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ताकि पटरी पर लौटे अर्थव्यवस्था, थोड़ी देर लगेगी

बादल मुखर्जी Published by: बादल मुखर्जी Updated Mon, 26 Aug 2019 01:33 AM IST
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कार - फोटो : a

अर्थव्यवस्था की बदहाली को ध्यान में रखते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को आखिरकार कई फैसले करने पड़े, जिससे तस्वीर बदलने की उम्मीद की जा रही है। शॉर्ट और लांग टर्म केपिटेल गेन टैक्स पर बढ़ाया गया अधिभार वापस लेने, स्टार्ट अप कंपनियों के एंजेल टैक्स को खत्म करने, विदेशी संस्थागत निवेशकों पर लगाए गए दस फीसदी अतिरिक्त अधिकार को वापस लेने तथा कॉरपोरेट सोशल रेस्पांसिबिलिटी के उल्लंघन पर आपराधिक मामला चलाने जैसे कठोर फैसले को वापस लेने आदि, कदम से साफ है कि सरकार कारोबारियों और निवेशकों के बीच बने प्रतिकूल संदेश को खत्म करना चाहती है, ताकि अर्थव्यवस्था को गति मिले। इसमें शक नहीं कि इससे बाजार में कमोबेश भरोसा लौटेगा। हालांकि अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्र से जो संकेत मिल रहे हैं, वे बताते हैं कि इसे पटरी पर लाने में समय लगेगा।



दरअसल पिछले कुछ समय से विभिन्न क्षेत्रों से अंतर्विरोध भरे आर्थिक चिह्नों का मिला-जुला रूप दिखाई दे रहा था, जो देश में व्याप्त अनिश्चय के बारे में बताता था। करों का ही मामला लीजिए। बजट प्रावधानों में बताया गया कि सुपर रिच यानी समृद्धि के सबसे ऊपरी पायदान पर बैठे लोगों को कर और अधिभार मिलाकर लगभग 45 प्रतिशत टैक्स देना होगा। जल्दी ही कॉरपोरेट टैक्स को घटाकर 25 प्रतिशत करने की मांग की जाने लगी, और ऐसा कहा गया कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इस पर विचार कर रही हैं। शायद उन्हें याद न हो कि देश में काला धन पैदा होना कैसे शुरू हुआ था।


दरअसल देश में समानता लाने के लिए इंदिरा गांधी की सरकार में वित्त मंत्री रहे मोरारजी देसाई ने, जिनके नाम सबसे अधिक बार बजट पेश करने का रिकॉर्ड है, कभी कॉरपोरेट टैक्स की उच्च सीमा 90 फीसदी कर दी थी। सबसे समृद्ध लोगों ने तरीका यह सोचा कि अगर वे खुद को इस भारी कर के बोझ से बचाने के लिए एक एकाउंटेंट को 50 रुपये देते हैं, तो भी उन्हें 40 रुपये का फायदा होगा। यानी टैक्स की ऊंची दर अर्थव्यवस्था को फायदा के बजाय नुकसान ही पहुंचाती है, क्योंकि व्यापारी इससे बचने का रास्ता निकाल लेते हैं। यानी ऊंची दर से फायदा तो कुछ होता नहीं, उल्टे काले धन का सृजन होता है।


दरअसल अर्थव्यवस्था की बदहाल स्थिति पर अंदर से ही चिंता जताई जाने लगी थी। नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने अर्थव्यवस्था पर अपनी बहुचर्चित टिप्पणी पर अब सफाई दी है, लेकिन कहा तो यह भी जा रहा है कि उनकी टिप्पणी के बाद ही सरकार हरकत में आई और वित्त मंत्री को कई कदम उठाने पड़े। उसी दौरान सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा कि केवल मौद्रिक उपायों से मंदी को नहीं रोका जा सकेगा। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि आखिर किन उपायों से मंदी को रोका जा सकता है। रिजर्व बैंक रेपो दर में लगातार कटौती कर रहा है। इसके बावजूद बैंकों से कर्ज का उठाव नहीं बढ़ रहा। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए, क्योंकि अगर निवेशक कारोबारी संभावनाओं के बारे में आश्वस्त नहीं होंगे, तो वे कर्ज नहीं लेंगे। ऐसे में, जाहिर है कि मंदी दूर करने के लिए किए गए मौद्रिक उपाय कारगर नहीं होंगे।लेकिन अगर नीतिगत गड़बड़ी से वित्तीय नीति दिशा न दे पाए, तो सरकार धन कहां से लाएगी?


