किसी राष्ट्र के जीवन काल में 75 वर्ष कोई बहुत बड़ा कालखंड नहीं माना जाता, किंतु भविष्य की पीठिका को तैयार करने के लिहाज से यह बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसमें कानूनी ढांचे की दिशा तय होती है और उसे आत्मसात करने तथा उनके आदर्शों के मुताबिक आचरण करने की परंपरारा विकसित की जाती है। बीते 75 वर्षों में हमने अपने संविधान के आदर्शों की ओर मजबूती से कदम बढ़ाया है। हमारे साथ आजाद हुए करीब 50 देशों में लोकशाही वहां के जनजीवन में वह पैठ नहीं बना पाई, जिसे हमने कर दिखाया है। हमारे पड़ोसियों जैसे-पाकिस्तान, अफगानिस्तान, म्यांमार, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे किसी भी देश में लोकतंत्र कभी खुली हवा में सांस नहीं ले पाया। वे सैनिक तानाशाही के दबाव से कभी मुक्त नहीं रहे, जबकि हम पिछले 75 वर्षों में 18 बार आम चुनावों के माध्यम से केंद्र में सत्ता के शालीन हस्तांतरण के साक्षी रहे हैं। राज्यों में भी शताधिक बार लोकतांत्रिक तरीके से सरकारों का गठन हुआ है। हमने इस क्षेत्र में पूरे विश्व के लिए आदर्श प्रस्तुत किया है। इसमें विश्व में लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ऊंचे आदर्शों के नए मानक दिए हैं।
आजादी के बाद हमने अपनी संप्रभुता की नई संस्कृति विकसित की है। युद्ध, सूखा और महामारी का मजबूती से सामना किया। वर्ष 1971 के युद्ध में तो हमने न केवल विजय प्राप्त की, अपितु 97,000 सैनिकों को युद्ध बंदी भी बनाया। सूखे के शुरुआती झटकों से उबरकर अब हम दूसरे देशों को अन्न की मदद करने की आदत और परंपरा पर आगे बढ़ रहे हैं।
हमने अपने संविधान में समाज कल्याणकारी राष्ट्र की कल्पना की है और अंत्योदय का संकल्प लिया है। कोरोना महामारी में हमने इसे मूर्त रूप दिया। दुनिया के बड़े हिस्से में जब लोग दवाओं की कमी और भुखमरी से जूझ रहे थे, उस समय हमने असंभव को संभव कर दिखाया। पूरे यूरोप की आबादी करीब 79 करोड़ है। हमारे देश में 80 करोड़ लोगों को पूरी महामारी के दौरान निःशुल्क राशन मिला। इतना ही नहीं, कोरोना से बचाव के लिए टीकाकरण के मामले में हमने नए प्रतिमान स्थापित किए। करीब दो अरब टीके निःशुल्क लगाए गए और दुनिया के करीब 96 देशों को भी हमने मदद दी।
अपने संविधान की प्रस्तावना में हमने सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करने का संकल्प लिया है। नीति निर्देशक तत्वों में सरकारों से अपेक्षा की गई है कि सार्वजनिक पूंजी को कुछ लोगों के हाथों में संचित न होने दें। इसे लागू करने के मामले में भी हमने मिसाल कायम की है। आजादी के समय हमारे यहां जमींदारी प्रथा लागू थी, जिसमें ज्यादातर जमीन कुछ जमींदारों के पास थी। आजादी के पांच वर्षों के भीतर ही हमने कानून बनाकर पूरे देश में जमींदारी प्रथा को समाप्त कर दिया। यह ऐतिहासिक उपलब्धि थी। विश्व के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि कुछ मुट्ठी भर जमींदारों से जमीन लेकर उसे लाखों भूमिहीनों में बांट दिया गया। यह सब कुछ शांतिपूर्वक और बगैर एक कतरा खून बहाए संपन्न हुआ। दुनिया के इतिहास में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं है, जहां इतने व्यापक स्तर पर भूमि सुधार शांतिपूर्वक ढंग से संपन्न हुए हों। कम्युनिष्ट देश अपने लाखों नागरिकों का खून बहाकर भी भूमि सुधारों के क्षेत्र में जो हासिल करने में सफल नहीं हो सके, उसे हमने शांतिपूर्वक लागू कर दिया। आर्थिक और सामाजिक न्याय हासिल करने की दिशा में इन भूमि सुधारों का अतुलनीय योगदान रहा है।
बीते 75 वर्षों में हमने अपने संविधान और उसके उद्देश्यों को मूर्त रूप लेते हुए देखा है। उससे भविष्य के लिए एक मजबूत नींव तैयार हुई है, किंतु उसे पहले से भी बेहतर करने की जरूरत है। उसे आत्मसात करके उसके आदर्शों के अनुरूप आचरण करके ही हम उसे मजबूती दे सकते हैं। 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने अपने अंतिम भाषण में कहा था कि संविधान की सफलता उस देश के नागरिकों पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि यदि देश के लोग संविधान के मूल्यों के अनुरूप आचरण करते हैं, तो अनगढ़ भाषा में लिखा गया संविधान भी सफल रहेगा, अन्यथा वह कोरे शब्दों का संग्रह मात्र रह जाएगा। आने वाले समय में इसे पहले से भी अधिक सफल बनाने के लिए जरूरी है कि हम भारत के लोग अपने संविधान के मूल्यों के अनुरूप संविधानवाद की संस्कृति विकसित करें।