महोदय, मैं एक बार फिर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की सीरिया संबंधी नीति के बचाव में खड़ा हुआ हूं। सीरिया मामले में गहरी संलग्नता के प्रति ओबामा की दुविधा सही थी। लेकिन उन्होंने कभी अमेरिकी जनता को अपनी दुविधा के कारणों के बारे में बताने का साहस नहीं किया। उन्होंने उन चीजों को अपने तक सीमित रखा, जिनके बारे में उनकी अंतरात्मा कहती थी कि वे कारगर नहीं होंगी। नतीजतन बुरा हुआ। नीतियों पर बयानबाजी भारी पड़ गई और नीतियां विफल हो गईं।
वहीं, ओबामा के रिपब्लिकन आलोचकों को अमेरिकी अनुभवों का ज्ञान नहीं है। वे सीरिया में बिना सोचे-विचारे पहले आक्रमण करने की नीति की वकालत करते हैं, यह मानकर कि उनका यह नजरिया इराक और लीबिया से कहीं अधिक कारगर साबित होगा। निजी तौर पर मैं उस नेता का पक्ष लेना चाहूंगा, जिनमें अपनी दुविधा अपने उन आलोचकों को बताने का साहस नहीं है, जिन्हें अपने अनुभवों का ज्ञान नहीं है। लेकिन दुविधा का मतलब यह नहीं है कि आप कुछ नहीं करें। हम चीजों को बदल सकते हैं, लेकिन यह केवल तभी होगा, जब हम अपने दुश्मनों और दोस्तों की सही ढंग से पहचान करेंगे। मसलन, अभी की प्रमुख खबर है कि रूस के चतुर राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन ने सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद के शासन को समर्थन देने और इस्लामिक स्टेट से लड़ने के लिए अपने कुछ सैनिकों, जहाजों एवं टैंकों की वहां तैनाती करके एक बार फिर दुविधाग्रस्त अमेरिकियों को मात दे दी है। कुछ लोग सोचते होंगे कि काश, हमारे पास भी इतना साहसी, सख्त और चालाक राष्ट्रपति होता!
क्या वाकई? आइए, इसके बारे में विचार करते हैं-मान लेते हैं कि अमेरिका ने कुछ नहीं किया और सिर्फ पुतिन ने आईएस के खिलाफ बमबारी करना और असद सरकार को सहारा देना शुरू किया है। सीरिया में सुन्नी मुसलमानों की एक बड़ी आबादी है। वे अरब जगत में बहुसंख्यक हैं। पुतिन और रूस एक ईरान समर्थक, अल्वाइट/शिया नरसंहार के युद्ध अपराधी असद की रक्षा करते देखे जाएंगे। पुतिन रूस के मुसलमानों समेत पूरे सुन्नी समुदायों को अलग-थलग कर देंगे। फिर भी, चलिए मान लेते हैं कि कुछ चमत्कार करके रूस इस्लामिक स्टेट को हरा देता है। लेकिन उन्हें हराने का एक ही उपाय है कि उनकी जगह नरमपंथी सुन्नियों को स्थान दिया जाए। लेकिन कौन नरमपंथी सुन्नी रूस के साथ सहयोग करना चाहेगा, जबकि पुतिन उस बशर अल असद के प्रमुख रक्षक के रूप में देखे जाते हैं, जिसने इस धरती पर किसी से भी ज्यादा सुन्नियों की बैरल बम के जरिये हत्या की है?
