यह जानना रोचक है कि अरब दरअसल दो पुनरुत्थानों का गवाह बना है।
ट्यूनीशिया, मिस्र, सीरिया, यमन और लीबिया की क्रांति के बारे में सभी जानते हैं। हालांकि इनमें से कोई भी क्रांति अब तक स्थायी और समावेशी लोकतंत्र का रूप नहीं ले पाई है।
वैसे इस दौरान सऊदी अरब और दूसरे खाड़ी राज्यों में कुछ ऐसे बदलाव भी हुए, जो बनस्बित कम चर्चा में रहे। नेताओं और आम लोगों के रिश्तों में आए ये बदलाव सऊदी अरब, दुबई और आबूधाबी की यात्रा के दौरान बड़ी आसानी से देखे जा सकते हैं।
खाड़ी देशों के नेताओं को ‘एक-व्यक्ति, एक-वोट’ वाले लोकतंत्र की स्थापना के लिए अब तक समय नहीं मिल पाया है। लेकिन अरब क्रांति के बाद यहां के नेता अपनी वैधता को लेकर कुछ ज्यादा ही सक्रिय हो चले हैं।
अब उन्हें महसूस होने लगा है कि केवल ज्यादा से ज्यादा अनुदान देकर या अपने पुत्र को सत्ता सौंप देने भर से काम नहीं चलने वाला।
इसलिए ये नेता अपने लोगों को यह जताने की भरसक कोशिश कर रहे हैं कि इस्राइल या ईरान पर अंकुश लगाने या इस्लाम को थोपने के अलावा भी उन्होंने स्कूलों में सुधार, रोजगार निर्माण और बदहाली को दूर करने के तमाम उपाय किए हैं।
भला हो इंटरनेट का, जिसकी बदौलत यह काम ज्यादा आसान हो गया है। मिस्र और ट्यूनीशिया में इंटरनेट की भूमिका को बेशक बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि खाड़ी देशों में इसे कम आंका गया।
इन देशों में फेसबुक, ट्वीटर और यू-ट्यूब की बदौलत लोगों को एक-दूसरे से वार्ता करने और अपने नेताओं का समर्थन करने के लिए एक व्यापक और अनियंत्रित मंच मिला है।
एक सऊदी युवा इंजीनियर कहता है, 'मुझे अब किसी स्थानीय अखबार की जरूरत नहीं, क्योंकि मुझे सारी खबर ट्वीटर से मिल जाती है।' सरकारी नियंत्रण वाले अखबारों के लिए यह खतरे की घंटी है।
अरब दुनिया में की जानी वाली कुल ट्वीटों में से तकरीबन आधी अकेले सऊदी अरब से की जाती हैं। यह विश्व के सर्वाधिक ट्वीटर और यू-ट्यूब सक्रिय देशों में भी शुमार होता है।
एक बदलाव काबिले गौर है कि अब तक सऊदी अरब में ट्वीटर और यू-ट्यूब में सर्वाधिक फालोअर्स रुढ़िवादी वहाबी धर्मोपदेशकों के होते थे, लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है, जो इन सोशल साइट्स के जरिये धार्मिक संस्थानों समेत सऊदी समाज के सभी पहलुओं पर मजाकिया टिप्पणी (अमूमन अप्रत्यक्ष) करते हैं।
सऊदी अरब के राजा अब्दुल्लाह को खाड़ी देशों में काफी प्रगतिशील और लोकप्रिय माना जाता है। लेकिन उनकी नौकरशाही बेहद असंवेदनशील और भ्रष्ट है। इसी वजह से हाल की कई सऊदी ट्वीटों में उनकी सरकार का मजाक बनाया गया है।
सऊदी अरब में मूसलाधार बारिश हो रही थी, करीब दस दिन पहले जब मैं वहां था। वहां के एक अखबार अल -शर्क अल-अवसत में छपे कार्टून में एक सवाल पूछा गया, 'रियाद की सड़कों पर सैलाब क्यों आया हुआ है?' कार्टून में सवाल का जवाब तीन लोगों ने तीन तरह से दिया।
नौकरशाह बोला, 'सैलाब की बात कोरी अफवाह है।' शेख का जवाब, 'यह प्रिंसेस नोरा यूनिवर्सिटी की लड़कियों के पापों का नतीजा है।' इस पर आम नागरिक बोला, 'इसकी वजह भ्रष्टाचार है।' पूरे कार्टून को काटते हुए एक पट्टी थी, जिस पर लिखा था, 'सेंसर्ड'। ध्यान देने वाली बात है कि इस कार्टून को एक सऊदी अखबार में जगह मिली।
इतना ही नहीं, संयुक्त अरब अमीरात में सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर एक मोबाइल वीडियो क्लिप को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दिखी, जिसमें किसी सरकारी अधिकारी को बीच सड़क पर एक एशियाई कर्मचारी को कोड़े मारते हुए दिखाया गया था।
बस फिर क्या था, इस क्लिप के पूरे खाड़ी क्षेत्र में फैलने में देर नहीं लगी। यह सबूत है कि लोगों का डर खत्म हो रहा है। क्रांति जैसी उनकी कोई मंशा नहीं है। वे तो बस एक साफ-सुथरी और जवाबदेह सरकार चाहते हैं।
इसी तरह के एक अन्य ट्वीट में एक गरीब आदमी, जिसकी छत बारिश की वजह से टपक रही है, आवास मंत्री को अपने अधिकारों की दुहाई देते हुए लिखता है, 'मैं एक सऊदी नागरिक हूं और यह मेरी बदहाल जिंदगी की तस्वीर है।
सऊदी अरब में ऐसी कहानियों की भरमार है। दरअसल लोग क्रांति नहीं, विकास चाहते हैं, देश की व्यवस्था में सुधार चाहते हैं। दुबई में सरकार ने 2021 को लक्ष्य बनाते हुए विकास की एक रणनीति तैयार की है।
इसके तहत सभी 46 मंत्रालयों और विनियामक एजेंसियों ने त्रि-वर्षीय निष्पादन सूचक तैयार किए हैं। इसमें दुबई के 15 वर्षीय युवाओं को वैश्विक विज्ञान, गणित और नए व्यापार की शुरुआत की कला में निपुण बनाने की भी एक योजना शामिल है।
निष्पादन सूचकों के जरिये योजना की पूरी प्रगति आई-पैड पर प्रदर्शित होगी, जिसका यहां के शासक शेख मुहम्मद बिन राशिद हर हफ्ते मुआयना करेंगे। इतना ही नहीं, सरकारी निष्पादन के निदेशक मरयाम अल-हम्मादी ने भी दुबई के हर मंत्री को भयभीत रख छोड़ा है।
इसकी वजह है कि हम्मादी मंत्रियों के कामकाज पर एक रिपोर्ट तैयार कर शेख मुहम्मद को देते हैं। इससे उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पा रहे मंत्रियों पर दबाव बना रहता है। दरअसल, शेख मुहम्मद चाहते हैं कि प्रत्येक सरकारी संस्थान, निजी क्षेत्र की तरह अपने ग्राहकों के संतोष और सेवा का ध्यान रखे।
दरअसल, बात सिर्फ लोकतंत्र की नहीं है। शासक समुदाय अपनी वैधता को फिर से अर्जित करने की जरूरत महसूस कर रहे हैं। जब एक नेता सही काम करता है, तो दूसरों पर भी वैसा ही करने का दबाव बनता है।
और यही वजह है कि ज्यादा पारदर्शिता और जवाबदेही की आहट अरब क्षेत्र में सुनाई देने लगी है।