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ब्याज दर घटाने के जोखिम

अश्विनी महाजन Updated Thu, 22 Feb 2018 07:36 PM IST
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अश्विनी महाजन

रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति कमेटी ने इस महीने रेपो और रिवर्स रेपो को यथावत यानी क्रमश: छह और 5.75 प्रतिशत पर बरकरार रखने का जो फैसला लिया, आर्थिक विश्लेषक अगर उसे सही ठहरा रहे हैं, तो उसकी वजह है। जबकि पहले यह कहा जा रहा था कि शायद रेपो रेट में बढ़ोतरी की जा सकती है।



रेपो रेट वह ब्याज दर होती है, जिस पर वाणिज्यिक बैंक रिजर्व बैंक से कर्ज लेते हैं। इसके विपरीत रिवर्स रेपो रेट, वह ब्याज दर होती है, जो रिवर्ज बैंक में बैंकों द्वारा जमा राशि पर मिलती है। यानी यदि रेपो रेट बढ़ती है, तो उधार लेने वालों की भी लागत बढ़ती है। इसलिए उद्योगों और व्यवसायियों की हमेशा यही इच्छा होती है कि रेपो रेट कम हो जाए, ताकि उन्हें सस्ती दर पर कर्ज प्राप्त हो सके। रेपो रेट कम होने पर लोगों को भी लाभ होता है, क्योंकि उनके उधारों पर भी ब्याज लागत कम हो जाती है और ईएमआई घटती है। ब्याज दर घटने से केवल व्यवसाय ही नहीं बढ़ता, बल्कि इन्फ्रास्ट्रक्चर का भी विकास होता है।


हमारे यहां महंगाई की दर लंबे समय से नीची बनी हुई थी, लेकिन विगत दिसंबर में वह बढ़कर 5.2 प्रतिशत हो गई थी। लेकिन रेपो रेट न घटाने का सिर्फ यही कारण नहीं था। जीएसटी लागू होने के प्रारंभिक कुछ महीनों में रेपो रेट नहीं बढ़ाए गए। शुरू में तो इस मोर्चे पर प्राप्तियां ठीक रहीं, पर बाद में कई उत्पादों पर जीएसटी घटने से प्राप्तियां कम हो गईं। करों की प्राप्ति बाधित होने से राजकोषीय घाटा बढ़ गया है। इस कारण सरकार को बाजार से उधार उठाना पड़ा, जिसके चलते बाजार में सरकार को बांड जारी करने पड़े, जिसके कारण बांडों पर प्राप्ति की दर पूर्व में 6.9 फीसदी से बढ़कर 7.5 फीसदी से अधिक हो चुकी है। विश्व बाजार में तेल की कीमत बढ़ने से भी महंगाई की दर और बढ़ने का खतरा बना हुआ है। इसके अलावा अमेरिका के फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दर बढ़ाने के कारण भारत पर भी ब्याज दर बढ़ाने का दबाव है, ताकि डॉलरों का संभावित बर्हिगमन रोका जा सके।


मौद्रिक नीति कमेटी के मुताबिक, महंगाई दर पिछले छह महीने से लगातार बढ़ रही है। कुछ खाद्य पदार्थों में ही नहीं, औद्योगिक उत्पादों में भी महंगाई बढ़ रही है। आयात की वृद्धि दर निर्यात से ज्यादा होने के कारण व्यापार घाटा बढ़ने से चिंता बढ़ रही है। इसके बावजूद विकसित देशों में बेहतर वृद्धि और आर्थिक परिदृश्य में सुधार के मद्देनजर भारत में सकल मूल्य संवृद्धि ( ग्रॉस वैल्यू ऐडेड) की ग्रोथ बढ़कर 7.2 प्रतिशत हो सकती है। कमेटी का मानना है कि वैश्विक परिदृश्य सुधरने से निर्यात में भी वृद्धि बढ़ सकती है। लगातार गिरावट से उबरते हुए औद्योगिक उत्पादन विगत नवंबर से बढ़ना शुरू हो चुका है। सेवा क्षेत्र में भी सुधार दिखाई दे रहा है।


ब्याज दर में कटौती की उद्योग घरानों की मांग मौद्रिक नीति समिति ने भले न पूरी की हो, पर जीएसटी की मार झेलते हुए लघु क्षेत्र को कुछ फायदा पहुंचाने की कोशिश उसने की है। गौरतलब है कि लघु उद्यमों को उधार न केवल मुश्किल से मिलता है, बल्कि उसे ज्यादा ब्याज भी देना पड़ता है। पर अब लघु क्षेत्र से बेस रेट के बजाय एमसीएलआर यानी उधार की सीमांत लागत के आधार पर ब्याज लिया जाएगा। इससे लघु उद्यमों पर ब्याज की लागत कम हो जाएगी। जाहिर है, मौद्रिक नीति समिति के फैसलों में एक किस्म की सुसंगति दिखती है।

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