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आईपीओ की बात : एलआईसी के शेयर का गणित, यह सरकार का विनिवेश है निवेशक ध्यान रखें

नारायण कृष्णमूर्ति
Updated Sat, 30 Apr 2022 06:29 AM IST

सार

भारत सरकार के पूर्ण नियंत्रण में एलआईसी के कामकाज पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। मसलन, एलआईसी की कई योजनाएं सरकार की सामाजिक प्रतिबद्धता के हिस्से के रूप में मौजूद हैं। इसी तरह, एक तथ्य यह है कि एलआईसी ने विभिन्न कारणों से सरकार के आग्रह के तहत कई कंपनियों में निवेश किया है। एलआईसी इरडा और सेबी की निगरानी के दायरे से बाहर रहा है।
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एलआईसी आईपीओ - फोटो : अमर उजाला


यहां तक कि उन कर्मचारियों और खुदरा निवेशकों के लिए भी एक कोटा है, जो आईपीओ का हिस्सा बनना चाहते हैं। आईपीओ के जरिये सरकार 22.13 करोड़ शेयर बेचेगी और निवेशक पंद्रह शेयरों के सेट में बोली लगा सकते हैं। प्रत्येक शेयर की कीमत 902-949 रुपये के बैंड में है, जिसमें पॉलिसीधारकों के लिए 60 रुपये और खुदरा निवेशकों व कर्मचारियों के लिए 45 रुपये की छूट है। एक खुदरा निवेशक के रूप में कोई भी व्यक्ति आईपीओ में दो लाख रुपये तक का निवेश कर सकता है और अधिकांश आम निवेशक खुदरा कोटा, पॉलिसीधारक कोटा और कर्मचारी कोटा के तहत आवेदन कर सकते हैं, यदि वे किसी तरह से एलआईसी से जुड़े हैं। 


प्रभावी रूप से एक छोटा निवेशक यदि वह कर्मचारी, पॉलिसीधारक और खुदरा निवेशक है, तो अधिकतम छह लाख रुपये तक निवेश कर सकता है। अधिकांश सरकारी स्वामित्व वाले व्यवसायों की तरह एलआईसी का आईपीओ वास्तव में सरकार का विनिवेश है, न कि अन्य कंपनियों की तरह का आईपीओ, जो सार्वजनिक होते हैं। सरकार ने कई कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी पूरी तरह से बेचकर विनिवेश किया है, जैसा कि सरकार ने टाटा के हाथों वीएसएनएल को बेच दिया था। एनटीपीसी, कोल इंडिया, जनरल इंश्योरेंस कंपनी और कई अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के मामले में विनिवेश आंशिक हिस्सेदारी बेचकर किया गया। 


सरकार इन कंपनियों में से कुछ में अपनी हिस्सेदारी को आंशिक या पूर्णतः बेचकर धन पैदा करके अपनी वित्तीय स्थिति में सुधार करना चाह रही है। एलआईसी के मामले में भी हिस्सेदारी बेचने से सरकार को लाभ होगा, साथ ही अन्य सूचीबद्ध कंपनी की तरह कंपनी को परिवर्तित करने के लिए एक रोडमैप बनेगा, जिसे बाद में बाजार नियामक द्वारा विनियमित किया जाना है और सूचीबद्ध कंपनियों पर लागू नियमों का पालन करना है। बीमा क्षेत्र में एलआईसी का एकाधिकार है, जो इस क्षेत्र में निजी खिलाड़ियों के प्रवेश के 22 वर्षों के बाद भी 60 फीसदी हिस्सेदारी पर अपना कब्जा बनाए हुए है। 


एलआईसी लगभग 40 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति का प्रबंधन करता है और यह विश्व का पांचवां सबसे बड़ा जीवन बीमाकर्ता और भारत का सबसे बड़ा संपत्ति प्रबंधक है। पिछले कुछ वर्षों में जब से एलआईसी के आईपीओ की योजना बनाई गई है, इसका मूल्यांकन 16 लाख करोड़ रुपये से घटकर अब छह लाख करोड़ रुपये हो गया है। मूल्यांकन में इस तरह का उतार-चढ़ाव अप्रत्याशित है और यह अंतर एलआईसी के मूल्य निर्धारण के अस्पष्ट तरीके के कारण है। दिल्ली, मुंबई, बंगलूरू, चेन्नई और कोलकाता जैसे बड़े शहरों में एलआईसी के स्वामित्व वाली कुछ विरासती और ऐतिहासिक इमारतों की कल्पना करें। 


