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एकता का तमाशा

तवलीन सिंह Updated Sun, 27 May 2018 07:07 PM IST
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तवलीन सिंह
पिछले सप्ताह कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में हमने महागठबंधन की महाशक्ति देखी या सिर्फ़ विपक्ष का तमाशा? सोनिया गांधी इतने प्यार से गले मिलीं मायावती से, जैसे बिछड़ी बहनें मिल रही हों। राहुल गांधी सबसे गले मिले और उनके चेहरे पर एक विजेता की मुस्कराहट चिपकी रही। मंच पर दिखे देश के तकरीबन हर राज्य से आए विपक्ष के महारथी। शरद पवार, चंद्रबाबू नायडु, सीताराम येचुरी, शरद यादव, अरविंद केजरीवाल, अजित सिंह, तेजस्वी यादव।


नाटकीय अंदाज में एक दूसरे के हाथ पकड़े सबने और ऊपर उठाए, जैसे चुनाव जीतने के बाद राजनेता करते हैं। सो ऐसा लगा, जैसे नरेंद्र मोदी हार भी चुके हैं और इस महगठबंधन की सरकार बन भी चुकी है लेकिन ऐसा अभी तक न हुआ है और न ही तय है कि ऐसा होनेवाला है 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद।


ऐसा इसलिए कि स्पष्ट बिल्कुल नहीं है कि लोकसभा चुनाव घोषित होने के बाद पश्चिम बंगाल में येचुरी साहब और ममता दी के बीच दोस्ती होगी या युद्ध। उत्तर प्रदेश में अभी तक तो बुआ-भतीजे के बीच खूब मोहब्बत दिख रही है, लेकिन क्या चुनावी रणभूमि में भी ऐसा होगा? क्या महाराष्ट्र में पवार साहब कांग्रेस का जूनियर पार्टनर बनने को तैयार होंगे? दूर की बातें छोड़कर अगर वर्तमान में ही आ जाएं, तो यह भी तय नहीं है कि कर्नाटक में कांग्रेस का समर्थन एचडी कुमारस्वामी के साथ कब तक रहेगा। सो फिलहाल यह कहना ही पड़ेगा कि तमाशा हुआ बंगलूरू में पिछले सप्ताह, विपक्ष की एकता का सुबूत नहीं दिखा।


सवाल लेकिन जरूर उठता है कि इतनी दोस्ती किसलिए पैदा हो गई है इन पुराने दुश्मनों के बीच। इस सवाल पर थोड़ा ध्यान देने का कष्ट करें, तो पाएंगे कि विपक्ष में यह नया उत्साह पैदा हुआ है गोरखपुर और फूलपुर में भाजपा को हराने के बाद। इन दोनों चुनावों का खूब विश्लेषण करने के बाद राजनीतिक पंडित और राजनेता इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि समय की आवश्यकता है विपक्ष में पक्की दोस्ती कायम करना। सबका मानना है कि बुआ और भतीजे ने अलग रहकर इन दोनों अति-महत्वपूर्ण चुनाव क्षेत्रों में चुनाव लड़ा होता, तो भाजपा को किसी हाल में हरा नहीं पाते। चलिए, अच्छी बात है कि विपक्षी दलों में एकता की यह भावना पैदा होने लग गई है, लेकिन क्या इससे देश का भी भला होने वाला है?


विपक्ष के महारथियों की बातों से अभी तक सिर्फ यह स्पष्ट हुआ है कि वे सेक्यूलरिज्म को बचाने के लिए इकट्ठा होने पर मजबूर हुए हैं। उनका कहना है कि मोदी के राज में इतनी हिंसा और नफरत फैलाई गई है कि देश फिर से टूट सकता है। इसके अलावा इनका यह भी कहना है कि मोदी ने अपना कोई भी वायदा पूरा नहीं किया है, सो उनको हटाए बिना देश में न विकास होगा, न प्रगति। ऐसा अगर सही न भी हो, तो सही जरूर है कि इस तरह की बातें जगह-जगह होने लग गई हैं।


यह लेख लिखने से पहले मैं ग्रामीण मध्य प्रदेश का दौरा करके आई हूं, जहां लोगों से बातें करके मालूम यह हुआ मुझे कि मोदी लोकप्रिय अब भी हैं, लेकिन यह लोकप्रियता करीब 30 फीसदी कम हो गई है। विदिशा के एक नागरिक के शब्दों में, ‘अब वह बात नहीं है जी जो 2014 में थी, क्योंकि जिस परिवर्तन और विकास की हमें उम्मीद थी, वह अभी तक दिखा नहीं है।’ सो पिछले सप्ताह उस शपथ ग्रहण समारोह में अगर सिर्फ महागठबंधन का तमाशा ही था, तो भी प्रधानमंत्री निवास में खतरे की घंटी बज जानी चाहिए। इसलिए कि कुछ कुछ होने तो लग गया है।
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