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किफायती नवोन्मेष की कहानी

पत्रलेखा चटर्जी Updated Thu, 22 Feb 2018 07:40 PM IST
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ओमेश भारती

वह कांग्रेस के सांसद और प्रतिष्ठित लेखक शशि थरूर थे, जिन्होंने एक बार कहा था कि यदि आप गूगल पर 'किफायती नवाचार' सर्च करें, तो पहले बीस नतीजे भारत से ही संबंधित होंगे। भारत स्वाभाविक रूप से किफायती नवाचार में अग्रणी है, जो कमियों के बावजूद लाभ उठाने की हमारी प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है। संसाधनों की दुर्लभता और संस्थागत अभाव से जूझते हुए भी किफायती नवोन्मेषक समस्याओं का नया मौलिक समाधान विकसित करते हैं। इससे चीजें सिर्फ किफायती ही नहीं होतीं, बल्कि बेहतर, अधिक उपयुक्त और उन्नत करने योग्य भी होती हैं।



इस संदर्भ में कई देसी उदाहरण ध्यान में आ रहे हैं। जरा मंगलयान मिशन के बारे में सोचिए। उसकी लागत नासा के नवीनतम मंगल कार्यक्रम की लागत का एक छोटा-सा हिस्सा है। इसके अलावा, आप सुप्रसिद्ध जयपुर फुट का उदाहरण ले सकते हैं। हालांकि एक कृत्रिम पैर क्रांतिकारी नहीं लगता, लेकिन कम लागत और उच्च क्रियाशीलता वाले जयपुर फुट एवं अंगों ने हजारों भारतीयों की जिंदगी बदल दी है और उन्हें  उनकी गतिशीलता और गरिमा लौटाई है। कृत्रिम अंगों के निर्माण और फिटिंग की प्रक्रिया को मानकीकृत कर जयपुर फुट ने कार्यक्षमता का त्याग किए बिना (कुछ मामलों में इसे बढ़ाया ही है) लागत कम की है।


इसी महीने प्रतिभाशाली भारतीय नवोन्मेषकों ने एक बार फिर अपने किफायती नवोन्मेष का प्रदर्शन किया, जब शिमला के एक सरकारी स्वास्थ्य संस्थान (दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल के इन्ट्रा डर्मल एंटी-रेबीज क्लिनिक ऐंड रिसर्च सेंटर) में महामारी विज्ञान पर काम करने वाले एक चिकित्सक अखबारों की सुर्खियां बने। 49 वर्षीय डॉ ओमेश भारती तब एक सितारे के रूप में चमके, जब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पागल कुत्ते के काटने से पीड़ित मरीज के इलाज के लिए उनके द्वारा विकसित  रेबीज के किफायती उपचार को मंजूरी दे दी। इससे रेबीज के इलाज की लागत मौजूदा 35,000 रुपये प्रति मरीज से घटकर महज 350 रुपये रह जाने की संभावना है।


विश्व स्वास्थ्य संगठन के पूर्व दिशा-निर्देश के अनुसार, एक कुत्ते या बंदर के काटे हुए मरीज को रेबीज इम्युनोग्लोबियस के साथ त्वचा में एक टीका लगाया जाता था, जिसमें घाव या मांसपेशी में सुई लगवाई जाती थी। रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन की गणना मरीज के शरीर के वजन के अनुसार की जाती थी, जिस कारण यह महंगा था। नई उपचार विधि में टीके का हिस्सा लगभग उतना ही रहता है, लेकिन रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन की सुई सिर्फ घाव में ही लगाई जाती है। रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन घावों में रेबीज वायरस को कुछ घंटों के भीतर बेअसर कर देता है। जैसा कि ज्यादातर लोग जानते हैं, रेबीज एक ऐसे वायरस के कारण होता है, जो कुत्तों, बंदरों के संक्रमित लार के माध्यम से मनुष्यों को संक्रमित करता है। लेकिन ज्यादातर लोगों की मृत्यु एक संक्रमित कुत्ते के काटने या उसके संपर्क में आने से होती है।


रेबीज का मुकाबला करने में एक महत्वपूर्ण समस्या इसके उपचार की ऊंची लागत है। दुनिया भर में रेबीज से संबंधित जितनी मौतें होती हैं, उसमें एक तिहाई हिस्सा भारत का होता है। डॉ. भारती और उनके सहयोगियों ने सफलतापूर्वक रेबीज का जो किफायती उपचार विकसित किया है, उसका परीक्षण पिछले पांच वर्षों में हिमाचल प्रदेश में कुत्तों एवं बंदरों के काटने से पीड़ित मरीजों पर किया गया है। इसकी सफलता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2017 में हिमाचल प्रदेश (जहां डॉ. भारती की उपचार प्रक्रिया का अनुसरण किया गया) में रेबीज के कारण मात्र दो लोगों की मौत हुई, जबकि इस दौरान पूरे देश में बीस हजार लोगों की मौत हुई।


जीवन रक्षक रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन की भारी कमी और उसकी ऊंची कीमत ने भारती को इस नवोन्मेष के लिए प्रेरित किया, जबकि कुत्तों एवं बंदरों के काटने से पीड़ित हुए मरीज मुख्यतः गरीब थे। इस नवोन्मेष की दिशा में काम कुछ वर्ष पहले शुरू हुआ था। डॉ. भारती ने पूरे हिमाचल प्रदेश के सरकारी रेबीज क्लिनिक में काम करने वाले स्थानीय चिकित्सा पेशेवरों को प्रशिक्षित किया।


किसी भी पैमाने से देखें, तो भारती की उपलब्धि किफायती नवाचार का एक चमकीला उदाहरण है। अब जब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने उनके उपचार को मंजूरी दे दी है, तब क्या पूरे देश और दुनिया के सभी विकासशील देशों के मरीज यह उपचार हासिल कर पाएंगे? क्या भारत में सरकारी अस्पतालों और प्रयोगशालाओं में काम करने वाले वैज्ञानिकों और चिकित्सकों को इससे प्रोत्साहन मिलेगा? यह देखा जाना बाकी है, और यह भारत के किफायती नवोन्मेष के विरोधाभासों पर निर्भर है। अन्य कई चीजों की तरह हम इस विषय पर भी काफी बातें करते हैं। लेकिन किफायती नवाचार का लाभ अक्सर उन तमाम लोगों तक नहीं पहुंच पाता, जिन्हें इसकी जरूरत होती है। जड़ता, उदासीनता, संकीर्ण ईर्ष्या इसकी वजहें हैं।
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हिमाचल प्रदेश की सरकार ने हालांकि डॉ. भारती का काफी सहयोग किया है और उनके नवोन्मेष को वैश्विक मान्यता मिली है, लेकिन यह लेख लिखे जाने तक, देश का अन्य कोई भी राज्य रेबीज के इस किफायती इलाज को अपनाने के लिए आगे नहीं आया है। निश्चित रूप से यह रवैया बदलना चाहिए।


देश भर में ऐसे बहुत से लोग है, जो इस नवाचार से लाभ उठा सकते हैं। इसे और उन्नत किए जाने तथा अन्य विकासशील देशों में प्रोन्नत किए जाने की जरूरत है। हमारे देश में सैकड़ों ऐसे नवोन्मेषक हैं, जो लंबे समय से नवाचार का काम कर रहे हैं, उन्हें प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है। तभी किफायती नवोन्मेष की कहानी आगे बढ़ेगी। 

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