वे बहुमूल्य संपत्तियां हैं, लेकिन जब तक सरकार उस जमीन को नहीं बेचती, जिस पर ये इमारतें खड़ी हैं, तब तक कोई खरीदार नहीं मिल सकता है। एलआईसी की संपत्ति के सही मूल्य निर्धारण में भी यही बात लागू होती है, खासकर जब पॉलिसीधारक की मृत्यु या परिपक्वता वाले दावों, जिनका दावा नहीं किया गया है, को जोड़ा जाए। इसके अलावा, हर पॉलिसी के साथ आने वाली सॉवरेन गारंटी को एक निश्चित मूल्य से नहीं जोड़ा जा सकता है। ये सभी ऐसे पहलू हैं, जो निगम के मूल्य निर्धारण में मायने रखते हैं, लेकिन इनका मौद्रिक मूल्य क्या होगा, यह एक बड़ा सवाल है। 


भारत सरकार के पूर्ण नियंत्रण में एलआईसी के कामकाज पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। मसलन, एलआईसी की कई योजनाएं सरकार की सामाजिक प्रतिबद्धता के हिस्से के रूप में मौजूद हैं। इसी तरह, एक तथ्य यह है कि एलआईसी ने विभिन्न कारणों से सरकार के आग्रह के तहत कई कंपनियों में निवेश किया है। एलआईसी इरडा और सेबी की निगरानी के दायरे से बाहर रहा है। इस तरह से यह इतनी बड़ी है कि विफल हो सकती है और इस पर कई नियम लागू होने हैं। जिस तरह से किसी चीज की 'सेल' लगी होने पर आप उन चीजों को नहीं खरीदते हैं, जिनकी आपको जरूरत नहीं होती, उसी तरह एलआईसी का आईपीओ है। 
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इसके शेयर अन्य सूचीबद्ध कंपनियों के शेयर की तरह होंगे, और यह बाजार की मांग और आपूर्ति पर निर्भर करेगा। इसकी कीमतों पर कोई नियंत्रण नहीं होगा। अगर अतीत में सरकार द्वारा विनिवेशित अन्य कंपनियों के सूचीबद्ध होने के बाद के प्रदर्शन को देखें, तो उसके मिश्रित परिणाम सामने आते हैं। कोल इंडिया 2010 में 1,51,999 करोड़ रुपये के आईपीओ के साथ बाजार में उतरी थी, जो तब सबसे बड़े आईपीओ में से एक था। यह इश्यू बाजार में प्रीमियम पर खुला, लेकिन 12 साल बाद यह अपने आईपीओ मूल्य से काफी नीचे है। 


जनरल इंश्योरेंस कंपनी का भी हाल इससे अलग नहीं है। अक्तूबर, 2017 में 11,176 करोड़ रुपये का आईपीओ अपनी निर्धारित कीमत से नीचे खुला और ज्यादातर नीचे ही रहा है। लेकिन सभी आईपीओ खराब प्रदर्शन नहीं करते। एसबीआई कार्ड और भुगतान सेवा कंपनी मार्च, 2022 में सार्वजनिक हुईं और छूट पर सूचीबद्ध हुईं, लेकिन आज यह अपने आईपीओ मूल्य से काफी ऊपर है। निवेशकों, विशेष रूप से पहली बार निवेश करने वाले निवेशकों को यह जानना चाहिए कि एक बार सूचीबद्ध आईपीओ मूल्य एक संदर्भ है और गारंटी नहीं है। 


सूचीबद्ध कीमतों में हर दिन उतार-चढ़ाव हो सकता है। अगर वे मूल्य में ऐसे उतार-चढ़ाव का जोखिम उठा सकते हैं, तो एलआईसी या किसी अन्य आईपीओ में निवेश कर सकते हैं। अगर वे कीमतों में उतार-चढ़ाव का जोखिम नहीं लेना चाहते, तो कोई भी आईपीओ उनके लिए नहीं है। एलआईसी के आईपीओ में तभी निवेश करें, जब आप तीन से पांच साल या उससे अधिक समय तक पैसा फंसा सकें। यदि आप आईपीओ को त्वरित पैसा बनाने का एक विकल्प मान रहे हैं, तो आप गलत हैं।

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