स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान क्रांतिकारी 'भारतमाता की जय', इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते हुए ये पंक्तियां भी दोहराते थे, 'प्राण मित्रों, भले ही गंवाना/ पर न झंडा यह नीचे झुकाना/ तीन रंगा यह झंडा हमारा/ बीच चर्खा चमकता सितारा।' यह पंक्तियां स्वाधीनता आंदोलन के संघर्षशील योद्धा, साहित्यकार, स्वतंत्रचेता पत्रकार और किसानों के मसीहा विजय सिंह पथिक ने लिखी थी। उनकी साधना और तपस्या का जीवन असंख्य लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना।
पथिक जी ने अनेक क्रांतिकारी हलचलों में भाग लिया और गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्हें अपना नाम भी बदलना पड़ा। किसी समय के भूप सिंह विजय सिंह पथिक बन गए। सरदार पटेल की भांति उनका उदाहरण भी यह सिद्ध करता है कि साधारण जनता के भीतर से भी नेतृत्व पनप सकता है। पथिक जी का जन्म 27 फरवरी, 1884 को एक गुर्जर किसान परिवार में बुलंदशहर जिले के गुलावटी होशियारपुर गांव में हुआ था। उनके पूर्वजों ने 1857 की सशस्त्र क्रांति में भाग लिया था। पथिक जी ने बाद के वर्षों में राजस्थान को अपना कार्यक्षेत्र बना लिया था। उस समय राजस्थान अनेक छोटी-बड़ी रियासतों में विभक्त था और चारों और सामंतवाद का बोलवाला था। वहां उन्होंने राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की।
आजादी के आंदोलन के समय किसानों पर भयंकर अत्याचार हो रहे थे। बिजौलिया में किसानों का आंदोलन दबाया जा रहा था। उस समय सलाह यह बनी कि पथिक जी को चितौड़ से बिजौलिया जाने के लिए राजी कर लिया जाए। बिजौलिया के किसान सत्याग्रह के सिलसिले में ही पथिक जी गणेश शंकर विद्यार्थी के संपर्क में आए और दोनों की मित्रता अंत तक बनी रही। महात्मा गांधी ने 1947 में पथिक जी के बारे में ये शब्द कहे थे, 'मैं पथिक के बारे में कुछ बता सकता हूं। पथिक एक सिपाही आदमी है, बहादुर है, जोशीला है और तेज मिजाज है, लेकिन जिद्दी है। महत्वूपर्ण बात यह है कि बिजौलिया की जनता का उन पर पूरा-पूरा विश्वास है।'
उन्होंने समाज, देश व राजनीति से संबंधित अनेक साहित्यक रचनाएं कीं। पथिक जी ने राजस्थान केसरी, नवीन राजस्थान, तरूण राजस्थान, राजस्थान संदेश, व नव संदेश समाचार पत्रों को संपादित भी किया। गीता के निष्काम कर्मयोग में उनकी गहरी आस्था थी, लेकिन धीरे-धीरे उन पर मार्क्सवाद का प्रभाव गहरा हो गया। वह कभी जात-पांत के पचड़े में नहीं पड़े। कोई अगर उनसे पूछता भी कि आप किस जाति के हैं, तो कहते कि आपको जो जचे वही मान लो।
जब देश आजाद हुआ और महात्मा गांधी कांग्रेस से निराश होने लगे, उन्हीं दिनों पथिक जी गांधी जी से मिले। उनसे गांधी जी ने कहा कि उन्हें राजस्थान में ही जमकर बिजौलिया की शैली पर कार्य करना चाहिए। उनके कहने के अनुसार पथिक जी राजस्थान लौटे। वह अजमेर जाने की व्यवस्था कर रहे थे, क्योंकि वह राजस्थान में जनजागृति के लिए राजस्थान सेवाश्रम नामक संस्था स्थापित करना चाहते थे। उसी दौड़ धूप में उन्हें लू लग गई और 28 मई 1954 को यह महान क्रांतिकारी नेता चिरनिद्रा में सो गया।
समाज को कैसे संगठित किया जाए इसके बारे में पथिक जी की बहुत पकड़ थी। उन्होंने अनेक संगठन बनाकर समाज को खास उद्देश्य के लिए लामबंद करके उनमें सामाजिक पूंजी का निर्माण किया, जो उस समय के समाज के विकास का महत्वपूर्ण साधन रहा।