश दिया जाए, जिनके प्रकरण न्यायालयों में सुनवाई हेतु नियत हैं। एक कांच की दीवार भी न्यायाधीशों एवं वकीलों की सुरक्षा हेतु लगाया जा सकता है। 


जो वकील प्रकरणों की ऑनलाइन प्रस्तुति में कठिनाई महसूस कर रहे हैं, उनके लिए व्यक्तिगत रूप से प्रस्तुति की व्यवस्था की जानी चाहिए। उपस्थिति कम करने के लिए कुछ दिन सुनवाई की अवधि को दो भागों में बांटा जा सकता है। न्यायालय का एक सत्र व्यक्तिगत सुनवाई का हो सकता है तथा दूसरा सत्र ऑनलाइन सुनवाई का। इससे न्यायालयों में वकीलों की उपस्थिति भी नियंत्रित हो सकती है। 


न्यायालयों के कर्ता-धर्ताओं का यह दायित्व है कि वे समस्त प्रक्रिया के संबंध में वकील संघों तथा बार कौंसिल को भरोसे में लें। कोई भी स्थिति हो, पर पक्षकारों को न्याय प्राप्त होना चाहिए तथा सुनवाई का अवसर भी दिया जाना चाहिए। संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि कोई भी अधिकार बगैर उपचार के नहीं हो सकता। लेकिन आज इसी महत्वपूर्ण कथन को भुलाया जा रहा है। -लेखक पूर्व असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।
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