फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बैडमिंटन शटल की कहानी

Fri, 19 Aug 2016 08:22 PM IST
केन बेल्सन
विज्ञापन
केन बेल्सन
विज्ञापन
पुर्तगाली कॉर्क की खूंटी पर लगे बतख के सोलह पंखों से बनी और हवा में 300 मील प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भरती बैडमिंटन शटलकॉक (चिड़िया) सबसे अधिक कौतूहल पैदा करने वाले स्पोर्ट्स के साजो-सामान में से एक है। शटलकॉक को ही संक्षेप में शटल कहते हैं। इसका वजन कुछेक ग्राम होता है, पर यह इतनी टिकाऊ होती है कि खिलाड़ियों के तेज प्रहार के बावजूद इसका आकार जस का तस बना रहता है। शौकिया या कम अनुभवी खिलाड़ियों के निरंतर प्रहार को झेलने के लिए प्लास्टिक शटल डिजाइन की गई है। दुनिया भर में प्रायः इसी शटल का उपयोग होता है, जो अपेक्षाकृत भारी होती है। दूसरी ओर पेशवेर शटल में बेहतरीन कारीगरी की जरूरत होती है। यही शटल ओलंपिक में उपयोग होती है।
विज्ञापन


रियो ओलंपिक में बैडमिंटन की ज्यादातर सामग्री मुहैया कराने वाली जापानी कंपनी योनेक्स ने टोक्यो स्थित अपनी फैक्टरी से करीब पंद्रह हजार एफ-90 शटल ब्राजील भेजी हैं। स्टैंड में बैठे प्रशंसकों या फिर टीवी के दर्शकों को इन शटल्स के बारे में बहुत पता नहीं होगा। मगर, योनेक्स ने स्लो अथवा फास्ट समेत चार ग्रेड्स की शटल तैयार की है। इनका उपयोग 40 फीट ऊंचे बैडमिंटन वेन्यू की परिस्थितियों के मुताबिक किया जाता है, जो बक्सानुमा कन्वेंशन स्‍थल जैसा होता है। शटल के वजन में बेहद थोड़ा-सा अंतर होता है। हल्की शटल हवा में लड़खड़ाहट के कारण धीमी गति से उड़ती है। यहीं पर बैडमिंटन में विज्ञान की झलक दिखाई पड़ती है। प्रतियोगिता में तापमान और आर्दता को देखते हुए शटल का चयन किया जाता है, ताकि वातावरण के साथ तालमेल बिठाया जा सके। हवा का दबाव ज्यादा होता है, तो शटल धीरे उड़ती है। ऐसी परिस्थितियों में टूर्नामेंट के अधिकारी तेज उड़ने वाली भारी शटल को तरजीह देते हैं। इसी तरह, हवा का दबाव कम होने पर धीमी गति से उड़ने वाली हल्की शटल को चुना जाता है।

रियो में कैसी शटल उपयोग होगी, इसका निर्धारण करने के लिए टूर्नामेंट रेफरी और योनेक्स के प्रतिनिधि हर दिन पहला मैच शुरू होने से पहले सेंटर कोर्ट में जाकर वहां का मुआयना करते हैं। हाल में एक सुबह बैडमिंटन कोर्ट बिल्डिंग में खिलाड़ी और उनके प्रशंसक उपस्थिति दर्ज करा चुके थे। इस बीच योनेक्स के प्रतिनिधि बोरिस रिशेल हाथ में नंबर-2 और नंबर-3 की तीन-तीन शटल लेकर सर्विस लाइन पर पहुंचे। वह इन शटल्स को दूसरी ओर सिंगल्स लाइन की ओर हल्के से हिट करते हैं। शटल्स कुछ इंच पहले गिर जाती हैं। फिर वह कोर्ट के दूसरी ओर जाकर शटल्स को वापस उसी ओर हिट करते हैं। इस बार शटल्स लाइन के बेहद करीब जाकर गिरती हैं। रिशेल अनुमान लगा लेते हैं कि इस बार शटल ज्यादा दूरी पर इसलिए गिर रही थीं, क्योंकि उस ओर बिल्डिंग के खुले दरवाजों से हवा का झोंका आ रहा था। टूर्नामेंट रेफरी भी इससे सहमत थे। इसी आधार पर उस दिन तेज गति से उड़ने वाली नंबर-3 शटल उपयोग करने का निर्णय किया गया। ओलंपिक में डिप्टी बैडमिंटन रेफरी रॉनी डे वॉस के मुताबिक 'यह सुनिश्चित करना बेहद जरूरी होता है कि खिलाड़ी बेहतरीन परिस्थितियों में खेल रहे हैं, अन्यथा उनका ध्यान खेल के बजाय शटल पर ही लगा रहता है।' करीब 25 वर्षों से बैडमिंटन से जुडे़ डे वॉस के अनुसार, 'दिखने में सभी तरह की शटल एक जैसी लगती हैं। कोई माहिर खिलाड़ी ही हिट करने के बाद उनमें अंतर बता सकता है। शटल की ट्यूब में एक दर्जन शटल्स होती हैं और ट्यूब पर एक नंबर अंकित होने के अलावा ऐसा कोई संकेत नहीं होता जिससे पता चले कि कोई शटल स्लोअर है, या फिर फास्टर।'
विज्ञापन


