आजकल शहरों में बिजली के ट्रांसफार्मर ऐसे फुक रहे हैं, जैसे प्रेमिका के वियोग में किसी प्रेमी का दिल जल-भुनकर राख हो जाता है। उमस भरी गर्मी में लोगों के पसीने सूखने तक पर बन आई है। इधर देखिए पसीने की बूंदें सूखने के कगार पर होती हैं, और उधर बिजली यह कहकर चली जाती है कि अपना-अपना पसीना इकट्ठा करके रखिएगा मैं रोस्टिंग निपटा के आती हूं।
सच कहूं तो जब बिजली कटौती के लिए बिजली महकमे का कोई अधिकारी रोस्टिंग शब्द का इस्तेमाल करता है, तो मुझे ऐसा लगता है, जैसे बिजली चालीस दिन के चिल्ले (जमात) पर चली गई है। मेरे शहर का भी यही हाल है, इन दिनों। लोग गरमी की मार से तड़प रहे हैं। बिजली की बेवफाई से क्षुब्ध होकर लोग जब बिजली कर्मचारियों को फोन करते हैं, तो जवाब मिलता है कि मैं क्या करूं, ऊपर बात कीजिए।
जब जमीन पर अधिकारों से लैस बिजली के सरगना ही पब्लिक के लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं, तो ऊपर वाला क्या जमीन पर उतर कर बिजली सप्लाई करेगा?
पब्लिक का तो पारा इतना गरम है कि उसके जज्बात मुख्य चौराहों पर फूट रहे हैं। ट्रैफिक जाम करना अब अनुशासन होता जा रहा है। प्रशासन को भी आवागमन ठीक करने में पसीने छूट रहे हैं। अब तक तो लोग इन्सानों को ही कोसने के लिए जाने जाते थे। लेकिन अब बिजली को कोसने का जैसे उन्होंने पूरा कोर्स ही कर लिया है। बच्चों से बूढ़े तक टाइम निकाल-निकालकर कोस रहे हैं। बिजली ने लोगों के चेहरे के हाव भाव ऐसे बिगाड़ दिये हैं, जैसे सदियों से मुफलिसी के शिकार हों।
महिलाएं तो साहब इतनी दुखी हैं कि उनको ये समझ ही नहीं आ रहा है कि वे आखिर अपना मेकअप कब करें। इधर खुद को संवारती हैं, उधर धुलाई हो जाती है। पावडर का नुकसान सबसे ज्यादा होता है। पतिदेव ने एक बार झल्लाकर कहा कि तुम पावडर लगाती हो या पड़ोसी को दान कर देती हो। पत्नी ने पसीना पोछते हुए कहा कि पावडर लगाती हूं पसीने के कारण त्वचा पर टिकता ही नहीं। मुझ पर क्यों भड़क रहे हो, भीतर इतना ही गुस्सा है तो बिजली वालों पर उतारो।