कुछ बातें हैं जो तमिलनाडु की मुख्यमंत्री को संभाव्य राजनीतिक सहयोगी होने से रोकती हैं। लोग भले ही उन्हें 'अम्मा' कहते हों, मगर उनकी छवि एक तेज-तर्रार, खुर्राट और दबंग नेत्री की है। शुरुआती दिनों से ही उनसे मिलने आने वाले कई मंत्रियों को उन्हें दंडवत प्रणाम करते देखा गया है। मजे की बात है कि उन पर एक पूर्व अकाउंटेंट की अपनी जूतियों से पिटाई का आरोप भी लगा है। हालांकि वह यह कहते हुए इसे खारिज करती हैं कि वह ऐसा अशोभनीय व्यवहार कभी नहीं कर सकतीं। फिर भी उनकी अस्थिरता वाकई काबिले ताज्जुब है। अपनी अनदेखी उन्हें सहन नहीं है। शायद इसीलिए उन्होंने एकाएक समर्थन वापसी की घोषणा करके तत्कालीन भाजपा सरकार को गिराने में अहम भूमिका निभाई थी। उस वक्त सोनिया गांधी के साथ उनकी चाय पार्टी काफी चर्चित हुई थी।
लोकसभा चुनाव की बेला में प्रधानमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे चल रहे भाजपा के नरेंद्र मोदी पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं। मोदी न सिर्फ भारत के सबसे समृद्ध राज्यों में से एक, गुजरात के मुख्यमंत्री हैं, बल्कि उन्होंने खुद को नए विचारों के अगुआ और तकनीक सुधारक के तौर पर पेश किया है। अपनी राजनीतिक पहचान को और बुलंद करने के लिए फिलहाल उनकी निगाह नई दिल्ली पर है।
लेकिन प्रधानमंत्री बनने के उनके सपने का दारोमदार उन क्षेत्रीय क्षत्रपों पर है, जिन्हें हालात का फायदा उठाते हुए गठबंधन सरकार को बनाने और तोड़ने में महारथ हासिल है। भाजपा के बहुमत के लिए जरूरी 272 सीटें हासिल न कर पाने की सूरत में भारतीय राजनीति की 'तीन नेत्रियों' में से किसी एक का समर्थन पाना मोदी के लिए जरूरी हो जाएगा। ये नेत्रियां हैं- जयललिता, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती। इनमें से कोई भी अकेली नेत्री मोदी की राह आसान कर सकती है। चेन्नई के एक पत्रकार ए एस पन्नीरसेल्वन बताते हैं, 'जयललिता लेन-देन के खेल में माहिर हैं। अपनी जरूरतों को वह अच्छी तरह जानती हैं।'
नरेंद्र मोदी के लिए दिक्कत यह है कि उनकी पार्टी को गठबंधन सरकार चलाने में हमेशा से दिक्कत का सामना करना पड़ा है। 1996 में केंद्रीय सत्ता का उसका पहला अनुभव खासा कड़वा रहा था। तब पर्याप्त गठबंधन सहयोगियों को इकट्ठा न कर पाने की वजह से केवल 13 दिन के भीतर ही भाजपा सरकार गिर गई थी। भाजपा के नजदीकी माने जाने वाले कई लोगों की राय में इस बार भी पार्टी पर वही खतरा मंडरा रहा है। दरअसल प्रमुख क्षेत्रीय दल मोदी के साथ जुड़ने में हिचक रहे हैं। 2002 के दंगों को लेकर बेशक किसी अदालत ने मोदी को कुसूरवार नहीं माना है, मगर मुसलमान तबका अब भी उन्हें संदेह की नजर से देखता है।
अंग्रेजी अखबार दि हिंदू के प्रकाशक एन राम कहते हैं, मुस्लिम वोटों की अनदेखी करना, तीनों में से किसी भी नेत्री के लिए मुमकिन नहीं है। यह तय है कि मोदी की निरंकुश छवि को देखते हुए भी ये नेत्रियां उनके साथ गठजोड़ बनाते वक्त अतिरिक्त सावधानी बरतेंगीं। तीनों ये बिल्कुल नहीं चाहेंगी कि उन्हें हल्के में लिया जाए। इसलिए मोदी की व्याकुलता बढ़ाने में ये कोई कसर नहीं छोड़ेंगी।'
देश के दो कोनों का प्रतिनिधित्व करते मोदी और जयललिता, दोनों में ही निरंकुशता के अंश देखे जा सकते हैं। हाल ही में एक रैली में जयललिता ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी सहित अन्य नेताओं को खूब कोसा। मगर उन्होंने मोदी के बारे में कुछ भी नहीं कहा और बोलीं, 'एक नया गठबंधन बनेगा, जिसमें मेरी भूमिका होगी' (हालांकि 13 अप्रैल को एक रैली में उन्होंने भाजपा को पहली बार निशाने पर लिया)। जया और मोदी ने मित्रता का कई बार प्रदर्शन किया है। वे एक-दूसरे के शपथग्रहण समारोहों में जाते रहे हैं और जन्मदिन पर एक दूसरे को बधाई देना भी नहीं भूलते। पटकथा लेखक और संपादक चो रामास्वामी कहते हैं, 'दोनों न सिर्फ कांग्रेस के खिलाफ हैं, बल्कि एक-दूसरे की मुश्किलें भी समझते हैं।'
मगर यह जानना दिलचस्प है कि सहयोगियों को अंत तक साथ लेकर चलने के मामले में दोनों ही बदनाम हैं। गुजरात में अपने 12 वर्ष के शासन में पूर्व सहयोगियों और वरिष्ठ नेताओं के साथ मोदी के रिश्ते तल्ख ही रहे हैं। वाशिंगटन स्थित अनुसंधान संस्थान 'कार्नेगी इंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस' से जुड़े विश्लेषक मिलन वैष्णव कहते हैं, 'न तो मोदी को कभी गठबंधन बनाने की जरूरत पड़ी, और न ही दोस्त बनाने की। गुजरात के राजनीतिक क्षितिज पर उनका एकक्षत्र राज्य रहा है, लेकिन वैसी राजनीति को केंद्र में दोहराना उनके लिए मुमकिन नहीं होगा।'
तमिलनाडु में जयललिता की देवी की तरह पूजा करने वालों की कोई कमी नहीं है। बड़े-बड़े पोस्टर, गगनचुंबी कट आउट और उनकी तस्वीर बने विशालकाय गुब्बारे, तमिलनाडु में उनकी लोकप्रियता के गवाह हैं। लेकिन पुरुष आधिपत्य वाली इस राजनीतिक व्यवस्था में अपने लिए जगह बनाना उनके लिए आसान नहीं रहा था।
जयललिता की राजनीति को बेहद नजदीक से देखने वाले रामास्वामी के मुताबिक जयललिता अपनी पिछली गलतियों से अब सबक सीख चुकी हैं, और अगर मोदी 230 से 240 तक सीटें जीत लाते हैं, तो जयललिता के साथ उनका स्थायी गठबंधन बन सकता है।'' लेकिन अगर मोदी का प्रदर्शन उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहा, तो बकौल एन राम, सत्ता का पहला वर्ष कई तरह के अप्रत्याशित घटनाक्रमों को अपने साथ लाने वाला है।