मेरठ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा आयोजित राष्ट्रीय समागम विश्व के इतिहास में गणवेशधारी, गैर सैनिक कार्यकर्ताओं के सबसे बड़े अनुशासित कार्यक्रमों में शामिल हो, तो आश्चर्य नहीं। यह 1925 में स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 93 वर्षीय यात्रा का भी विशालतम समागम रहा। एक ऐसे माहौल में, जब खंडहर बने दल भी संघ का ‘सामना’ करने इकट्ठा होने की बात कर रहे हैं, एक नजर इस समागम के स्वरूप पर डालना उचित होगा। कुल गणवेशधारी पंजीकृत स्वयंसेवकों की संख्या 3,13,393 है! ये केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 14 जिलों (जिन्हें संघ कार्य की दृष्टि से 25 में बांटा गया है) से आए थे।
इनमें से वास्तविक उपस्थिति 2.86 लाख स्वयंसेवकों की थी। 650 एकड़ में समागम स्थल था, चार मंजिला-35 फीट ऊंचा मंच, जो दो हजार वर्गफीट का था। 600 एकड़ में वाहन पार्किंग थी। मेरठ, मवाना और सरधना के तीन लाख परिवारों से भोजन के छह लाख पैकेट बनकर आए, प्रत्येक प्रतिभागी से पचास रुपये शुल्क लिया गया, दस हजार कुर्सियां, वाई-फाई, दो हजार शौचालय, पानी, चिकित्सा, राष्ट्रोदय एप की व्यवस्था, प्रवेश के लिए बार कोड प्रणाली, और कार्यक्रम के बाद एक इंच जमीन पर कोई कूड़ा नहीं-प्रत्येक सुरक्षा कार्य केवल स्वयंसेवकों के भरोसे। सैकड़ों स्वयंसेवक-तीसरी-चौथी पीढ़ी के साथ-दादा, पिता, पोता और पड़पोता गणवेश में आए।
यहां नाइजीरिया से लेकर शिकागो तक के स्वयंसेवक ही नहीं थे, बल्कि रास्ते भर मुस्लिमों के जत्थे स्वयंसेवकों को पानी पिलाते, उनकी अभ्यर्थना करते दिखे। संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का संबोधन संतुलित, बिना कटुता अथवा संघ विचारधारा के आलोचकों के प्रति आक्रामकता से रहित-केवल देशप्रेम, परम वैभव, सुरक्षा अर्थात कुल मिलाकर भारत के उदय पर केंद्रित था।
यह हर दृष्टि से एक आश्चर्यजनक घटनाक्रम रहा। आलोचक, जो गत अनेक दशकों से स्वयं घटते हुए भी संघ-विरोध के तेवर बढ़ाते आ रहे हैं, इस बात का जवाब नहीं दे पाएंगे कि 93 साल से ब्रिटिश एवं उसके बाद कांग्रेस व कम्युनिस्ट विचारों द्वारा लगातार विरोध के बावजूद संघ कार्य का प्रभाव बढ़ता ही क्यों जा रहा है? यह क्यों संभव हुआ कि संघ के दो प्रचारक प्रधानमंत्री बने, क्यों उनके कार्यकाल भिन्न, अन्य सरकारों की तुलना में बेहतर तथा विश्व भर में अपनी प्रभावी छवि के लिए जाने जा रहे हैं? 1925 में भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की भी स्थापना हुई थी-जो आज देश में या तो छत्तीसगढ़-बिहार के नक्सली-माओवादियों के चेहरों से प्रतिनिधित्व कर रही है या देश के प्रायः हर क्षेत्र से अस्वीकृत ऐसे लोकतांत्रिक सांगठनिक बिखराव को दर्शा रही है, जिसमें सीताराम येचुरी केरल इकाई को यह बता रहे हैं कि ‘हम भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी हैं, केरल कम्युनिस्ट पार्टी नहीं।’