असल में पुतिन ने सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए सीरिया में जाने की मूर्खता की है, ताकि अपने देश के लोगों को दिखा सकें कि रूस अब भी विश्व शक्ति है। खैर, अब वह चने के झाड़ पर हैं। ओबामा और जॉन कैरी को एक महीने के लिए उन्हें और असद को अकेले इस्लामिक स्टेट के खिलाफ लड़ने के लिए छोड़ देना चाहिए और सुन्नी मुस्लिम जगत का सबसे बड़ा दुश्मन बनते हुए देखना चाहिए।
पुतिन इस झाड़ से तभी उतर सकते हैं, जब वह अमेरिका के साथ सीरिया में राजनीतिक समाधान विकसित करें। और यह तब होगा, जब असद का समर्थन कर रहे रूसी एवं ईरानी बल संक्रमण काल के बाद वहां से हट जाएं, बदले में विपक्ष के लिए बुनियादी सुरक्षा और असद के अल्वाइट समुदाय के हितों का ध्यान रखने पर सहमति बनाई जाए और दोनों पक्ष समझौते की गारंटी के लिए वहां एक अंतरराष्ट्रीय बल का स्वागत करें।
लेकिन इसके लिए अमेरिका को सीरिया में अपने हित देखने के साथ अपनी बयानबाजी को भी सीमित करने की जरूरत है। सीरिया में अमेरिकी हित या तो खत्म होने वाले हैं या उसके समक्ष दो बड़े खतरे हैं- पहला तो इस्लामिक स्टेट का विस्तार लेबनान, कुर्द और जॉर्डन जैसे शालीन द्वीपों के लिए खतरा पैदा कर सकता है, और दूसरा, सीरियाई शरणार्थियों की त्रासदी, जिनकी संख्या इतनी तेजी से बढ़ रही है कि लेबनान और जॉर्डन भारी संकट से जूझ रहे हैं। अगर यह जारी रहा, तो अमेरिका के सबसे महत्वपूर्ण भागीदार यूरोपीय संघ को अस्थिर कर सकता है। यदि अमेरिका सीरिया में शीघ्र ही बहुपंथी लोकतंत्र चाहता है, तो उसे वहां जाकर खुद ही माहौल बनाना होगा। यह धारणा पागलपन है कि इससे सीरिया के नरमपंथी लोग ज्यादा हथियारबद्ध होंगे।
पिछले हफ्ते न्यूयॉर्क टाइम्स में खबर छपी थी कि वर्ष 2011 से सौ से ज्यादा देशों के करीब 30 हजार विदेशी लड़ाके इराक और सीरिया गए हैं। यानी 30 हजार लोग इस्लामिक स्टेट में शामिल होने और जेहाद को बढ़ावा देने के लिए सीरिया गए हैं। लेकिन इनमें से कितने अरब और मुस्लिम सीरिया में बहुपंथी लोकतंत्र को बढ़ावा देने के लिए गए हैं? जाहिर है, एक भी नहीं। तो क्यों हमें किसी नरमपंथी की तलाश करके फिर उसे प्रशिक्षित करना चाहिए, जबकि जेहादियों को तो कोई प्रशिक्षण देने वाला नहीं है, फिर भी वे वहां जमा हो रहे हैं? यह इसलिए, क्योंकि जेहादी एक आदर्श की गिरफ्त में हैं, भले ही वह आदर्श विकृत हो। सीरियाई नरमपंथी किसी आदर्श की गिरफ्त में नहीं हैं, बल्कि वे अपने घरों और परिवारों के लिए लड़ रहे हैं। वे लोकतंत्र जैसे आदर्श के लिए नहीं लड़ते। हम उन्हें सैन्य प्रशिक्षण देकर तैयार तो कर सकते हैं, लेकिन वह कभी कामयाब नहीं होगा। सीरियाई विपक्ष में क्या कोई वास्तविक लोकतंत्रवादी है? आप शर्त लगा लीजिए, लेकिन अपने संगठन, प्रेरणा और विरोध की निर्ममता के साथ कोई भी पूरी तरह से लोकतंत्रवादी नहीं है।
हर कोई सीरिया में एक बेदाग हस्तक्षेप चाहता है, जहां वे कुछ करते तो दिखें, लेकिन उन्हें इसकी कोई राजनीतिक कीमत न चुकानी पड़े। लेकिन ऐसा कोई विकल्प नहीं है। मुझे लगता है कि सीरिया में पुतिन के हस्तक्षेप के कारण अंत में उन्हें ज्यादा समझौते की जरूरत होगी या कम से कम स्थायी संघर्ष विराम के लिए प्रेरित करेगा, जिससे शरणार्थियों का प्रवाह रुकेगा। यदि ऐसा हो सका, तो समझिए, अमेरिका ने बहुत कुछ कर लिया।