स्त्रियों को लेकर पिछड़ी मानसिकता वाले समाज की स्वाभाविक प्रतिक्रिया यह होती है कि जब वह स्त्री को किसी और तरीके से दमित नहीं कर पाता है, तो उसके चरित्र को लांछित करने का घृणित प्रयास करता है। अब तो सोशल मीडिया के जरिये किसी स्त्री का पीछा करने, उसे अश्लील प्रस्ताव भेजने और यदि वह न माने, तो उस पर भद्दी टिप्पणी करने जैसी हरकतें भी आम हो गई हैं। इन तरीकों के सहारे वे प्रेम-प्रस्ताव ठुकराने या किसी अन्य अपमान का बदला लेते हैं या खुद को स्त्री से ऊपर साबित करने का विफल प्रयास करते हैं। लेकिन ज्यादा चिंताजनक स्थिति यह है कि ऐसी स्थितियों में एक आम लड़की या स्त्री सामाजिक अपमान के भय से मुंह सिलकर बैठ जाती है। कभी-कभी तो ऐसी प्रताड़ना के कारण बात आत्महत्या तक पहुंच जाती है।
आम समाज में लड़कियों को शोहदों से निपटने का यही तरीका तो अब तक सिखाया गया है कि कोई रास्ते में छेड़े, तो सिर नीचे करके चुपचाप वहां से निकल जाओ। गंदी टिप्पणी करे, तो ऐसे रिएक्ट करो, मानो कुछ सुना ही न हो। नसीहत दी जाती है कि आप किस-किससे उलझोगे, और ज्यादा भिड़ोगे, तो कुछ गंदगी आपके अपने दामन पर भी पड़ेगी। लेकिन थैंक्स शर्मिष्ठा मुखर्जी, कि आपने वह किया, जो शायद हम जैसी आम महिलाएं-लड़कियां नहीं कर पाती हैं। आपने फेसबुक पर अश्लील संदेश भेजने वाले पार्थ मंडल को न सिर्फ सोशल मीडिया के जरिये ही सबक सिखाने की मुहिम शुरू की, बल्कि उसके खिलाफ दिल्ली पुलिस में शिकायत भी दर्ज करवाई। दुआ करें कि आप जैसी हिम्मत हम आम औरतें-लड़कियां भी दिखा पाएंगी।
अगर हम देश को इस कसौटी पर कसें कि आज खुद को कई मायने में आधुनिक कहने वाली लड़कियां शर्मिष्ठा जैसी हिम्मत दिखाने के मामले में कितनी आगे हैं, तो सच में काफी निराशा होगी। हालांकि देश के नए सूचना व प्रौद्योगिकी कानून में ऐसे कृत्यों के लिए धर-पकड़ और सजा का प्रावधान है, पर हालात देखकर नहीं लगता कि अपराधी मानसिकता के ऐसे लोगों को सबक सिखाने की हिम्मत आम स्त्रियों में आ पाई है। सोशल मीडिया के जरिये महिलाओं से बदला लेने की यह कोशिश दो तरीकों से समाज का नुकसान कर रही है। इससे एक ओर लक्षित महिला का सार्वजनिक जीवन तबाह होता है, तो इसका असर उन बच्चों पर भी पड़ता है, जो इंटरनेट पर पहुंच रखते हैं, पर वहां क्या देखना है और क्या नहीं- यह तय नहीं कर पाते हैं।
इंटरनेट पर किसी भी खोज के परिणाम में मिलने वाली सामग्री में आधे से ज्यादा अश्लील होती है अथवा वह अश्लील सामग्री वाली वेबसाइटों की तरफ ले जाती है। अश्लीलता का यह प्रचार-प्रसार ही कुछ बिगड़ैल किस्म के नौजवानों को लड़कियों-स्त्रियों का सोशल मीडिया पर पीछा करने (ट्रोलिंग) के लिए उकसावे का काम करता है। अभी हमारे देश का कानून सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग को महिलाओं के खिलाफ हिंसा नहीं मानता, जिस कारण अपराधी मानसिकता के ऐसे लोग बच जाते हैं। अच्छा है कि महिला और बाल विकास मंत्रालय को इसकी चिंता है और उसने ‘नेशनल पॉलिसी फॉर वुमैन-2016’ में मोबाइल-इंटरनेट के जरिये महिलाओं के शोषण को अपराध और यौन हिंसा की श्रेणी में रखने का प्रस्ताव किया है। वक्त आ गया है कि अब सोशल मीडिया पर हो रही ट्रोलिंग के खिलाफ भी सख्त कानून बने और लड़कियों-महिलाओं में शर्मिष्ठा मुखर्जी जैसी हिम्मत जगे।