कांग्रेस की स्थापना एक ब्रिटिश द्वारा 1885 में हुई थी-44 साल तक उसने पूर्ण स्वराज्य नहीं मांगा। पूर्ण स्वराज्य का पहला प्रस्ताव उसने 1929 में लाहौर अधिवेशन में पारित किया था। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार कांग्रेस कार्यकर्ता थे, जिन पर 1920 में नागपुर में हुए कांग्रेस अधिवेशन की व्यवस्था की जिम्मेदारी थी और 1925 में संघ की स्थापना के बाद जब कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित किया, तो डॉ. हेडगेवार ने एक निर्देशात्मक पत्र जारी कर देश भर के स्वयंसेवकों को उस प्रस्ताव का अभिनंदन करने के लिए कहा था। 1947 तक संघ के प्रत्येक स्वयंसेवक को जो प्रतिज्ञा लेनी होती थी, उसमें स्वतंत्रता हेतु कार्य करने की पंक्ति अनिवार्यतः रहती ही थी।
फिर भी संघ की राष्ट्रभक्ति, स्वतंत्रता समर में हिस्सेदारी, मुस्लिम विरोध, पिछड़े-अतीतकालीन अनाधुनिक स्वरूप के मुद्दे उछालकर उस पर आरोप लगाना उन लोगों का स्वभाव बन गया है, जो न तो कभी संघ को जान पाए, न उसका अध्ययन किया। क्या शिक्षा, आरोग्य, समरसता, जनजातीय विकास, धर्म, राजनीति, छात्र-परिसर, मजदूर तथा कामगार संघर्ष, पत्रकारिता, सैन्य-सुरक्षा जैसे विविध एवं विराट सामाजिक क्षेत्रों में भारत की प्रथम क्रमांक का प्रभावी संगठन देने वाला शक्ति केंद्र कभी घृणा या नकारात्मक सोच पर बढ़ सकता था? राजनीति से लेकर सॉफ्टवेयर तथा विज्ञान (सुपर कंप्यूटर के जनक डॉ. विजय भास्कर तो एक उदाहरण हैं) से लेकर स्त्री जागरण तथा सशक्तिकरण के लिए राष्ट्र सेविका समिति जैसे संगठन बढ़ाने वाला मूल स्रोत-यानी संघ नकारात्मक, बुद्धिहीन, पिछड़े लोगों की भीड़ के कारण 82 से ज्यादा देशों में नहीं फैला है।
संघ राजनीति, धन या सांप्रदायिक घृणा के कारण नहीं, बल्कि उन सैकड़ों हजार सुसंस्कृत, सुपठित भारतीयों के जीवन तप से बढ़ा है, जिन्होंने अजान, अनाम, अचीन्हे रहते हुए खुद को म्यांमार सीमा पर मोरेह, अरुणाचल में तवांग, लद्दाख में लेह, अंडमान में पोर्ट ब्लेयर, तो दक्षिण में नीलगिरि से लेकर गंतोक और चंद्रपुर (महाराष्ट्र) के नक्सल क्षेत्र तक साधारण, निम्न, मध्यम आय वाले भारतीयों के बीच भगवा धारण करते हुए भी संन्यासी की भांति काम किया। कितने लोग जानते होंगे कि देश में सबसे सस्ते, विश्वसनीय और सेवाभावी अस्पताल संघ के स्वयंसेवक चला रहे हैं? आरोग्य केंद्र, रक्त बैंक, नेत्रदान, देहदान ही नहीं, मानसिक दुर्बलता के शिकार लोगों हेतु ‘सक्षम’ जैसे संगठन संघ के कार्यकर्ता चला रहे हैं। ऐसे 59 लाख से अधिक प्रकल्प हैं।
देश में सेक्यूलर राजनीति का कलुष अपने वैचारिक विरोधी में कुछ भी अच्छा देखने नहीं देता। संघ के आलोचक हैं, होने भी चाहिए। संघ में कमियां, परिष्कार-परिमार्जन की आवश्यकता देखने वाले संघ-मित्र भी हैं। सब कुछ आदर्श तो नहीं होगा, पर क्या सब कुछ खराब है, ऐसा भी कह सकते हैं? संघ शक्ति आज वस्तुतः देश के विभिन्न क्षेत्रों में ईमानदारी, भारतीयता और त्याग की त्रिवेणी का ऊर्जा केंद्र बनी है, क्या इसे नकारा जा सकता है?