दिवंगत अरुण जेटली ने वित्त मंत्री रहते हुए इस दिशा में बहुत कोशिश की।  सर्वाधिक लाभ में चलने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी ओएनजीसी को दिवालिया हो चुकी कुछ सरकारी कंपनियों के 35,000 करोड़ रुपये के शेयर खरीदने पड़े, और इस प्रक्रिया में खुद ओएनजीसी दिवालिया हो गई! विनिवेश में विफलता के बाद रिजर्व बैंक के संचित कोष पर ध्यान गया। उसके संचित कोष को सीधे-सीधे सरकार को देने की बात कही जाने लगी। दरअसल यह कोष सरकार की कल्याणकारी योजनाओं तथा कृषि सब्सिडी में मदद करने के साथ-साथ वित्तीय घाटे को भी कम कर सकता था। अगर विमल जालान कमेटी इस मामले में सरकार की मदद करती है, तो विमल जालान इतिहास में याद रखे जाएंगे।


लेकिन बैंकों के बारे में इससे आगे जाकर सोचने की आवश्यकता है। हंगरी के महान अर्थशास्त्री जैनोस कोर्नाई ने करीब पचास साल पहले उस तथ्य का बेहद सुस्पष्ट विश्लेषण किया था, जिसके कारण सभी समाजवादी अर्थव्यवस्थाएं बीमार हुईं। उसे उन्होंनें 'सॉफ्ट बजट कॉन्स्ट्रेंट सिंड्रोम' कहा था। इसके लक्षण के बारे में बताते हुए कोर्नाई ने कहा था कि समाजवादी अर्थव्यवस्था उत्पादकों और बैंकरों को नुकसान में चलने का आत्मविश्वास प्रदान करती है, क्योंकि वे बखूबी जानते हैं कि सरकार घाटे में चलने वाली सार्वजनिक कंपनियों और बैंकों को घाटे से उबारने का हरसंभव प्रयास करेगी।


राजनीति में यह संभव है कि सरकार द्वारा तय कर लिए गए लक्ष्यों का जनता समर्थन करे, भले ही दीर्घावधि में इससे मुश्किलें हों, लेकिन जहां तक आर्थिक नीतियों का सवाल है, तो खासकर छोटी अवधि में मिले-जुले लक्ष्य ज्यादातर विफल साबित होते हैं। इसीलिए करों और ब्याज दरों आदि के मामले में हमारे यहां फिलहाल एक किस्म की अनिश्चितता हावी है, और वित्त मंत्री, मुख्य आर्थिक सलाहकार, नीति आयोग तथा रिजर्व बैंक चार अलग-अलग दिशाओं में देख रहे हैं।
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यहां यह तथ्य गौर करने लायक है कि बजट पारित करने के कुछ सप्ताहों के बाद अगर उसके अनेक महत्वपूर्ण प्रस्तावों को वापस ले लिया जाए, तो बजट का महत्व कम हो जाता है। इसके अतिरिक्त बैंकिंग क्षेत्र से जुड़ी दुविधा भी बरकरार है। बैंकों का 'पुनर्पूंजीकरण' दरअसल उस सॉफ्ट बजट कॉन्स्ट्रेंट का ही दूसरा रूप है, जिसका जिक्र पहले किया गया है। आने वाले दिनों में शायद घाटे में चलने वाली सार्वजनिक इकाइयों का पुनर्पूंजीकरण हो, जिसकी शुरुआत एयर इंडिया से हो सकती है। लेकिन इसके लिए पैसा कहां से आएगा? मेरा मानना है कि संभवतः विमल जालान कमेटी की रिपोर्ट इस दिशा में सरकार की मदद करेगी।


-लेखक दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स के पूर्व प्राध्यापक रहे हैं।

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