ट्यूब्स जिस पर रखी जाती हैं, उसे शटल कंट्रोल कहते हैं। बैडमिंटन कोर्ट के किनारे पर रखे शटल कंट्रोल पर गत्ते के बॉक्स में रखी शटल्स की निगरानी एक वालंटियर करता है। खिलाड़ियों को अगर शटल में जरा भी खोट नजर आती है, तो वे बता सकते हैं, क्योंकि ऐसी शटल को नियंत्रित करना कठिन होता है। बेसबॉल में पिचर (बेसबॉल फेंकने वाला) जिस तरह अंपायर से नई बेसबॉल के लिए संकेत करता है, उसी तरह बैडमिंटन खिलाड़ी भी नई शटल की मांग कर सकता है। हालांकि इसके लिए प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी और अंपायर की सहमति जरूरी है। ओलंपिक के एक मैच में औसतन दो दर्जन शटल उपयोग होती हैं। रिशेल की मानें, तो नब्बे प्रतिशत मामलों में खिलाड़ी नई शटल की मांग खुद को शारीरिक एवं मानसिक तौर पर संतुलित रखने या प्रतिद्वंद्वी की लय तोड़ने के लिए करते हैं।

बैडमिंटन शटल अपने आप में एक पेचीदा अविष्कार है। योनेक्स कंपनी हर साल चीन से हजारों की संख्या में बतख के पंख मंगाती है। इन पंखों की लचक समेत दूसरे पहलुओं को ध्यान में रखकर उनकी काट-छांट की जाती है और सही आकार तथा रंग दिया जाता है। टूर्नामेंट में उपयोग होने वाली शटल बनाने के लिए खासतौर पर बतख के बाईं ओर के डैनों के पंखों का उपयोग होता है। योनेक्स के प्रसार प्रबंधक सतोशी युजा वायु-गति-विज्ञान के जरिये इसे समझाते हैं-बतख के बाईं ओर के पंखों के आकार और उनकी गोलाई के कारण शटल आसानी से स्पिन करती है और उसकी उड़ान में निरंतरता भी बनी रहती है। निचले स्तर की शटल बतख के अन्य पंखों से बनाई जाती हैं। शटल के कोन बनाने के लिए कंपनी विशेष रूप से बनाए गए कॉर्क पुर्तगाल से मंगाती है। शटल में उपयोग होने वाले 16 पंखों को तराशने के बाद उन्हें हाथों से कॉर्क में लगाया जाता है। कॉर्क में लग चुके पंखों को एक मशीन की मदद से बांध दिया जाता है। इसके बाद कॉर्क को सफेद टिकाऊ कवर से सील कर दिया जाता है। दो या तीन विशेषज्ञ सिर्फ इसी की निगरानी करते हैं कि शटल की हवा में गति कैसी है और इसी आधार पर बेहतरीन शटल्स की छंटाई की जाती है। युजा से जब पूछा गया कि चीन में अगर बाएं पंखों के बिना बहुत-सी बतखें दिखने लगें, तो क्या होगा? जवाब में वह कहते हैं, 'चीन के लोग बतख का मांस चाव से खाते हैं, इसलिए कुछ भी बर्बाद होने वाला नहीं है।'
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें