फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मेरी आवाज ही पहचान है

Thu, 27 Nov 2014 07:10 PM IST
प्रकाश पुरोहित
विज्ञापन
विज्ञापन
आपका कार्ड...? एक हाथ में भरी हुई प्लेट और दूसरे से चम्मच भरते हुए कोई मुझसे विजिटिंग कार्ड मांगता है, तो मेरा चेहरा पसीना-पसीना हो जाता है। इसकी दो वजह है। एक तो मैं कार्ड रखता नहीं, और जो इतने अधिकार से कार्ड मांग रहा है, वह तो अपना कार्ड देकर ही मानेगा। ये अगर दिन भर में सौ-पचास कार्ड न बांट दें, तो कार्ड छपवाना बेकार हो जाए। ऐसे-ऐसे कार्डधारी देखे हैं कि मेरा नाम सुने बगैर कार्ड थमा दिया, और ऐसा भी हुआ कि पार्टी खत्म होते-होते फिर एक कार्ड दे दिया।
विज्ञापन


इसलिए खाने पर टूट चुके शख्स से मैं आम तौर पर दूर से ही नमस्कार कर लेता हूं, क्योंकि जरा भी नजदीक पहुंचे कि कार्ड देने के लिए जैसे पिल पड़ते हैं। ऐसा भी लगता है, जैसे इन्होंने कार्ड नहीं दिया, तो इनके हाथ से खाने की प्लेट छीन ली जाएगी। उस समय मुझे और भी बुरा लगता है, जब कोई अपनी प्लेट मुझे पकड़ा कर अपनी जेब से कार्ड निकालने को बेताब हुआ जाता है।

कार्ड देने के बाद जब कोई मुझसे मेरे कार्ड के बारे में पूछता है, तो मेरी हालत ऐसी हो जाती है, जैसे बगैर इन्विटेशन के पार्टी में आ गया हूं।

लाना भूल गया...या अभी खत्म हो गए...या प्रेस में छपने को दे रखे हैं, जैसे न जाने कितने बहाने मुझे बनाने पड़ते हैं। वैसे तो मुझे शर्म नहीं आनी चाहिए। कार्ड न रखकर मैं अपराध नहीं कर रहा, पर जाने क्यों, मेरा चेहरा लटक जाता है। तब मैं कसम खाता हूं कि कल सूरज की पहली किरण के साथ कार्ड छपवाने निकल पड़ूंगा। मगर ऐसा कभी नहीं होता, क्योंकि पहली किरण न जाने कब निकल जाती है और मैं सोया पड़ा रहता हूं।
विज्ञापन


वैसे, सच बात तो यह है कि जब रात को पार्टी से लौटने के बाद कपड़े बदलते समय जेब से सारे कार्ड निकाल कर रद्दी की टोकरी में डालता हूं, तो अगले दिन सूरज की पहली किरण के साथ कार्ड-अभियान पर निकलने का मंसूबा भी दम तोड़ चुका होता है। यही कारण है कि मैं अब तक विजिटिंग कार्ड नहीं छपवा पाया हूं।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें