राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने चुनाव आयोग से राहुल गांधी के उस बयान पर शिकायत दर्ज कराते हुए कांग्रेस की मान्यता खत्म करने की मांग की है, जिसमें उन्होंने कहा कि 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के लिए संघ के लोग जिम्मेदार थे। इसके जवाब में कांग्रेस ने अपनी वेबसाइट पर देश के पहले गृह मंत्री सरदार पटेल के कुछ ऐसे दस्तावेज एवं पत्र जारी किए हैं, जो स्पष्ट तौर पर बताते हैं कि संघ के 'हिंसक' रवैये ने ऐसा माहौल बनाया, जिसमें गांधी की हत्या हुई। ऐसा लगता है कि भाजपा एवं उसके जन्मदाता संघ परिवार के साथ वैचारिक लड़ाई में कांग्रेस चुनाव आयोग का इस्तेमाल करना चाहती है। इतिहास कांग्रेस एवं भाजपा के बीच छिड़े तीव्र विवाद का स्थल बन गया है, क्योंकि नरेंद्र मोदी ने बार-बार कहा है कि कांग्रेस ने स्वतंत्रता संग्राम के दिग्गजों को यथोचित सम्््मान नहीं दिया है।
जहां तक कांग्रेस की बात है, तो चुनाव आयोग में होने वाली औपचारिक सुनवाई उसके लिए गांधी और संघ परिवार के बीच के रिश्ते को उजागर करने का अवसर बनेगी। संघ परिवार महात्मा गांधी के साथ अतीत के अपने रिश्ते को लेकर असहज रहा है, खासकर विभाजन और पाकिस्तान के निर्माण को लेकर। हाल के दौर में नरेंद्र मोदी ने कई बार भारतीय राष्ट्रवाद के निर्माण में सरदार पटेल की महत्वपूर्ण भूमिका का जिक्र करते हुए कहा है कि 'कांग्रेसी इतिहासकारों ने' उनके योगदान का समुचित मूल्यांकन नहीं किया। जबकि कांग्रेस का जवाब यह है कि संघ या भाजपा को सरदार पटेल के बारे में बात करने का कोई अधिकार इसलिए नहीं है, क्योंकि महात्मा गांधी की हत्या के बाद पटेल ने ही संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था। ऐसे में, चुनाव आयोग के समक्ष संघ की औपचारिक शिकायत के संदर्भ में गांधी-पटेल के साथ उसके रिश्ते पर चर्चा हो सकती है। राहुल गांधी की ताजा टिप्पणी का चुनाव आयोग चाहे जो भी मतलब निकाले, लेकिन संघ परिवार के खिलाफ सरकारी अभिलेखागारों में काफी तथ्य हैं।
सरदार पटेल जब गृह मंत्री थे, तब चार फरवरी, 1948 को संघ पर प्रतिबंध लगाते वक्त जारी सरकारी अधिसूचना में कहा गया था, '...व्यावहारिक तौर पर संघ के सदस्य अपने घोषित आदर्शों (प्यार-भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना और हिंदुओं की सेवा) का पालन नहीं करते हैं। संघ के सदस्यों द्वारा अवांछित, यहां तक कि खतरनाक गतिविधियों को अंजाम दिया गया है।...संघ से जुड़े कुछ सदस्य आगजनी, लूट, डकैती और हत्या से जुड़ी हिंसक गतिविधियों में शामिल रहे हैं और उन्होंने अवैध हथियार और गोला-बारूद जमा किया है। उन्हें पर्चे बांटते, आतंकी तरीकों के सहारे लोगों को ठगते, आग्नेयास्त्र खरीदते, सरकार के खिलाफ असंतोष पैदा करते और पुलिस व सेना को दुष्प्रेरित करते पाया गया है। ये सारी गतिविधियां गुपचुप तरीके से अंजाम दी गईं...।'
सरकार की इस अधिसूचना से साफ है कि संघ के बारे में तब सरदार पटेल की क्या सोच थी। संघ के बचाव में लिखी श्यामा प्रसाद मुखर्जी की दलील को खारिज करते हुए 18 जुलाई, 1948 को पटेल ने उन्हें पत्र लिखा था कि 'संघ की गतिविधियां स्पष्ट तौर पर सरकार एवं देश के अस्तित्व के लिए खतरनाक हैं।... समय के साथ-साथ संघ परिवार की विध्वंसक गतिविधियों में संलग्नता बढ़ती गई है।'
ऐसा लगता है कि संघ के खिलाफ पटेल के आरोप ज्यादातर हिंसा का वातावरण तैयार करने और देश के विध्वंस को लेकर थे, जिसकी वजह से महात्मा गांधी की हत्या हुई। बेशक इस आरोप के खिलाफ संघ के पास यह मजबूत तर्क मौजूद है कि गांधी हत्या में सीधी लिप्तता के आरोपों से मुक्त कर 11 जुलाई, 1949 को उस पर लगा प्रतिबंध हटा दिया गया। संघ ने तब यह वचन दिया था कि वह राजनीति में सीधी भागीदारी नहीं करेगा और सांस्कृतिक संगठन के रूप में ही काम करेगा। गुरु गोलवलकर हालांकि वैकल्पिक रणनीति अपनाते हुए संघ के लोगों को राजनीति में भेजते रहे। इस तरह से संघ की वैचारिकता में दीक्षित लोगों को राजनीति में प्रवेश कराने की परंपरा शुरू हुई, जिसने बाद में जनसंघ का स्वरूप लिया।
प्रतिष्ठित इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने भी कुछ समय पहले अपने एक लेख गोलवलकरः द गुरु ऑफ हेट में सरदार पटेल के इस आरोप का उल्लेख किया है कि संघ ने हिंसक एवं विध्वंसक वातावरण बनाने का काम किया। रामचंद्र गुहा लिखते हैं, '30 जनवरी, 1948 को नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी। हालांकि उस समय वह संघ के सदस्य नहीं थे, लेकिन उससे पहले थे। और ऐसी खबरें थीं कि कुछ जगहों पर संघ के सदस्यों ने मिठाई बांटकर गांधी की हत्या पर खुशी मनाई। एहतियातन गोलवलकर एवं अन्य संघ कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया। हाल ही में कुछ गोपनीय दस्तावेजों का अवलोकन कर चुके लेखक का यह दृढ़ विश्वास है कि महात्मा गांधी की हत्या में संघ परिवार की भले कोई सीधी भागीदारी नहीं थी, पर इसके प्रमुख नेता इस तरह की आशंका से अनजान नहीं थे। छह दिसंबर, 1947 को गोलवलकर ने दिल्ली के पास गोवर्धन में संघ कार्यकर्ताओं की एक बैठक बुलाई थी। पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक, उस बैठक में इस पर चर्चा की गई कि 'लोगों को आतंकित करने और उन पर अपनी पकड़ बनाने के लिए कांग्रेस के प्रमुख व्यक्तियों की हत्या कैसे की जाए।'
मौजूदा राजनीतिक संदर्भ में भाजपा नहीं चाहेगी कि ये ऐतिहासिक तथ्य चुनाव आयोग की सुनवाई के जरिये सामने आएं। कांग्रेस ने हालांकि संघ परिवार के खिलाफ ऐसा आरोप पहली बार नहीं लगाया है। अतीत में भी चुनाव प्रचार के दौरान गांधी हत्या पर बात हुई है। पर लगता है कि इस बार कांग्रेस दस करोड़ से अधिक युवा एवं नए मतदाताओं को संघ परिवार का इतिहास बताने की कोशिश करेगी।