इधर पाकिस्तान में इतने शरीफ हो गए हैं जी कि अब तो उसे शरीफों का देश कहें, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। शरीफ ही शरीफ, एक बार देख तो लें। पहले आडवाणी जी इस पर बड़ा जोर देते थे कि पाकिस्तान को दुष्ट देश घोषित करो। पर इधर तो लगता है कि जैसे वह शरीफों का देश हो गया हो।
प्रधानमंत्री शरीफ हैं, तो पंजाब में उनके मुख्यमंत्री भाई भी शरीफ। अब वहां की फौज के जनरल भी शरीफ हो गए हैं। हमारे यहां इस बात पर कोई यकीन ही नहीं करता कि पाक फौज का जनरल भी शरीफ हो सकता है। वहां जनरल अय्यूब खां, जनरल याह्या खां, जनरल जिया-उल-हक, जनरल मुशर्रफ जैसे इतने जनरल हो गुजरे हैं, जिन्होंने शराफत का कोई काम नहीं किया।
अब तक जो कयानी साहब थे, उनके बारे में भी यही माना जा रहा था कि काफी काइयां हैं। पर पाकिस्तानी फौज का जनरल बिना तख्ता पलटे इतने आराम से रिटायर हो जाए, तो उसे तो शरीफ कहना ही पड़ेगा। और ऐसे व्यक्ति के बारे में तो अवश्य ही कहना पड़ेगा, जिनके बारे में थोड़े दिन पहले तक ही ये खबरें आ रही थी कि बस वह तख्तापलट करने ही वाले हैं। पर उन्होंने न तो तख्तापलट किया, न ही किसी को तख्ते पर चढ़ाया। बस शरीफों की तरह रिटायर हो गए।
उनकी जगह जो नए सेना प्रमुख आए हैं, उनका तो खैर नाम ही शरीफ है। काम तो बाद में ही पता चलेगा, लेकिन इससे एक बात तो साबित होती है कि पाकिस्तान में चाहे कितने ही तालिबानी हों, आतंकवादियों के कितने ही गुट हों, जेहादियों के कितने ही मदरसे हों, आतंकवादियों को प्रशिक्षित करने के कितने ही कैंप हों, वहां से हमारे खिलाफ चाहे जितनी भी योजनाएं बनाई जाती हों, वहां शरीफों के लिए अब भी जगह है।
वहां फौज में भी शरीफ हैं और राजनीति में भी। जबकि हमारे यहां राजनीति को तो शरीफों का काम ही नहीं माना जाता। कोई लाख रुपये की घूस लेकर अपनी मिट्टी पलीद करता है, कोई टोल रोड पर गाड़ी रोकने पर हथियार लेकर भिड़ जाता है, कोई राष्ट्रमंडल खेल के नाम पर अनाप-शनाप भ्रष्टाचार करता है, तो कोई दंगाइयों को सम्मानित करता है।
इसका मतलब यह नहीं कि पड़ोस में ऐसे राजनेता नहीं होंगे। खूब होंगे। पर यह भी तो देखिए कि वहां शरीफों की कितनी इज्जत होती है। अब देखना यह है कि वे शराफत का काम भी करते हैं या सिर्फ नाम से ही शरीफ हैं!