गौरतलब है कि नवंबर में शीर्ष अदालत ने पर्यावरण मंत्रालय की एक समिति की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए जो परिभाषा निर्धारित की थी, उसमें सौ मीटर से अधिक ऊंचाई वाली स्थलाकृतियों को ही अरावली का हिस्सा माना गया था। लेकिन यह चिंता जताई जा रही थी कि इससे अरावली का एक बड़ा हिस्सा संरक्षण से बाहर हो जाएगा और खनन तथा निर्माण गतिविधियों का खतरा बढ़ जाएगा। हालांकि, उस अदालती फैसले के विरोध के मद्देनजर, एक उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि राजस्थान 2006 से अरावली की इसी परिभाषा को मानकर चल रहा है।
दूसरी बात यह कि संपूर्ण पर्वत शृंखला में खनिजों की बेहद सीमित मात्रा को देखते हुए यह समझना चाहिए कि संकट सिर्फ वाणिज्यिक खनन ही नहीं, बल्कि उक्त क्षेत्र में हो रहा बेलगाम पर्यटन भी है। ऐसे में, अरावली को बचाने की किसी भी मुहिम में यह मुद्दा स्वाभाविक ही मजबूती से उठना चाहिए। यह नहीं भूलना चाहिए कि उत्तर भारत की जलवायु के संतुलन, थार रेगिस्तान के प्रसार पर रोक और राजस्थान के वनों को संरक्षित रखने में दो अरब वर्ष पुरानी अरावली पर्वत शृंखला का महत्वपूर्ण योगदान है। इसके अतिरिक्त, यह चंबल, साबरमती और लूणी जैसी नदियों का प्रमुख स्रोत तो है ही, इसके बारे में यह भी माना जाता है कि अगर यह पर्वत शृंखला न हो, तो पूरे उत्तर-पश्चिमी भारत को रेगिस्तान बनने में देर नहीं लगेगी।
पिछले कुछ दशकों में अवैध खनन, अतिक्रमण और वनों की कटाई से यह शृंखला निस्संदेह बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई है। शीर्ष अदालत ने अपने ही फैसले पर रोक लगाते हुए यह चिंता जताई है कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और अदालत की टिप्पणियों को गलत समझा जा रहा है। पर्यावरण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर फैसले लेते वक्त वैज्ञानिक तथ्यों, जन चिंताओं और दीर्घकालिक प्रभावों का संतुलन जरूरी है। सर्वोच्च न्यायालय का ताजा फैसला हमें एक बार फिर इसी संतुलन की याद दिलाता है।