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दलबदल न कहो इसको

Tue, 11 Mar 2014 07:53 PM IST
राजेंद्र शर्मा
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बहनो-भाइयो, मैंने उस पार्टी से नाता तोड़ लिया है, जिसे मैं कल तक अपना मानता था। अब मैं उस पार्टी का वफादार सिपाही हूं, जिसे मैं कल तक पराया जानता था। उस पार्टी में मेरा दम घुट रहा था। जनता की सेवा का मौका ही नहीं मिल रहा था। मैंने बहुत इंतजार किया, पर सब बेकार। जब जनता की सेवा का मौका मुझसे छीनकर दूसरों को दे दिया गया, तब मेरी अंतरात्मा ने विद्रोह कर दिया। यहां आकर मैं सुकून महसूस कर रहा हूं। पराया जानकर जिस पार्टी को अब तक मैं गरियाता रहा, वही अपनी निकली।
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यह दुश्मनों का कुप्रचार है कि मैं दलबदलू हूं। माना कि अब मैं ‘स’ पार्टी में नहीं, ‘द’ पार्टी में हूं। लेकिन इसमें दलबदलूपन क्या है? एक दल से चिपके रहना तो वफादारी नहीं है। आखिर, पार्टी बड़ी है या जनता? दल से वफादारी के लिए मैं जनता की सेवा के साथ विश्वासघात कैसे कर देता! जो दल जनता की सेवा का अवसर ही न दे, उसका परित्याग करना ही धर्म है। गोस्वामीजी पहले ही कह गए हैं-तजिए ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही! कल तक जिसे मैं अपना कहता था, उस पार्टी से आज मुझे घिन आती है।

यह मेरा दुर्भाग्य है कि मेरे साथ बार-बार ऐसा होता है। लेकिन, मैं पूछता हूं कि इसमें मेरा क्या कुसूर है? मैं जनता की सेवा किए बिना नहीं रह सकता। इसके लिए मुझे कितने ही दल क्यों न छोड़ने पड़ें! जनता की सेवा के प्रति इस निष्ठा का आदर करना चाहिए या मुझे दुरदुराना चाहिए?
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मैंने ‘अ’ क्यों छोड़ा, जनता की सेवा के मौके के लिए। ‘ब’ ने वायदा करके भी जनता की सेवा का टिकट नहीं दिया, मैंने ‘अ’ में घर वापसी कर के देख लिया, कोई फायदा नहीं हुआ। तब मुझे ‘ग’ में जाना ही था। ‘ग’ वालों से निराश होकर अब ‘द’ में आया हूं कि यहां जरूर जनता की सेवा का टिकट मिलेगा। मनुष्य के हाथ में तो प्रयत्न ही है, फल नहीं।
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बहनो-भाइयो, मेरा आपसे वायदा है कि जनता की सेवा के टिकट के लिए प्रयत्न मैं कभी नहीं छोडूंगा। इसके लिए मुझे चाहे कितने ही दल क्यों न बदलने पड़ें!
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