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सुंदरता का दूसरा पैमाना भी है

Thu, 27 Nov 2014 07:12 PM IST
मनीषा सिंह
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दुनिया भर में सौंदर्य की अनूठी मिसाल के रूप में स्थापित रही गुड़िया- बार्बी डॉल की बिक्री 14 फीसदी घट गई है। यह गिरावट लगातार तीसरे साल हुई है। इस गुड़िया के जरिये पूरी दुनिया में लड़कियों, खासकर किशोरियों में ठीक बार्बी जैसा दिखने की चाह पैदा हुई थी। हालांकि एक अवास्तविक देहयष्टि की चाहत पैदा करने वाली इस गुड़िया की बिक्री में कमी को कुछ विश्लेषक राहत के रूप में देखेंगे। उन्हें लग रहा होगा कि अब किशोरियां यथार्थ से परे सौंदर्य के तिलिस्म में फंसने से परहेज बरतेंगी, और अपनी बुद्धि, अपने कौशल के बल पर योग्यता साबित करने का प्रयत्न करेंगी। मगर कहीं ऐसा तो नहीं है कि देहयष्टि के पैमानों में थोड़ा-बहुत अंतर ही आया हो और वे खत्म न हुए हों?
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करीब 55 साल पहले जिन स्थितियों में बार्बी डॉल को बनाया गया था, तब के और अब के हालात में काफी फर्क आ चुका है। बार्बी को बनाने वाली रूथ हैंडलर ने एक बार कहा था कि हर लड़की बचपन में ऐसी गुड़िया से खेलना चाहती है, जैसा बनने की उसकी खुद की इच्छा होती है। यह कथन आश्चर्यजनक था, क्योंकि बार्बी जैसा शरीर पाना काफी मुश्किल है। इसके बावजूद साढ़े पांच दशक दुनिया पर छाई रही बार्बी डॉल का साम्राज्य अब सिमट रहा है, तो इसीलिए नहीं कि सुंदर दिखने की स्त्री की इच्छा में कोई कमी आई है, बल्कि इसलिए कि पिछले कुछ वर्षों में लड़कियां बार्बी डॉल के बजाय वीडियो गेम, टैबलेट, स्मार्टफोन में ज्यादा व्यस्त हो गई हैं और सेल्फी उन्हें ज्यादा लुभाने लगी है। पर यहां जो पेच है, उस पर समाजशास्त्रियों को गौर करना चाहिए कि अगर बार्बी डॉल देहयष्टि की अवास्तविकता के कारण खारिज कर दी गई है, तो क्या ये सेल्फियां किशोरियों को एक और भ्रमजाल में नहीं फंसा रही हैं?

निस्संदेह प्रकृति ने स्त्रियों को शायद ऐसा बनाया ही है कि वे सुंदर दिखना चाहती हैं। अन्यथा लगभग हर क्षेत्र में पुरुषों की बराबरी पर आ जाने के बाद उनमें सुंदर दिखने की और उसके लिए दूसरों की तारीफ पाने की इच्छा खत्म हो जानी चाहिए थी। लेकिन एक तो स्त्रियों की सुंदरता की स्वाभाविक चाह और दूसरे आज के कामकाजी माहौल में स्वस्थ-सुंदर दिखने की अनिवार्यता जैसे पहलुओं ने महिलाओं को अपनी सुंदरता कायम रखने के लिए सतत काम करने को प्रेरित किया है। सवाल यह है कि दैहिक पैमानों पर खुद को सुंदर और संतुलित साबित करने वाली लड़कियां क्या वास्तव में हमारी उन लाखों युवतियों की प्रेरक मानी जानी चाहिए, जो शहरों, गांवों और कस्बों में आज पढ़ाई और खेलकूद जैसे मोर्चों पर अपनी योग्यता साबित करने के लिए छटपटा रही हैं।
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असल में, सौंदर्य को दो पैमानों पर आंका जाना चाहिए। एक स्त्री का प्राकृतिक सौंदर्य है, यानी स्वाभाविक रूप से मिली सुंदरता। और दूसरी है सांस्कृतिक सुंदरता, जो स्त्री की सोच और उसकी तरक्की की देन होती है। जिस तरह देश, काल और परिस्थिति के हिसाब से प्राकृतिक सुंदरता के पैमानों और आकलन में अंतर आया है, उसी तरह स्त्री के सांस्कृतिक शरीर के सौंदर्य में फर्क पड़ा है। लेकिन समाज स्त्री सौंदर्य के दूसरे पहलू को पकड़ नहीं पा रहा है। इसलिए जरूरी है कि वक्त के साथ-साथ समाज में सुंदरता के मापदंड भी बदल जाने चाहिए और स्त्री सुंदरता के उस पहलू पर भी जोर दिया जाना चाहिए, जिसमें वह देश व समाज के विकास में पुरुषों के बराबर ही हिस्सेदार है।
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