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इतिहास को संवेदनशील होकर देखें

Sun, 01 Jun 2014 12:51 AM IST
श्याम बेनेगल
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अगर आप चाहें, तो इतिहास में नियति की भूमिका देख सकते हैं। विगत 26 जून को पंडित जवाहर लाल नेहरू की 50 वीं पुण्यतिथि थी और उसी दिन नरेंद्र मोदी की सरकार ने देश में काम संभाला। आजाद भारत के इतिहास में नेहरू, इंदिरा और राजीव के बाद यह केवल चौथी सरकार है, जिसके सामने किसी तरह से बहुमत की चुनौती नहीं है। नई सरकार के पास इतनी ताकत है कि वह अकेले दम पर अपने आदर्शों के अनुसार पुरानी नीतियों को बदल सकती है, नई नीतियां बना सकती है।
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उनके सामने राजकाज की पुरानी परिपाटियों को मानने की बाध्यता नहीं है। अभी तक देश में राजकाज की नीतियों पर किसी न किसी प्रकार से नेहरू के आदर्शों का प्रभाव था। नई सरकार के कामकाज में नेहरू के प्रभाव कितने बरकरार रह पाते हैं, यह देखने के लिए हमें थोड़ा इंतजार करना होगा। नेहरू के विचारों और कार्यप्रणाली ने पूरे देश को एक इकाई में जोड़कर रखा था। उनके विचारों के प्रभाव में हमने अपनी धर्मनिरपेक्षता की जो व्याख्या की थी, उसमें धर्म हमारी मुख्य पहचान नहीं था।

यहां पर भाजपा के आदर्श कुछ भिन्न दिखाई पड़ते हैं। उसने कुछ साल पहले हिंदुत्व का एक विचार रखा था, जिसमें कहा था कि जो हिंदुस्तान में रहता है, उसकी पहचान हिंदू के रूप में है। हिंदू हमारी सांस्कृतिक पहचान है। लेकिन उनके इस विचार को देश में अल्पसंख्यकों के बड़े तबके ने मानने से इन्कार कर दिया। उन्हें डर था कि इसे स्वीकारने से उनकी निजी पहचान खत्म हो जाएगी। कुछ हद तक उनके भीतर आज भी यह डर है।
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वास्तव में एक राज्य की सरकार चलाना केंद्र की सरकार चलाने से बिल्कुल अलग बात है। गुजरात में कुछ तय नियमों और कानूनों से शासन किया जा सकता था। 2002 के बाद हमने देखा कि वहां कोई दंगा नहीं हुआ, जबकि देश के कई हिस्सों में ऐसे हादसे हुए। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में दंगे हुए। जब आप देश का शासन चलाएंगे, तो पाएंगे कि यहां बहुत विविधता है। अलग-अलग भाषाएं, धर्म, सामाजिक वर्ग सबको आपको साथ लेना पड़ेगा। नेहरू की राजकीय प्रणाली इन सबको अपने में समाहित करती थी। अब हमें देखना होगा कि नरेंद्र मोदी इस सबको साथ लेकर चलने की नीति अपनाते हैं या नहीं। भाजपा ने लोकसभा चुनाव में मुस्लिम प्रत्याशी खड़े किए थे, लेकिन उनमें से एक भी नहीं जीता।

यह एक असंतुलित स्थिति है, इसे मोदी कैसे दूर करेंगे? वह देश के शासक हैं। उन्हें देश की जरूरतों को पूरा करना है। वैसे चुनाव के दौरान उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं कही, जो वह 2002 में कहते थे। वह सबको साथ लेकर चलने की बात करते रहे। इस तरह देखें, तो नेहरू की नीतियों का उन्हें अभी तक विरोध नहीं किया। यह अलग बात है कि उनकी पार्टी नेहरू से सहमति नहीं रखती है।

पहली बार एक ऐसी पार्टी बहुमत के साथ आई है, जिसके सोचने का ढंग नेहरू की कार्यप्रणाली से पूरी तरह अलग है। कई वर्षों तक आम धारणा थी कि यह पार्टी सिर्फ बहुसंख्यकों का हित सोचती है।ऐसे में अगर आज यह पार्टी पूर्ण बहुमत लेकर आई, तो साफ है कि पार्टी की सोच बदली है। ऐसे में निर्णायक रूप से कुछ भी कहने से पहले हमें उसे थोड़ा समय देना होगा। हमें देखना होगा कि वह देश के लिए कैसा काम करती है। वह सबको साथ लेकर चलती है या भेदभाव करती है? हमें पता है कि आर्थिक मोर्चे पर नेहरू का नजरिया कैसा था और मोदी का नजरिया कैसा है। नेहरू की कार्यप्रणाली में पूरा जोर सार्वजनिक क्षेत्र पर था। आज परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं।

नेहरू के साथ राजनीति में वंशवाद की भी बातें होती हैं। कांग्रेस को एक रखने के लिए ठोस केंद्र की जरूरत है और यह केंद्र नेहरू-गांधी परिवार है। महात्मा गांधी की छत्रछाया में नेहरू-पटेल-मौलाना आजाद की त्रयी थी। लेकिन पटेल और मौलाना के जल्दी निधन के बाद वर्षों तक नेहरू अकेले पार्टी की अगुवाई करते रहे। इससे वह कांग्रेस की मुख्य पहचान बन गए। वास्तव में नेहरू-गांधी नाम कांग्रेस को संगठित और एक रखता है। ऐसे में वंशवाद यहां स्वाभाविक रूप से है। अगर यह केंद्र नहीं होगा, तो कांग्रेसियों को अपने अस्तित्व को समझने में ही कठिनाई महसूस होगी। आप भी कांग्रेस को बिना नेहरू-गांधी परिवार के स्वीकार नहीं कर सकेंगे। यह गांधी-नेहरू परिवार चुंबक है। आज यह चुंबक कमजोर पड़ चुका है। इसी का नतीजा चुनाव में उसकी पराजय के रूप में सामने आया। अपने केंद्र का जादू कमजोर पड़ने के बाद जरूरी हो गया है कि कांग्रेस अपनी कार्यप्रणाली पर ध्यान दे। उसे खुद को नया बनाना होगा।

इन बातों से कई लोगों को लग सकता है कि नेहरू अब प्रासंगिक नहीं रहे, लेकिन नेहरू का उनके समय के बाहर रखकर मूल्यांकन करना सही नहीं है। हर किसी को उसके देशकाल-परिस्थितियों में ही सही ढंग से आंका जा सकता है। आपको देखना होगा कि नेहरू ने किस तरह अपने वक्त में देश के सामने आ रही चुनौतियों का सामना किया। तब उनके सामने क्या रास्ते थे। उनके सहयोगी कैसे थे। उन्होंने अपने समय में देश को, समाज को आगे बढ़ाने के लिए काफी काम किए। मेरा मानना है कि इतिहास को बहुत संवेदनशील होकर देखना चाहिए। निर्णायक नजरिये से देखने से आपको इतिहास से कुछ हासिल नहीं होगा।
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